अल-हिज्र · 29/99
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-हिज्र
فَإِذَا سَوَّيْتُهُ وَنَفَخْتُ فِيهِ مِن رُّوحِي فَقَعُوا لَهُ سَاجِدِينَ ۝٢٩
Fa izaa sawwaituhoo wa nafakhtu feehi mir roohee faqa`oo lahoo saajideen
📖 हिंदी अर्थ
तो जिस वक्त मै उसको हर तरह से दुरुस्त कर चुके और उसमें अपनी (तरफ से) रुह फूँक दूँ तो सब के सब उसके सामने सजदे में गिर पड़ना

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • سَوَّيْتُهُ: मैंने उसकी रचना को पूर्ण और सन्तुलित कर दिया।
  • نَفَخْتُ فِيهِ مِن رُوحِي: उसमें अपनी ओर से (अर्थात् अपनी मलकियत और ख़िल्क़त की ओर से) रूह (आत्मा) फूँक दी।
  • فَقَعُوا لَهُ سَاجِدِينَ: उसके लिए सजदे में गिर पड़ो।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब मैं (अल्लाह) आदम की रचना को पूरा कर चुका और उसके शरीर को सन्तुलित एवं सुन्दर बना दिया, और उसमें अपनी ओर से रूह फूँक दी — जो एक लतीफ़ (सूक्ष्म) जिस्म है जिससे इंसान में जान आती है — तो उस समय तुम सब (फ़रिश्ते) उसके आगे सजदे में गिर पड़ना। यह सजदा इबादत का नहीं था, बल्कि अल्लाह के आदेश की पालना में आदम को सम्मान देने और उसकी तकरीम (प्रतिष्ठा) के लिए था। अल्लाह ने रूह को अपनी ओर जोड़कर (मिन रूही) यह बताया कि यह रूह उसकी ख़िल्क़त (सृष्टि) और मलकियत (स्वामित्व) में से है, जिसे उसने अपनी कुदरत से बनाया — यह कोई अल्लाह का अंश नहीं है, बल्कि एक सम्मानित सृष्टि है। फ़रिश्तों को आदेश दिया गया कि वे आदम के लिए सजदा करें, और यह सजदा अल्लाह की आज्ञा का पालन और आदम की उच्च पदवी की स्वीकृति थी।

फ़ायदे (लाभ):

  1. इस आयत से मालूम होता है कि इंसान अल्लाह की सृष्टि में सबसे श्रेष्ठ और सम्मानित प्राणी है, क्योंकि अल्लाह ने फ़रिश्तों को उसके सामने सजदा करने का आदेश दिया — यह इंसान की तकरीम का सबसे बड़ा प्रमाण है।
  2. अल्लाह ने इंसान को रूह देकर उसे जीवन और चेतना प्रदान की, जो उसकी रहमत और कुदरत की निशानी है। इससे हमें अल्लाह का शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि उसने हमें यह अनमोल नेमत दी।
  3. सजदा सिर्फ़ अल्लाह के लिए है, लेकिन यहाँ सजदा आदेश की पालना में किया गया — यह सिखाता है कि अल्लाह की आज्ञा का पालन करना ही सच्ची इबादत है, और उसके आदेशों में बुद्धि और हिकमत होती है।
  4. यह आयत इंसान की फ़ितरत (स्वभाव) की पाकीज़गी और उसकी उच्च नियत (उद्देश्य) को दर्शाती है — कि इंसान को अल्लाह की इबादत और उसकी ज़मीन पर ख़िलाफ़त (प्रतिनिधित्व) के लिए बनाया गया है। इससे हमें अपनी ज़िन्दगी का मक़सद समझना चाहिए और अल्लाह के बताए रास्ते पर चलना चाहिए।


📜 आयत 27-31 — सूरा अल-हिज्र

27وَالْجَانَّ خَلَقْنَاهُ مِن قَبْلُ مِن نَّارِ السَّمُومِ
और हम ही ने जिन्नात को आदमी से (भी) पहले वे धुएँ की तेज़ आग से पैदा किया
28وَإِذْ قَالَ رَبُّكَ لِلْمَلَائِكَةِ إِنِّي خَالِقٌ بَشَرًا مِّن صَلْصَالٍ مِّنْ حَمَإٍ مَّسْنُونٍ
और (ऐ रसूल वह वक्त याद करो) जब तुम्हारे परवरदिगार ने फरिश्तों से कहा कि मैं एक आदमी को खमीर दी हुई मिट्टी से (जो सूखकर) खन खन बोलने लगे पैदा करने वाला हूँ
29فَإِذَا سَوَّيْتُهُ وَنَفَخْتُ فِيهِ مِن رُّوحِي فَقَعُوا لَهُ سَاجِدِينَ
तो जिस वक्त मै उसको हर तरह से दुरुस्त कर चुके और उसमें अपनी (तरफ से) रुह फूँक दूँ तो सब के सब उसके सामने सजदे में गिर पड़ना
30فَسَجَدَ الْمَلَائِكَةُ كُلُّهُمْ أَجْمَعُونَ
ग़रज़ फरिश्ते तो सब के सब सर ब सजूद हो गए
31إِلَّا إِبْلِيسَ أَبَىٰ أَن يَكُونَ مَعَ السَّاجِدِينَ
मगर इबलीस (मलऊन) की उसने सजदा करने वालों के साथ शामिल होने से इन्कार किया
अल-हिज्रकुरान सूची
99आयत
मक्कीअवतरण स्थान
29आयत

अनुवाद — अल-हिज्र 29

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Friday, October 2, 2026

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