अल-हिज्र · 50/99
अनुवाद उच्चारण — अल-हिज्र
وَأَنَّ عَذَابِي هُوَ الْعَذَابُ الْأَلِيمُ ۝٥٠
Wa anna `azaabee uwal `azaabul aleem
📖 हिंदी अर्थ
मगर साथ ही इसके (ये भी याद रहे कि) बेशक मेरा अज़ाब भी बड़ा दर्दनाक अज़ाब है
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • عَذَابِي: मेरी यातना (अल्लाह की ओर से दी जाने वाली सज़ा)
  • الْأَلِيمُ: बहुत दर्दनाक, तकलीफ़देह, जो शरीर और रूह दोनों को सख्त पीड़ा पहुँचाए

व्याख्या:

इस आयत में अल्लाह तआला अपने पैगंबर ﷺ को निर्देश दे रहा है कि वे अपने बंदों को यह बात स्पष्ट रूप से बता दें कि अल्लाह की ओर से दी जाने वाली यातना ही वास्तव में सबसे कठोर और दर्दनाक यातना है। यह दुनिया की किसी भी सज़ा से बढ़कर है, क्योंकि यह अल्लाह की ओर से है, जो सबसे शक्तिशाली है। यह यातना उन लोगों के लिए है जो तौबा नहीं करते, अपनी ग़लतियों पर अड़े रहते हैं और अल्लाह की रहमत से निराश होकर उसकी नाफ़रमानी पर डटे रहते हैं। यहाँ अल्लाह ने पहले अपनी मग़फिरत (क्षमा) और रहमत (दया) का ज़िक्र किया है, फिर अपने अज़ाब का, ताकि बंदे समझ लें कि रहमत और अज़ाब दोनों अल्लाह ही के हाथ में हैं। जो उसकी ओर रुजू होगा, उसे रहमत मिलेगी, और जो मुँह मोड़ेगा, उसे अज़ाब का सामना करना पड़ेगा। यह अज़ाब आख़िरत में सबसे स्पष्ट रूप से सामने आएगा, जब हर इंसान अपने कर्मों का पूरा बदला पाएगा। यह बात नबी ﷺ के ज़रिए बंदों तक पहुँचाई गई ताकि कोई यह न कह सके कि उसे आगाह नहीं किया गया।

फ़ायदे:

  1. अल्लाह तआला ने अपने बंदों पर बड़ा एहसान किया है कि उसने अपने नबी के ज़रिए उन्हें अपने अज़ाब से आगाह किया, ताकि वे उससे बचने की कोशिश करें।
  2. अल्लाह की रहमत और उसका अज़ाब दोनों साथ-साथ हैं; रहमत उनके लिए है जो तौबा करें, और अज़ाब उनके लिए है जो सरकशी पर अड़े रहें। यह अल्लाह का न्याय और उसकी कृपा दोनों को दर्शाता है।
  3. यह आयत इंसान को डराती है कि वह अल्लाह की यातना से बेख़बर न हो, क्योंकि वह सबसे दर्दनाक है — इससे इंसान में अल्लाह का खौफ़ पैदा होता है, जो उसे गुनाहों से रोकता है और नेकी की तरफ ले जाता है।
  4. यह बात मुसलमान को उम्मीद भी देती है कि जब तक उसने तौबा का दरवाज़ा बंद नहीं किया, अल्लाह की रहमत उसके लिए खुली है; और यही उम्मीद उसे अल्लाह की इबादत पर स्थिर रखती है।
  5. इस आयत से यह भी पता चलता है कि अल्लाह का अज़ाब उसकी रहमत से अलग कोई चीज़ नहीं, बल्कि वह भी उसी के इंसाफ़ का हिस्सा है — और यह इंसाफ़ ही उसकी रहमत का एक पहलू है, क्योंकि ज़ालिम को उसकी सज़ा मिलना ही मज़लूम के लिए रहमत है।
🎧 सुनें

📜 आयत 48-52 — अल-हिज्र

48لَا يَمَسُّهُمْ فِيهَا نَصَبٌ وَمَا هُم مِّنْهَا بِمُخْرَجِينَ
उनको बेहश्त में तकलीफ छुएगी भी तो नहीं और न कभी उसमें से निकाले जाएँगें
49۞ نَبِّئْ عِبَادِي أَنِّي أَنَا الْغَفُورُ الرَّحِيمُ
(ऐ रसूल) मेरे बन्दों को आगाह करो कि बेशक मै बड़ा बख्शने वाला मेहरबान हूँ
50وَأَنَّ عَذَابِي هُوَ الْعَذَابُ الْأَلِيمُ
मगर साथ ही इसके (ये भी याद रहे कि) बेशक मेरा अज़ाब भी बड़ा दर्दनाक अज़ाब है
51وَنَبِّئْهُمْ عَن ضَيْفِ إِبْرَاهِيمَ
और उनको इबराहीम के मेहमान का हाल सुना दो
52إِذْ دَخَلُوا عَلَيْهِ فَقَالُوا سَلَامًا قَالَ إِنَّا مِنكُمْ وَجِلُونَ
कि जब ये इबराहीम के पास आए तो (पहले) उन्होंने सलाम किया इबराहीम ने (जवाब सलाम के बाद) कहा हमको तो तुम से डर मालूम होता है
अल-हिज्रकुरान सूची
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50आयत

अनुवाद — अल-हिज्र 50

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Tuesday, August 18, 2026

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