कि भूक और ख़ौफ को ओढ़ना (बिछौना) बना दिया और उन्हीं लोगों में का एक रसूल भी उनके पास आया तो उन्होंने उसे झुठलाया
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
رَسُولٌ مِّنْهُمْ: उन्हीं में से एक रसूल (जो उन्हीं की क़ौम से ताल्लुक़ रखता हो)
فَكَذَّبُوهُ: उन्होंने उसे झुठला दिया
فَأَخَذَهُمُ الْعَذَابُ: तो उन्हें अज़ाब ने आ पकड़ा
وَهُمْ ظَالِمُونَ: हालाँकि वे ज़ालिम थे (अपने ऊपर ज़ुल्म करने वाले थे)
तफ़सीर:
अल्लाह तआला ने मक्का के लोगों की ओर उन्हीं में से एक रसूल भेजा, जो हज़रत मुहम्मद ﷺ थे। वे उनके नसब, सच्चाई और अमानतदारी को अच्छी तरह जानते थे, क्योंकि वे उन्हीं के बीच पले-बढ़े थे। उन्हें "अमीन" (अमानतदार) कहते थे। लेकिन जब वे उनके पास अल्लाह का पैग़ाम लेकर आए, तो उन्होंने उसे झुठला दिया और उनकी दावत को क़बूल नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि अल्लाह का अज़ाब उन पर आ पड़ा — क़हत (सूखा), डर, और बद्र के मैदान में उनके सरदारों की हार और क़त्ल। यह अज़ाब उस वक़्त आया जब वे ज़ुल्म पर क़ायम थे — शिर्क कर रहे थे, अल्लाह के रास्ते से रोक रहे थे, और अपने रसूल को झुठला रहे थे। यानी यह अज़ाब उनके ज़ुल्म का ही नतीजा था, अल्लाह की तरफ़ से कोई बेइंसाफ़ी नहीं थी।
फ़ायदे:
अल्लाह तआला अपने बंदों पर बड़ा मेहरबान है कि उन्हीं में से रसूल भेजता है, ताकि वे उसकी बात आसानी से समझ सकें और उस पर ईमान ला सकें। यह अल्लाह की रहमत की सबसे बड़ी दलील है।
रसूल की पहचान और उसकी सच्चाई उसके अच्छे अख़लाक़ और अमानतदारी से होती है — यही वजह है कि अल्लाह ने रसूल को उन्हीं में से चुना।
जब इंसान हक़ को झुठलाता है और ज़ुल्म पर अड़ा रहता है, तो अल्लाह का अज़ाब देर से ही सही, ज़रूर आता है। इसलिए इंसान को चाहिए कि वह हक़ को क़बूल करे और अपनी ज़िद से बाज़ आए।
यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा करना चाहिए और उसके रसूल की पैरवी करनी चाहिए, वरना नेमतें अज़ाब में बदल सकती हैं।
इस आयत से मुसलमानों को यह सबक़ मिलता है कि वे अपने नबी ﷺ की मुहब्बत और इताअत को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाएँ, क्योंकि उनकी रिसालत सबसे बड़ी रहमत है, और उसे ठुकराने वालों का अंजाम बहुत बुरा होता है।
और हर शख़्श को जो कुछ भी उसने किया था उसका पूरा पूरा बदला मिलेगा और उन पर किसी तरह का जुल्म न किया जाएगा ख़ुदा ने एक गाँव की मसल बयान फरमाई जिसके रहने वाले हर तरह के चैन व इत्मेनान में थे हर तरफ से बाफराग़त (बहुत ज्यादा) उनकी रोज़ी उनके पास आई थी फिर उन लोगों ने ख़ुदा की नूअमतों की नाशुक्री की तो ख़ुदा ने उनकी करतूतों की बदौलत उनको मज़ा चखा दिया
फिर अज़ाब (ख़ुदा) ने उन्हें ले डाला और वह ज़ालिम थे ही तो ख़ुदा ने जो कुछ तुम्हें हलाल तय्यब (ताहिर) रोज़ी दी है उसको (शौक़ से) खाओ और अगर तुम खुदा ही की परसतिश (का दावा करते हो)
उसकी नेअमत का शुक्र अदा किया करो तुम पर उसने मुरदार और खून और सूअर का गोश्त और वह जानवर जिस पर (ज़बाह के वक्त) ख़ुदा के सिवा (किसी) और का नाम लिया जाए हराम किया है फिर जो शख़्श (मारे भूक के) मजबूर हो ख़ुदा से सरतापी (नाफरमानी) करने वाला हो और न (हद ज़रुरत से) बढ़ने वाला हो और (हराम खाए) तो बेशक ख़ुदा बख्शने वाला मेहरबान है
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