अन-नहल · 113/128
अनुवाद उच्चारण — अन-नहल
وَلَقَدْ جَاءَهُمْ رَسُولٌ مِّنْهُمْ فَكَذَّبُوهُ فَأَخَذَهُمُ الْعَذَابُ وَهُمْ ظَالِمُونَ ۝١١٣
Wa laqad jaaa`ahum Rasoolum minhum fakazzaboohu fa akhazahumul `azaabu wa hum zaalimoon
📖 हिंदी अर्थ
कि भूक और ख़ौफ को ओढ़ना (बिछौना) बना दिया और उन्हीं लोगों में का एक रसूल भी उनके पास आया तो उन्होंने उसे झुठलाया
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • رَسُولٌ مِّنْهُمْ: उन्हीं में से एक रसूल (जो उन्हीं की क़ौम से ताल्लुक़ रखता हो)
  • فَكَذَّبُوهُ: उन्होंने उसे झुठला दिया
  • فَأَخَذَهُمُ الْعَذَابُ: तो उन्हें अज़ाब ने आ पकड़ा
  • وَهُمْ ظَالِمُونَ: हालाँकि वे ज़ालिम थे (अपने ऊपर ज़ुल्म करने वाले थे)

तफ़सीर:

अल्लाह तआला ने मक्का के लोगों की ओर उन्हीं में से एक रसूल भेजा, जो हज़रत मुहम्मद ﷺ थे। वे उनके नसब, सच्चाई और अमानतदारी को अच्छी तरह जानते थे, क्योंकि वे उन्हीं के बीच पले-बढ़े थे। उन्हें "अमीन" (अमानतदार) कहते थे। लेकिन जब वे उनके पास अल्लाह का पैग़ाम लेकर आए, तो उन्होंने उसे झुठला दिया और उनकी दावत को क़बूल नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि अल्लाह का अज़ाब उन पर आ पड़ा — क़हत (सूखा), डर, और बद्र के मैदान में उनके सरदारों की हार और क़त्ल। यह अज़ाब उस वक़्त आया जब वे ज़ुल्म पर क़ायम थे — शिर्क कर रहे थे, अल्लाह के रास्ते से रोक रहे थे, और अपने रसूल को झुठला रहे थे। यानी यह अज़ाब उनके ज़ुल्म का ही नतीजा था, अल्लाह की तरफ़ से कोई बेइंसाफ़ी नहीं थी।

फ़ायदे:

  1. अल्लाह तआला अपने बंदों पर बड़ा मेहरबान है कि उन्हीं में से रसूल भेजता है, ताकि वे उसकी बात आसानी से समझ सकें और उस पर ईमान ला सकें। यह अल्लाह की रहमत की सबसे बड़ी दलील है।
  2. रसूल की पहचान और उसकी सच्चाई उसके अच्छे अख़लाक़ और अमानतदारी से होती है — यही वजह है कि अल्लाह ने रसूल को उन्हीं में से चुना।
  3. जब इंसान हक़ को झुठलाता है और ज़ुल्म पर अड़ा रहता है, तो अल्लाह का अज़ाब देर से ही सही, ज़रूर आता है। इसलिए इंसान को चाहिए कि वह हक़ को क़बूल करे और अपनी ज़िद से बाज़ आए।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा करना चाहिए और उसके रसूल की पैरवी करनी चाहिए, वरना नेमतें अज़ाब में बदल सकती हैं।
  5. इस आयत से मुसलमानों को यह सबक़ मिलता है कि वे अपने नबी ﷺ की मुहब्बत और इताअत को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाएँ, क्योंकि उनकी रिसालत सबसे बड़ी रहमत है, और उसे ठुकराने वालों का अंजाम बहुत बुरा होता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 111-115 — अन-नहल

111۞ يَوْمَ تَأْتِي كُلُّ نَفْسٍ تُجَادِلُ عَن نَّفْسِهَا وَتُوَفَّىٰ كُلُّ نَفْسٍ مَّا عَمِلَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
और (उस दिन को याद) करो जिस दिन हर शख़्श अपनी ज़ात के बारे में झगड़ने को आ मौजूद होगा
112وَضَرَبَ اللَّهُ مَثَلًا قَرْيَةً كَانَتْ آمِنَةً مُّطْمَئِنَّةً يَأْتِيهَا رِزْقُهَا رَغَدًا مِّن كُلِّ مَكَانٍ فَكَفَرَتْ بِأَنْعُمِ اللَّهِ فَأَذَاقَهَا اللَّهُ لِبَاسَ الْجُوعِ وَالْخَوْفِ بِمَا كَانُوا يَصْنَعُونَ
और हर शख़्श को जो कुछ भी उसने किया था उसका पूरा पूरा बदला मिलेगा और उन पर किसी तरह का जुल्म न किया जाएगा ख़ुदा ने एक गाँव की मसल बयान फरमाई जिसके रहने वाले हर तरह के चैन व इत्मेनान में थे हर तरफ से बाफराग़त (बहुत ज्यादा) उनकी रोज़ी उनके पास आई थी फिर उन लोगों ने ख़ुदा की नूअमतों की नाशुक्री की तो ख़ुदा ने उनकी करतूतों की बदौलत उनको मज़ा चखा दिया
113وَلَقَدْ جَاءَهُمْ رَسُولٌ مِّنْهُمْ فَكَذَّبُوهُ فَأَخَذَهُمُ الْعَذَابُ وَهُمْ ظَالِمُونَ
कि भूक और ख़ौफ को ओढ़ना (बिछौना) बना दिया और उन्हीं लोगों में का एक रसूल भी उनके पास आया तो उन्होंने उसे झुठलाया
114فَكُلُوا مِمَّا رَزَقَكُمُ اللَّهُ حَلَالًا طَيِّبًا وَاشْكُرُوا نِعْمَتَ اللَّهِ إِن كُنتُمْ إِيَّاهُ تَعْبُدُونَ
फिर अज़ाब (ख़ुदा) ने उन्हें ले डाला और वह ज़ालिम थे ही तो ख़ुदा ने जो कुछ तुम्हें हलाल तय्यब (ताहिर) रोज़ी दी है उसको (शौक़ से) खाओ और अगर तुम खुदा ही की परसतिश (का दावा करते हो)
115إِنَّمَا حَرَّمَ عَلَيْكُمُ الْمَيْتَةَ وَالدَّمَ وَلَحْمَ الْخِنزِيرِ وَمَا أُهِلَّ لِغَيْرِ اللَّهِ بِهِ ۖ فَمَنِ اضْطُرَّ غَيْرَ بَاغٍ وَلَا عَادٍ فَإِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
उसकी नेअमत का शुक्र अदा किया करो तुम पर उसने मुरदार और खून और सूअर का गोश्त और वह जानवर जिस पर (ज़बाह के वक्त) ख़ुदा के सिवा (किसी) और का नाम लिया जाए हराम किया है फिर जो शख़्श (मारे भूक के) मजबूर हो ख़ुदा से सरतापी (नाफरमानी) करने वाला हो और न (हद ज़रुरत से) बढ़ने वाला हो और (हराम खाए) तो बेशक ख़ुदा बख्शने वाला मेहरबान है
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अनुवाद — अन-नहल 113

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Tuesday, August 18, 2026

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