अन-नहल · 124/128
अनुवाद उच्चारण — अन-नहल
إِنَّمَا جُعِلَ السَّبْتُ عَلَى الَّذِينَ اخْتَلَفُوا فِيهِ ۚ وَإِنَّ رَبَّكَ لَيَحْكُمُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ ۝١٢٤
Innnamaa ju`ilas Sabtu `alal lazeenakhtalafoo feeh; wa inna Rabbaka la yahkumu bainahum Yawmal Qiyaamati feemaa kaanoo feehi yakhtalifoon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) हफ्ते (के दिन) की ताज़ीम तो बस उन्हीं लोगों पर लाज़िम की गई थी (यहूद व नसारा इसके बारे में) एख्तिलाफ करते थे और कुछ शक़ नहीं कि तुम्हारा परवरदिगार उनके दरमियान जिस अग्र में वह झगड़ा करते थे क़यामत के दिन फैसला कर देगा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • السَّبْتُ (सब्त): शनिवार का दिन, जिसे यहूदियों के लिए आराम और इबादत का दिन बनाया गया था।
  • جُعِلَ (जुइला): बनाया गया, निर्धारित किया गया।
  • اخْتَلَفُوا (इख्तलफू): उन्होंने मतभेद किया, विरोध किया।
  • لَيَحْكُمُ (लयहकुम): अवश्य निर्णय करेगा, फैसला सुनाएगा।

तफसीर (व्याख्या):

यह आयत यहूदियों के उस झूठे दावे का उत्तर देती है जिसमें वे कहते थे कि शनिवार (सब्त) का सम्मान हमेशा से उन्हीं के लिए निर्धारित था। अल्लाह तआला स्पष्ट करता है कि शनिवार की पूजा और उस दिन को इबादत के लिए विशेष करने का आदेश केवल यहूदियों पर लागू किया गया था, और वह भी उनके मतभेद और हठधर्मिता के कारण। वास्तव में, उन्हें जुमा (शुक्रवार) के दिन की तरफ निर्देशित किया गया था, लेकिन उन्होंने अपने पैगंबर से विरोध किया और शनिवार को चुन लिया। यह उनकी सज़ा थी कि उन पर यह दिन अनिवार्य कर दिया गया, जबकि वे उस दिन की असली हकीकत को समझ नहीं पाए और उसमें भी मतभेद करते रहे।

यह आयत यह भी बताती है कि यहूदियों ने शनिवार के संबंध में जो मतभेद किए, वे केवल उनके पैगंबर के साथ नहीं थे, बल्कि उन्होंने आपस में भी कई फिरकों में बंटकर अलग-अलग राय अपनाईं। अल्लाह तआला नबी (ﷺ) को तसल्ली देते हुए फरमाता है कि आप इन मतभेदों पर परेशान न हों, क्योंकि आपका रब क़यामत के दिन इन सबके बीच न्याय करेगा और हर फिरके को उसके किए का पूरा बदला देगा। वही सच्चा न्यायाधीश है, और उसका फैसला अटल है।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. इस आयत से हमें सीख मिलती है कि अल्लाह के आदेशों को बिना किसी हठधर्मिता के स्वीकार करना चाहिए। यहूदियों ने जब अपनी ज़िद और मतभेद की वजह से सच्चे दिन को छोड़ दिया, तो उन्हें वह दिन थोप दिया गया जो उनके लिए बोझ बन गया। यह हमारे लिए सबक है कि हम अल्लाह और उसके रसूल (ﷺ) के फैसलों पर पूरी तरह राज़ी रहें।
  2. यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि मतभेद और फूट अल्लाह की नाराज़गी का कारण बनते हैं। जबकि एकता और आपसी भाईचारा अल्लाह की रहमत का ज़रिया है।
  3. क़यामत के दिन अल्लाह का न्याय हर उस मामले में होगा जिसमें लोगों ने दुनिया में मतभेद किया। यह हमें याद दिलाता है कि हमें अपने विवादों में सब्र रखना चाहिए और अल्लाह पर भरोसा करना चाहिए, क्योंकि असली इंसाफ़ उसी के पास है।
  4. इस आयत में नबी (ﷺ) के लिए तसल्ली है और हमारे लिए भी कि जब हम सच्चाई पर हों और लोग विरोध करें, तो हमें घबराना नहीं चाहिए; अल्लाह का फैसला हमारे पक्ष में होगा।


📜 आयत 122-126 — अन-नहल

122وَآتَيْنَاهُ فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً ۖ وَإِنَّهُ فِي الْآخِرَةِ لَمِنَ الصَّالِحِينَ
और हमने उन्हें दुनिया में भी (हर तरह की) बेहतरी अता की थी
123ثُمَّ أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ أَنِ اتَّبِعْ مِلَّةَ إِبْرَاهِيمَ حَنِيفًا ۖ وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشْرِكِينَ
और वह आख़िरत में भी यक़ीनन नेको कारों से होगें ऐ रसूल फिर तुम्हारे पास वही भेजी कि इबराहीम के तरीक़े की पैरवी करो जो बातिल से कतरा के चलते थे और मुशरेकीन से नहीं थे
124إِنَّمَا جُعِلَ السَّبْتُ عَلَى الَّذِينَ اخْتَلَفُوا فِيهِ ۚ وَإِنَّ رَبَّكَ لَيَحْكُمُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ
(ऐ रसूल) हफ्ते (के दिन) की ताज़ीम तो बस उन्हीं लोगों पर लाज़िम की गई थी (यहूद व नसारा इसके बारे में) एख्तिलाफ करते थे और कुछ शक़ नहीं कि तुम्हारा परवरदिगार उनके दरमियान जिस अग्र में वह झगड़ा करते थे क़यामत के दिन फैसला कर देगा
125ادْعُ إِلَىٰ سَبِيلِ رَبِّكَ بِالْحِكْمَةِ وَالْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ ۖ وَجَادِلْهُم بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ ۚ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِمَن ضَلَّ عَن سَبِيلِهِ ۖ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ
(ऐ रसूल) तुम (लोगों को) अपने परवरदिगार की राह पर हिकमत और अच्छी अच्छी नसीहत के ज़रिए से बुलाओ और बहस व मुबाशा करो भी तो इस तरीक़े से जो लोगों के नज़दीक सबसे अच्छा हो इसमें शक़ नहीं कि जो लोग ख़ुदा की राह से भटक गए उनको तुम्हारा परवरदिगार खूब जानता है
126وَإِنْ عَاقَبْتُمْ فَعَاقِبُوا بِمِثْلِ مَا عُوقِبْتُم بِهِ ۖ وَلَئِن صَبَرْتُمْ لَهُوَ خَيْرٌ لِّلصَّابِرِينَ
और हिदायत याफ़ता लोगों से भी खूब वाक़िफ है और अगर (मुख़ालिफीन के साथ) सख्ती करो भी तो वैसी ही सख्ती करो जैसे सख्ती उन लोगों ने तुम पर की थी और अगर तुम सब्र करो तो सब्र करने वालों के वास्ते बेहतर हैं
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अनुवाद — अन-नहल 124

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Tuesday, August 18, 2026

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