अन-नहल · 93/128
अनुवाद उच्चारण — अन-नहल
وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَجَعَلَكُمْ أُمَّةً وَاحِدَةً وَلَٰكِن يُضِلُّ مَن يَشَاءُ وَيَهْدِي مَن يَشَاءُ ۚ وَلَتُسْأَلُنَّ عَمَّا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ۝٩٣
Wa law shaaa`al laahu laja`alakum ummmatanw waahidatanw wa laakiny yudillu many-yashaaa`u wa yahdee many-yashaaa`; wa latus`alunna `ammaa kuntum ta`maloon
📖 हिंदी अर्थ
और अगर ख़ुदा चाहता तो तुम सबको एक ही (किस्म के) गिरोह बना देता मगर वह तो जिसको चाहता है गुमराही में छोड़ देता है और जिसकी चाहता है हिदायत करता है और जो कुछ तुम लोग दुनिया में किया करते थे उसकी बाज़ पुर्स (पुछ गछ) तुमसे ज़रुर की जाएगी

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أُمَّةً وَاحِدَةً: एक ही उम्मत या एक ही धर्म (इस्लाम) पर इकट्ठे हुए लोग।
  • يُضِلُّ: गुमराह करता है (अपने न्याय के अनुसार उसे हिदायत से वंचित रखता है)।
  • يَهْدِي: हिदायत देता है (अपने अनुग्रह से सीधे रास्ते पर चलाता है)।
  • لَتُسْأَلُنَّ: अवश्य ही तुमसे पूछा जाएगा (क़ियामत के दिन)।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने इस आयत में अपनी इच्छा और हिकमत (बुद्धिमत्ता) का ज़िक्र करते हुए फ़रमाया कि अगर वह चाहता तो तुम सबको एक ही उम्मत बना देता, यानी सबको इस्लाम और ईमान पर इकट्ठा कर देता, और कोई मतभेद न होता। लेकिन उसने अपनी हिकमत से ऐसा नहीं किया। वह जिसे चाहता है गुमराह करता है—यह उसका न्याय (अदल) है, क्योंकि वह जानता है कि कौन सच्चाई को छोड़कर गुमराही को पसंद करता है। और जिसे चाहता है हिदायत देता है—यह उसका अनुग्रह (फ़ज़ल) है, क्योंकि वह देखता है कि कौन हक़ को अपनाने का इरादा रखता है। यह सब उसकी इच्छा और ज्ञान के अनुसार होता है, कोई उसके फ़ैसले को टाल नहीं सकता।

फिर अल्लाह ने चेतावनी दी कि क़ियामत के दिन तुम सबसे उन कर्मों के बारे में ज़रूर पूछा जाएगा जो तुम दुनिया में करते थे—चाहे वह अच्छे हों या बुरे। यह पूछताछ तुम्हें शर्मिंदा करने और तुम्हारे किए का हिसाब लेने के लिए होगी, न कि जानकारी हासिल करने के लिए, क्योंकि अल्लाह को सब कुछ पहले से मालूम है। इसके बाद हर व्यक्ति को उसके कर्मों का पूरा बदला दिया जाएगा।


फ़ायदे (सीख):

  1. अल्लाह की इच्छा और हिकमत पर पूरा भरोसा रखना चाहिए—वह जो करता है, उसमें बुद्धिमत्ता और न्याय है, भले ही हमारी समझ में न आए।
  2. हिदायत और गुमराही अल्लाह के हाथ में है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इंसान मजबूर है; बल्कि इंसान अपनी मर्जी से रास्ता चुनता है, और अल्लाह उसकी नीयत के अनुसार उसे सहारा देता है या छोड़ देता है।
  3. यह आयत इंसान को ज़िम्मेदारी का एहसास कराती है—हर काम का हिसाब होगा, इसलिए जीवन को गंभीरता से जीना चाहिए और अल्लाह की नाराज़गी से बचना चाहिए।
  4. अल्लाह का अनुग्रह (फ़ज़ल) बहुत बड़ा है—वह जिसे चाहता है हिदायत देकर अपनी रहमत से नवाज़ता है, इसलिए हमें उससे हिदायत की दुआ मांगते रहना चाहिए।
  5. क़ियामत का दिन यक़ीनी है, और उस दिन की याद इंसान को गुनाहों से रोकती है और नेक कामों की तरफ प्रेरित करती है—यही ईमान की निशानी है।


📜 आयत 91-95 — अन-नहल

91وَأَوْفُوا بِعَهْدِ اللَّهِ إِذَا عَاهَدتُّمْ وَلَا تَنقُضُوا الْأَيْمَانَ بَعْدَ تَوْكِيدِهَا وَقَدْ جَعَلْتُمُ اللَّهَ عَلَيْكُمْ كَفِيلًا ۚ إِنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا تَفْعَلُونَ
और जब तुम लोग बाहम क़ौल व क़रार कर लिया करो तो ख़ुदा के एहदो पैमान को पूरा करो और क़समों को उनके पक्का हो जाने के बाद न तोड़ा करो हालॉकि तुम तो ख़ुदा को अपना ज़ामिन बना चुके हो जो कुछ भी तुम करते हो ख़ुदा उसे ज़रुर जानता है
92وَلَا تَكُونُوا كَالَّتِي نَقَضَتْ غَزْلَهَا مِن بَعْدِ قُوَّةٍ أَنكَاثًا تَتَّخِذُونَ أَيْمَانَكُمْ دَخَلًا بَيْنَكُمْ أَن تَكُونَ أُمَّةٌ هِيَ أَرْبَىٰ مِنْ أُمَّةٍ ۚ إِنَّمَا يَبْلُوكُمُ اللَّهُ بِهِ ۚ وَلَيُبَيِّنَنَّ لَكُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ مَا كُنتُمْ فِيهِ تَخْتَلِفُونَ
और तुम लोग (क़समों के तोड़ने में) उस औरत के ऐसे न हो जो अपना सूत मज़बूत कातने के बाद टुकड़े टुकड़े करके तोड़ डाले कि अपने एहदो को आपस में उस बात की मक्कारी का ज़रिया बनाने लगो कि एक गिरोह दूसरे गिरोह से (ख्वामख़वाह) बढ़ जाए इससे बस ख़ुदा तुमको आज़माता है (कि तुम किसी की पालाइश करते हो) और जिन बातों में तुम दुनिया में झगड़ते थे क़यामत के दिन ख़ुदा खुद तुम से साफ साफ बयान कर देगा
93وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَجَعَلَكُمْ أُمَّةً وَاحِدَةً وَلَٰكِن يُضِلُّ مَن يَشَاءُ وَيَهْدِي مَن يَشَاءُ ۚ وَلَتُسْأَلُنَّ عَمَّا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
और अगर ख़ुदा चाहता तो तुम सबको एक ही (किस्म के) गिरोह बना देता मगर वह तो जिसको चाहता है गुमराही में छोड़ देता है और जिसकी चाहता है हिदायत करता है और जो कुछ तुम लोग दुनिया में किया करते थे उसकी बाज़ पुर्स (पुछ गछ) तुमसे ज़रुर की जाएगी
94وَلَا تَتَّخِذُوا أَيْمَانَكُمْ دَخَلًا بَيْنَكُمْ فَتَزِلَّ قَدَمٌ بَعْدَ ثُبُوتِهَا وَتَذُوقُوا السُّوءَ بِمَا صَدَدتُّمْ عَن سَبِيلِ اللَّهِ ۖ وَلَكُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ
और तुम अपनी क़समों को आपस में के फसाद का सबब न बनाओ ताकि (लोगों के) क़दम जमने के बाद (इस्लाम से) उखड़ जाएँ और फिर आख़िरकार क़यामत में तुम्हें लोगों को ख़ुदा की राह से रोकने की पादाश (रोकने के बदले) में अज़ाब का मज़ा चखना पड़े और तुम्हारे वास्ते बड़ा सख्त अज़ाब हो
95وَلَا تَشْتَرُوا بِعَهْدِ اللَّهِ ثَمَنًا قَلِيلًا ۚ إِنَّمَا عِندَ اللَّهِ هُوَ خَيْرٌ لَّكُمْ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
और ख़ुदा के एहदो पैमान के बदले थोड़ी क़ीमत (दुनयावी नफा) न लो अगर तुम जानते (बूझते) हो तो (समझ लो कि) जो कुछ ख़ुदा के पास है वह उससे कहीं बेहतर है
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अनुवाद — अन-नहल 93

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Tuesday, August 18, 2026

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