अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- دَخَلًا: धोखा, छल, फरेब।
- فَتَزِلَّ قَدَمٌ: पैर फिसल जाए, यानी इंसान सच्चाई और स्थिरता से हटकर गुमराही में जा पड़े।
- ثُبُوتِهَا: उसका जमा हुआ, स्थिर और मज़बूत होना।
- السُّوءَ: बुराई, तकलीफ़, सज़ा।
- صَدَدتُّمْ: तुमने रोका, बाधा डाली।
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला इस आयत में मुसलमानों को एक बहुत ही अहम नसीहत दे रहा है कि अपनी क़समों (शपथों) को आपस में धोखा और छल का ज़रिया न बनाओ। यानी किसी से वादा या अहद करो तो उसे पूरा करो, और क़सम खाकर किसी को धोखा मत दो। अगर तुम ऐसा करोगे कि क़सम खाकर लोगों को भरोसा दिलाओ और फिर उसे तोड़ दो, तो यह बहुत बड़ी ग़लती होगी।
इसका नतीजा यह होगा कि जिस तरह एक इंसान का पैर जमीन पर मज़बूती से जमा हुआ हो और फिर अचानक फिसल जाए, उसी तरह तुम्हारे कदम सच्चाई और ईमान की राह से फिसल जाएंगे। पहले तुम सीधे रास्ते पर चल रहे थे, लेकिन धोखे और झूठ की वजह से तुम गुमराही में जा पड़ोगे।
फिर अल्लाह फ़रमाता है कि इस धोखे की वजह से तुम दुनिया में भी बुरा अंजाम चखोगे — यानी तकलीफ़, रुसवाई और सज़ा — क्योंकि तुमने लोगों को अल्लाह के रास्ते (इस्लाम) से रोका। जब लोग देखेंगे कि तुम खुद अपने वादों और क़समों पर कायम नहीं रहते, तो वे इस्लाम से दूर भागेंगे और उसके बारे में बुरा ख़याल करेंगे। यानी तुम्हारे बुरे कामों की वजह से लोगों को दीन से दूर होने का बहाना मिलेगा।
और आख़िरत (परलोक) में तुम्हारे लिए बहुत बड़ा और दर्दनाक अज़ाब है, जो इस गुनाह की सज़ा होगी।
फ़ायदे और सबक:
- ईमानदारी और वादे की पाबंदी: इस आयत से हमें सीख मिलती है कि मुसलमान को चाहिए कि वह अपने वादों और क़समों को पूरा करे। झूठी क़समें और धोखा देना बड़े गुनाह हैं और इंसान को बर्बाद कर देते हैं।
- अमानत और भरोसा: इस्लाम सिखाता है कि लोगों के बीच भरोसा और अमानत होनी चाहिए। जो इंसान धोखा देता है, वह समाज में बुराई फैलाता है और लोगों का आपसी भरोसा खत्म करता है।
- दूसरों को रास्ते से रोकने का गुनाह: अगर हमारे बुरे आचरण की वजह से कोई इंसान इस्लाम से दूर हो जाए, तो यह बहुत बड़ा गुनाह है। हमें अपने अच्छे किरदार से लोगों को दीन की तरफ बुलाना चाहिए, न कि अपनी गलतियों से उन्हें दूर भगाना चाहिए।
- दुनिया और आख़िरत दोनों में नुकसान: धोखा और झूठ सिर्फ आख़िरत में ही नहीं, बल्कि दुनिया में भी इंसान को रुसवाई और तकलीफ़ में डालता है। अल्लाह की नाराज़गी दोनों जगहों पर इंसान के लिए बर्बादी का सबब बनती है।
- स्थिरता और सच्चाई पर क़ायम रहना: जिस तरह पैर का जमीन पर मज़बूत होना ज़रूरी है, उसी तरह ईमान और सच्चाई पर स्थिर रहना बहुत ज़रूरी है। एक बार सच्चाई पर क़ायम हो जाने के बाद उसे छोड़ना बहुत बड़ी भूल है।
📜 आयत 92-96 — अन-नहल
अनुवाद — अन-नहल 94
सूरा अन-नहल आयत 94 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और तुम अपनी क़समों को आपस में के फसाद का…सूरा आयत 94/128 — अन-नहल النحل (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अन-नहल सुनें, अन-नहल अनुवाद, अन-नहल mp3, अन-नहल pdf. आयत 92–96. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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