अल-इसरा · 35/111
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-इसरा
وَأَوْفُوا الْكَيْلَ إِذَا كِلْتُمْ وَزِنُوا بِالْقِسْطَاسِ الْمُسْتَقِيمِ ۚ ذَٰلِكَ خَيْرٌ وَأَحْسَنُ تَأْوِيلًا ۝٣٥
Wa awful kaila izaa kiltum wa zinoo bilqistaasil mustaqeem; zaalika khairunw wa ahsanu taaweelaa
📖 हिंदी अर्थ
और जब नाप तौल कर देना हो तो पैमाने को पूरा भर दिया करो और (जब तौल कर देना हो तो) बिल्कुल ठीक तराजू से तौला करो (मामले में) यही (तरीक़ा) बेहतर है और अन्जाम (भी उसका) अच्छा है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • अल-क़िस्तास अल-मुस्तक़ीम: सीधा और न्यायपूर्ण तराज़ू, जिसमें कोई कमी या अधिकता न हो।

व्याख्या:

अल्लाह तआला इस आयत में न्याय और ईमानदारी का आदेश दे रहा है। जब तुम किसी के लिए नाप-तौल करो तो पूरा-पूरा नापो और उसमें कमी न करो। इसी प्रकार जब तौलो तो सीधे और न्यायपूर्ण तराज़ू से तौलो, जिसमें कोई कमी या अधिकता न हो। यह आदेश सिर्फ़ व्यापार तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन के हर उस मामले में लागू होता है जहाँ नाप-तौल या माप-तोल का लेन-देन होता है।

यह न्यायपूर्ण व्यवहार दुनिया में भी बेहतर है क्योंकि इससे लोगों का भरोसा बढ़ता है, व्यापार में बरकत होती है और समाज में अमन-चैन क़ायम रहता है। और आख़िरत में भी इसका अंजाम बेहतर है, क्योंकि अल्लाह न्याय करने वालों से प्रेम करता है और उन्हें अच्छा बदला देगा। यह कमी करने वालों के मुक़ाबले में कहीं अधिक उत्तम और श्रेष्ठ मार्ग है।

लाभ और शिक्षाएँ:

  1. इस्लाम ने लेन-देन में पूरी ईमानदारी और न्याय का आदेश दिया है, जो समाज में भरोसे और स्थिरता की नींव रखता है।
  2. नाप-तौल में कमी करना न केवल दुनिया में बुरा अंजाम देता है बल्कि आख़िरत में भी सख़्त पकड़ का कारण बनेगा।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि छोटे-छोटे मामलों में भी दीनदारी और न्याय का पालन करना चाहिए, क्योंकि इसी से अल्लाह की रज़ा हासिल होती है।
  4. न्याय और ईमानदारी का रास्ता ही दुनिया और आख़िरत दोनों में भलाई और कामयाबी का ज़रिया है।


📜 आयत 33-37 — सूरा अल-इसरा

33وَلَا تَقْتُلُوا النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ ۗ وَمَن قُتِلَ مَظْلُومًا فَقَدْ جَعَلْنَا لِوَلِيِّهِ سُلْطَانًا فَلَا يُسْرِف فِّي الْقَتْلِ ۖ إِنَّهُ كَانَ مَنصُورًا
और जिस जान का मारना ख़ुदा ने हराम कर दिया है उसके क़त्ल न करना मगर जायज़ तौर पर और जो शख़्श नाहक़ मारा जाए तो हमने उसके वारिस को (क़ातिल पर क़सास का क़ाबू दिया है तो उसे चाहिए कि क़त्ल (ख़ून का बदला लेने) में ज्यादती न करे बेशक वह मदद दिया जाएगा
34وَلَا تَقْرَبُوا مَالَ الْيَتِيمِ إِلَّا بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ حَتَّىٰ يَبْلُغَ أَشُدَّهُ ۚ وَأَوْفُوا بِالْعَهْدِ ۖ إِنَّ الْعَهْدَ كَانَ مَسْئُولًا
(कि क़त्ल ही करे और माफ न करे) और यतीम जब तक जवानी को पहुँचे उसके माल के क़रीब भी न पहुँच जाना मगर हाँ इस तरह पर कि (यतीम के हक़ में) बेहतर हो और एहद को पूरा करो क्योंकि (क़यामत में) एहद की ज़रुर पूछ गछ होगी
35وَأَوْفُوا الْكَيْلَ إِذَا كِلْتُمْ وَزِنُوا بِالْقِسْطَاسِ الْمُسْتَقِيمِ ۚ ذَٰلِكَ خَيْرٌ وَأَحْسَنُ تَأْوِيلًا
और जब नाप तौल कर देना हो तो पैमाने को पूरा भर दिया करो और (जब तौल कर देना हो तो) बिल्कुल ठीक तराजू से तौला करो (मामले में) यही (तरीक़ा) बेहतर है और अन्जाम (भी उसका) अच्छा है
36وَلَا تَقْفُ مَا لَيْسَ لَكَ بِهِ عِلْمٌ ۚ إِنَّ السَّمْعَ وَالْبَصَرَ وَالْفُؤَادَ كُلُّ أُولَٰئِكَ كَانَ عَنْهُ مَسْئُولًا
और जिस चीज़ का कि तुम्हें यक़ीन न हो (ख्वाह मा ख्वाह) उसके पीछे न पड़ा करो (क्योंकि) कान और ऑंख और दिल इन सबकी (क़यामत के दिना यक़ीनन बाज़पुर्स होती है
37وَلَا تَمْشِ فِي الْأَرْضِ مَرَحًا ۖ إِنَّكَ لَن تَخْرِقَ الْأَرْضَ وَلَن تَبْلُغَ الْجِبَالَ طُولًا
और (देखो) ज़मीन पर अकड़ कर न चला करो क्योंकि तू (अपने इस धमाके की चाल से) न तो ज़मीन को हरगिज़ फाड़ डालेगा और न (तनकर चलने से) हरगिज़ लम्बाई में पहाड़ों के बराबर पहुँच सकेगा
अल-इसराकुरान सूची
111आयत
मक्कीअवतरण स्थान
35आयत

अनुवाद — अल-इसरा 35

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Thursday, October 1, 2026

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