Wa awful kaila izaa kiltum wa zinoo bilqistaasil mustaqeem; zaalika khairunw wa ahsanu taaweelaa
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
और जब नाप तौल कर देना हो तो पैमाने को पूरा भर दिया करो और (जब तौल कर देना हो तो) बिल्कुल ठीक तराजू से तौला करो (मामले में) यही (तरीक़ा) बेहतर है और अन्जाम (भी उसका) अच्छा है
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اور جب (کوئی چیز) ناپ کر دینے لگو تو پیمانہ پورا بھرا کرو اور (جب تول کر دو تو) ترازو سیدھی رکھ کر تولا کرو۔ یہ بہت اچھی بات اور انجام کے لحاظ سے بھی بہت بہتر ہے
और जब नाप तौल कर देना हो तो पैमाने को पूरा भर दिया करो और (जब तौल कर देना हो तो) बिल्कुल ठीक तराजू से तौला करो (मामले में) यही (तरीक़ा) बेहतर है और अन्जाम (भी उसका) अच्छा है
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
अल-क़िस्तास अल-मुस्तक़ीम: सीधा और न्यायपूर्ण तराज़ू, जिसमें कोई कमी या अधिकता न हो।
व्याख्या:
अल्लाह तआला इस आयत में न्याय और ईमानदारी का आदेश दे रहा है। जब तुम किसी के लिए नाप-तौल करो तो पूरा-पूरा नापो और उसमें कमी न करो। इसी प्रकार जब तौलो तो सीधे और न्यायपूर्ण तराज़ू से तौलो, जिसमें कोई कमी या अधिकता न हो। यह आदेश सिर्फ़ व्यापार तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन के हर उस मामले में लागू होता है जहाँ नाप-तौल या माप-तोल का लेन-देन होता है।
यह न्यायपूर्ण व्यवहार दुनिया में भी बेहतर है क्योंकि इससे लोगों का भरोसा बढ़ता है, व्यापार में बरकत होती है और समाज में अमन-चैन क़ायम रहता है। और आख़िरत में भी इसका अंजाम बेहतर है, क्योंकि अल्लाह न्याय करने वालों से प्रेम करता है और उन्हें अच्छा बदला देगा। यह कमी करने वालों के मुक़ाबले में कहीं अधिक उत्तम और श्रेष्ठ मार्ग है।
लाभ और शिक्षाएँ:
इस्लाम ने लेन-देन में पूरी ईमानदारी और न्याय का आदेश दिया है, जो समाज में भरोसे और स्थिरता की नींव रखता है।
नाप-तौल में कमी करना न केवल दुनिया में बुरा अंजाम देता है बल्कि आख़िरत में भी सख़्त पकड़ का कारण बनेगा।
यह आयत हमें सिखाती है कि छोटे-छोटे मामलों में भी दीनदारी और न्याय का पालन करना चाहिए, क्योंकि इसी से अल्लाह की रज़ा हासिल होती है।
न्याय और ईमानदारी का रास्ता ही दुनिया और आख़िरत दोनों में भलाई और कामयाबी का ज़रिया है।
और जिस जान का मारना ख़ुदा ने हराम कर दिया है उसके क़त्ल न करना मगर जायज़ तौर पर और जो शख़्श नाहक़ मारा जाए तो हमने उसके वारिस को (क़ातिल पर क़सास का क़ाबू दिया है तो उसे चाहिए कि क़त्ल (ख़ून का बदला लेने) में ज्यादती न करे बेशक वह मदद दिया जाएगा
(कि क़त्ल ही करे और माफ न करे) और यतीम जब तक जवानी को पहुँचे उसके माल के क़रीब भी न पहुँच जाना मगर हाँ इस तरह पर कि (यतीम के हक़ में) बेहतर हो और एहद को पूरा करो क्योंकि (क़यामत में) एहद की ज़रुर पूछ गछ होगी
और जब नाप तौल कर देना हो तो पैमाने को पूरा भर दिया करो और (जब तौल कर देना हो तो) बिल्कुल ठीक तराजू से तौला करो (मामले में) यही (तरीक़ा) बेहतर है और अन्जाम (भी उसका) अच्छा है
और (देखो) ज़मीन पर अकड़ कर न चला करो क्योंकि तू (अपने इस धमाके की चाल से) न तो ज़मीन को हरगिज़ फाड़ डालेगा और न (तनकर चलने से) हरगिज़ लम्बाई में पहाड़ों के बराबर पहुँच सकेगा
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