अल-इसरा · 39/111
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-इसरा
ذَٰلِكَ مِمَّا أَوْحَىٰ إِلَيْكَ رَبُّكَ مِنَ الْحِكْمَةِ ۗ وَلَا تَجْعَلْ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ فَتُلْقَىٰ فِي جَهَنَّمَ مَلُومًا مَّدْحُورًا ۝٣٩
Zaalika mimmaaa awhaaa ilaika Rabbuka minal hikmah; wa laa taj`al ma`allaahi ilaahan aakhara fatulqaa fee Jahannama maloomam mad hooraa
📖 हिंदी अर्थ
ये बात तो हिकमत की उन बातों में से जो तुम्हारे परवरदिगार ने तुम्हारे पास 'वही' भेजी और ख़ुदा के साथ कोई दूसरा माबूद न बनाना और न तू मलामत ज़दा राइन्द (धुत्कारा) होकर जहन्नुम में झोंक दिया जाएगा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَلُومًا (मलूमन): वह व्यक्ति जिसे स्वयं अपनी आत्मा और दूसरे लोग मलामत करें, अर्थात् धिक्कारें और उसे बुरा कहें।
  • مَّدْحُورًا (मद्हूरन): हर भलाई से दूर किया हुआ, अपमानित और तिरस्कृत किया हुआ, जिसे रहमत से निकाल दिया गया हो।

तफसीर (व्याख्या):

यह वह सब कुछ है जो आपके रब ने आपको हिकमत (बुद्धि और समझ) के रूप में वह्य (प्रकाशना) के माध्यम से दिया है। इसमें वे सभी आदेश और निषेध शामिल हैं जो पिछली आयातों में बताए गए—अच्छे कर्मों का आदेश, बुरे स्वभाव और नीच कार्यों से रोकना, रिश्तेदारों के साथ अच्छा व्यवहार, अनाथों और गरीबों का ख्याल रखना, वादा पूरा करना, नाप-तौल में पूरा देना, घमंड और अहंकार से बचना—ये सब हिकमत की बातें हैं जो अल्लाह की ओर से उतारी गई हैं।

फिर अल्लाह तआला सबसे महत्वपूर्ण बात पर ज़ोर देते हुए कहता है: "और अल्लाह के साथ कोई दूसरा पूज्य मत बनाओ"—यानी ऐ इंसान! अल्लाह के साथ किसी और को उसकी इबादत में शरीक मत करो, चाहे वह कोई मूर्ति हो, कोई व्यक्ति हो या कोई और चीज़। यदि तुमने ऐसा किया, तो तुम्हें जहन्नम की आग में डाल दिया जाएगा, जहाँ तुम अपनी ही आत्मा को मलामत करोगे कि मैंने यह क्यों किया, और लोग भी तुम्हें बुरा कहेंगे। तुम हर भलाई से दूर और अल्लाह की रहमत से निकाले गए होगे—अपमानित, तिरस्कृत और बेसहारा।

फ़ायदे (लाभ और सबक):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की इबादत में किसी को शरीक करना सबसे बड़ा ज़ुल्म और सबसे बड़ा नुक़सान है, जिसका अंजाम जहन्नम की आग है।
  2. तौहीद (एकेश्वरवाद) ही वह आधार है जिस पर पूरी हिकमत और अच्छे आचरण की इमारत खड़ी होती है। जब दिल अल्लाह से जुड़ता है, तो सारे अच्छे काम अपने आप आसान हो जाते हैं।
  3. यह आयत हमें बताती है कि इस्लाम सिर्फ़ कुछ रस्मों का नाम नहीं, बल्कि एक पूरा जीवन-दर्शन है जो हर अच्छाई और हर भलाई को अपने में समेटे हुए है।
  4. अल्लाह की रहमत से दूर होना और उसकी नाराज़गी पाना—इससे बड़ी कोई असफलता नहीं हो सकती। इसलिए हमें हर उस चीज़ से बचना चाहिए जो हमें अल्लाह से दूर करे।
  5. यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि सच्ची हिकमत (बुद्धिमत्ता) वही है जो अल्लाह की ओर से आए, और वही इंसान को दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी देती है।


📜 आयत 37-41 — सूरा अल-इसरा

37وَلَا تَمْشِ فِي الْأَرْضِ مَرَحًا ۖ إِنَّكَ لَن تَخْرِقَ الْأَرْضَ وَلَن تَبْلُغَ الْجِبَالَ طُولًا
और (देखो) ज़मीन पर अकड़ कर न चला करो क्योंकि तू (अपने इस धमाके की चाल से) न तो ज़मीन को हरगिज़ फाड़ डालेगा और न (तनकर चलने से) हरगिज़ लम्बाई में पहाड़ों के बराबर पहुँच सकेगा
38كُلُّ ذَٰلِكَ كَانَ سَيِّئُهُ عِندَ رَبِّكَ مَكْرُوهًا
(ऐ रसूल) इन सब बातों में से जो बुरी बात है वह तुम्हारे परवरदिगार के नज़दीक नापसन्द है
39ذَٰلِكَ مِمَّا أَوْحَىٰ إِلَيْكَ رَبُّكَ مِنَ الْحِكْمَةِ ۗ وَلَا تَجْعَلْ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ فَتُلْقَىٰ فِي جَهَنَّمَ مَلُومًا مَّدْحُورًا
ये बात तो हिकमत की उन बातों में से जो तुम्हारे परवरदिगार ने तुम्हारे पास 'वही' भेजी और ख़ुदा के साथ कोई दूसरा माबूद न बनाना और न तू मलामत ज़दा राइन्द (धुत्कारा) होकर जहन्नुम में झोंक दिया जाएगा
40أَفَأَصْفَاكُمْ رَبُّكُم بِالْبَنِينَ وَاتَّخَذَ مِنَ الْمَلَائِكَةِ إِنَاثًا ۚ إِنَّكُمْ لَتَقُولُونَ قَوْلًا عَظِيمًا
(ऐ मुशरेकीन मक्का) क्या तुम्हारे परवरदिगार ने तुम्हें चुन चुन कर बेटे दिए हैं और खुद बेटियाँ ली हैं (यानि) फरिश्ते इसमें शक़ नहीं कि बड़ी (सख्त) बात कहते हो
41وَلَقَدْ صَرَّفْنَا فِي هَٰذَا الْقُرْآنِ لِيَذَّكَّرُوا وَمَا يَزِيدُهُمْ إِلَّا نُفُورًا
और हमने तो इसी क़ुरान में तरह तरह से बयान कर दिया ताकि लोग किसी तरह समझें मगर उससे तो उनकी नफरत ही बढ़ती गई
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अनुवाद — अल-इसरा 39

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Friday, October 2, 2026

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