अल-इसरा · 38/111
अनुवाद उच्चारण — अल-इसरा
كُلُّ ذَٰلِكَ كَانَ سَيِّئُهُ عِندَ رَبِّكَ مَكْرُوهًا ۝٣٨
Kullu zaalika kaana sayyi`uhoo inda Rabbika makroohaa
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) इन सब बातों में से जो बुरी बात है वह तुम्हारे परवरदिगार के नज़दीक नापसन्द है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • كُلُّ ذَٰلِكَ (कुल्लु ज़ालिक): ये सब, जो पहले उल्लेख किया गया।
  • سَيِّئُهُ (सय्यिउहु): उसका बुरा पक्ष, यानी इनमें से जो निषिद्ध और बुरे कार्य हैं।
  • مَكْرُوهًا (मकरूहन): अप्रिय, घृणित, जिसे अल्लाह पसंद नहीं करता।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ये सब काम जिनका ज़िक्र पिछली आयात में किया गया — जैसे माता-पिता के साथ बुरा व्यवहार, हक़ मारना, कंजूसी, फिज़ूलखर्ची, संतान को ग़रीबी के डर से क़त्ल करना, व्यभिचार, अन्याय से किसी की जान लेना, अनाथ के माल के पास जाना, नाप-तोल में कमी करना, बिना ज्ञान के किसी बात का पीछा करना, और ज़मीन में अकड़ कर चलना — इन सब में से जो भी बुरा और निषिद्ध पक्ष है, वह अल्लाह के यहाँ अत्यंत अप्रिय और घृणित है। अल्लाह तआला इन कार्यों को कभी पसंद नहीं करता, बल्कि इनसे नफ़रत करता है और इनके करने वालों पर अपनी नाराज़गी उतारता है। यह एक सामान्य नियम है कि जो भी चीज़ अल्लाह ने मना की है, वह उसकी दृष्टि में बुरी और अप्रिय है, चाहे लोगों को वह कितनी ही अच्छी क्यों न लगे। यह आयत पिछली आयात में वर्णित निषेधों पर एक मुहर की तरह है, जो बताती है कि ये सारे काम अल्लाह की नाराज़गी का कारण हैं।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. अल्लाह तआला अपने बंदों पर बेहद मेहरबान है कि उसने हर उस काम को साफ़-साफ़ बता दिया जो उसे नापसंद है, ताकि इंसान उनसे बच सके और उसकी रज़ा (खुशी) का रास्ता अपना सके।
  2. इस आयत से मालूम होता है कि अल्लाह का प्यार और नाराज़गी किसी इंसान की राय पर नहीं, बल्कि उसकी अपनी शरीयत पर निर्भर है। इसलिए हमें अपनी पसंद-नापसंद को अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की पसंद-नापसंद के आगे झुका देना चाहिए।
  3. यह आयत मुसलमान को सिखाती है कि जीवन के हर क्षेत्र में — चाहे वह परिवार हो, समाज हो, या व्यापार — उसे अल्लाह के नियमों का पालन करना चाहिए, क्योंकि अल्लाह ही जानता है कि बंदे के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा।
  4. इस आयत में एक बड़ी खुशखबरी है कि जो इंसान इन बुराइयों से बचता है, वह अल्लाह की पसंदीदा राह पर चलता है, और जो अल्लाह को पसंद हो, उसकी ज़िंदगी में बरकत होती है और आख़िरत में उसे जन्नत की नेमतें मिलती हैं।


📜 आयत 36-40 — अल-इसरा

36وَلَا تَقْفُ مَا لَيْسَ لَكَ بِهِ عِلْمٌ ۚ إِنَّ السَّمْعَ وَالْبَصَرَ وَالْفُؤَادَ كُلُّ أُولَٰئِكَ كَانَ عَنْهُ مَسْئُولًا
और जिस चीज़ का कि तुम्हें यक़ीन न हो (ख्वाह मा ख्वाह) उसके पीछे न पड़ा करो (क्योंकि) कान और ऑंख और दिल इन सबकी (क़यामत के दिना यक़ीनन बाज़पुर्स होती है
37وَلَا تَمْشِ فِي الْأَرْضِ مَرَحًا ۖ إِنَّكَ لَن تَخْرِقَ الْأَرْضَ وَلَن تَبْلُغَ الْجِبَالَ طُولًا
और (देखो) ज़मीन पर अकड़ कर न चला करो क्योंकि तू (अपने इस धमाके की चाल से) न तो ज़मीन को हरगिज़ फाड़ डालेगा और न (तनकर चलने से) हरगिज़ लम्बाई में पहाड़ों के बराबर पहुँच सकेगा
38كُلُّ ذَٰلِكَ كَانَ سَيِّئُهُ عِندَ رَبِّكَ مَكْرُوهًا
(ऐ रसूल) इन सब बातों में से जो बुरी बात है वह तुम्हारे परवरदिगार के नज़दीक नापसन्द है
39ذَٰلِكَ مِمَّا أَوْحَىٰ إِلَيْكَ رَبُّكَ مِنَ الْحِكْمَةِ ۗ وَلَا تَجْعَلْ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ فَتُلْقَىٰ فِي جَهَنَّمَ مَلُومًا مَّدْحُورًا
ये बात तो हिकमत की उन बातों में से जो तुम्हारे परवरदिगार ने तुम्हारे पास 'वही' भेजी और ख़ुदा के साथ कोई दूसरा माबूद न बनाना और न तू मलामत ज़दा राइन्द (धुत्कारा) होकर जहन्नुम में झोंक दिया जाएगा
40أَفَأَصْفَاكُمْ رَبُّكُم بِالْبَنِينَ وَاتَّخَذَ مِنَ الْمَلَائِكَةِ إِنَاثًا ۚ إِنَّكُمْ لَتَقُولُونَ قَوْلًا عَظِيمًا
(ऐ मुशरेकीन मक्का) क्या तुम्हारे परवरदिगार ने तुम्हें चुन चुन कर बेटे दिए हैं और खुद बेटियाँ ली हैं (यानि) फरिश्ते इसमें शक़ नहीं कि बड़ी (सख्त) बात कहते हो
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अनुवाद — अल-इसरा 38

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Tuesday, August 18, 2026

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