अल-कहफ · 95/110
अनुवाद उच्चारण — अल-कहफ
قَالَ مَا مَكَّنِّي فِيهِ رَبِّي خَيْرٌ فَأَعِينُونِي بِقُوَّةٍ أَجْعَلْ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُمْ رَدْمًا ۝٩٥
Qaala maa makkannee feehi Rabbee khairun fa-a`eenoonee biquwwatin aj`al bainakum wa bainahum radmaa
📖 हिंदी अर्थ
जुलकरनैन ने कहा कि मेरे परवरदिगार ने ख़र्च की जो कुदरत मुझे दे रखी है वह (तुम्हारे चन्दे से) कहीं बेहतर है (माल की ज़रूरत नहीं) तुम फक़त मुझे क़ूवत से मदद दो तो मैं तुम्हारे और उनके दरमियान एक रोक बना दूँ

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَكَّنِّي: मुझे शक्ति और सामर्थ्य प्रदान किया।
  • رَدْمًا: मज़बूत दीवार या सुरक्षा कवच।

व्याख्या:

जब ज़ुल-क़रनैन उस क़ौम के पास पहुँचे, जो या'जूज और मा'जूज के अत्याचारों से परेशान थी, तो उन्होंने उनसे कहा कि जो शक्ति और सामर्थ्य मेरे रब ने मुझे दी है, वह तुम्हारे धन-दौलत से कहीं बेहतर है। मुझे तुम्हारे माल की ज़रूरत नहीं, बल्कि मुझे तुम्हारी सहायता की ज़रूरत है—ताकि मैं तुम्हारे और उनके बीच एक ऐसी मज़बूत दीवार खड़ी कर दूँ जो उनके अत्याचारों से तुम्हें हमेशा के लिए सुरक्षित कर दे।

यह एक बहुत बड़ी शिक्षा है हमारे लिए कि जब हमारे पास अल्लाह की दी हुई ताक़त और सामर्थ्य हो, तो हमें अपनी ताक़त पर घमंड नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे अल्लाह की राह में इस्तेमाल करना चाहिए। ज़ुल-क़रनैन ने यह भी सिखाया कि दुनिया का माल-दौलत असली चीज़ नहीं है, असली चीज़ अल्लाह की मदद और उसकी दी हुई ताक़त है। उन्होंने लोगों से केवल इतना कहा कि मुझे शारीरिक सहायता दो—मज़दूर, औज़ार और लोहे के टुकड़े—ताकि मैं तुम्हारे लिए एक ऐसी दीवार बना सकूँ जो तुम्हें उनके ज़ुल्म से बचाए।

यह आयत हमें सिखाती है कि जब हम किसी अच्छे काम के लिए दूसरों से मदद माँगें, तो हमें अपनी नीयत साफ़ रखनी चाहिए और अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए। ज़ुल-क़रनैन ने अपनी ताक़त को अल्लाह की देन बताया, न कि अपनी कमाई। यही विनम्रता और अल्लाह पर भरोसा ही है जो हमें कामयाबी की राह दिखाता है। अल्लाह हमें भी यह तौफ़ीक़ दे कि हम अपनी ताक़त और सामर्थ्य को उसकी राह में इस्तेमाल करें और दूसरों की मदद करें। आमीन।



📜 आयत 93-97 — अल-कहफ

93حَتَّىٰ إِذَا بَلَغَ بَيْنَ السَّدَّيْنِ وَجَدَ مِن دُونِهِمَا قَوْمًا لَّا يَكَادُونَ يَفْقَهُونَ قَوْلًا
यहाँ तक कि जब चलते-चलते रोम में एक पहाड़ के (कंगुरों के) दीवारों के बीचो बीच पहुँच गया तो उन दोनों दीवारों के इस तरफ एक क़ौम को (आबाद) पाया तो बात चीत कुछ समझ ही नहीं सकती थी
94قَالُوا يَا ذَا الْقَرْنَيْنِ إِنَّ يَأْجُوجَ وَمَأْجُوجَ مُفْسِدُونَ فِي الْأَرْضِ فَهَلْ نَجْعَلُ لَكَ خَرْجًا عَلَىٰ أَن تَجْعَلَ بَيْنَنَا وَبَيْنَهُمْ سَدًّا
उन लोगों ने मुतरज्जिम के ज़रिए से अर्ज़ की ऐ ज़ुलकरनैन (इसी घाटी के उधर याजूज माजूज की क़ौम है जो) मुल्क में फ़साद फैलाया करते हैं तो अगर आप की इजाज़त हो तो हम लोग इस ग़र्ज़ से आपसे पास चन्दा जमा करें कि आप हमारे और उनके दरमियान कोई दीवार बना दें
95قَالَ مَا مَكَّنِّي فِيهِ رَبِّي خَيْرٌ فَأَعِينُونِي بِقُوَّةٍ أَجْعَلْ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُمْ رَدْمًا
जुलकरनैन ने कहा कि मेरे परवरदिगार ने ख़र्च की जो कुदरत मुझे दे रखी है वह (तुम्हारे चन्दे से) कहीं बेहतर है (माल की ज़रूरत नहीं) तुम फक़त मुझे क़ूवत से मदद दो तो मैं तुम्हारे और उनके दरमियान एक रोक बना दूँ
96آتُونِي زُبَرَ الْحَدِيدِ ۖ حَتَّىٰ إِذَا سَاوَىٰ بَيْنَ الصَّدَفَيْنِ قَالَ انفُخُوا ۖ حَتَّىٰ إِذَا جَعَلَهُ نَارًا قَالَ آتُونِي أُفْرِغْ عَلَيْهِ قِطْرًا
(अच्छा तो) मुझे (कहीं से) लोहे की सिले ला दो (चुनान्चे वह लोग) लाए और एक बड़ी दीवार बनाई यहाँ तक कि जब दोनो कंगूरो के दरमेयान (दीवार) को बुलन्द करके उनको बराबर कर दिया तो उनको हुक्म दिया कि इसके गिर्द आग लगाकर धौको यहां तक उसको (धौंकते-धौंकते) लाल अंगारा बना दिया
97فَمَا اسْطَاعُوا أَن يَظْهَرُوهُ وَمَا اسْتَطَاعُوا لَهُ نَقْبًا
तो कहा कि अब हमको ताँबा दो कि इसको पिघलाकर इस दीवार पर उँडेल दें (ग़रज़) वह ऐसी ऊँची मज़बूत दीवार बनी कि न तो याजूज व माजूज उस पर चढ़ ही सकते थे और न उसमें नक़ब लगा सकते थे
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अनुवाद — अल-कहफ 95

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Tuesday, August 18, 2026

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