अल-बकरा · 170/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ اتَّبِعُوا مَا أَنزَلَ اللَّهُ قَالُوا بَلْ نَتَّبِعُ مَا أَلْفَيْنَا عَلَيْهِ آبَاءَنَا ۗ أَوَلَوْ كَانَ آبَاؤُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ شَيْئًا وَلَا يَهْتَدُونَ ۝١٧٠
Wa izaa qeela lahumuttabi`oo maaa anzalal laahu qaaloo bal nattabi`u maaa alfainaa `alaihi aabaaa`anaaa; awalaw kaana aabaaa`hum laa ya`qiloona shai`anw wa laa yahtadoon
📖 हिंदी अर्थ
और जब उन से कहा जाता है कि जो हुक्म ख़ुदा की तरफ से नाज़िल हुआ है उस को मानो तो कहते हैं कि नहीं बल्कि हम तो उसी तरीक़े पर चलेंगे जिस पर हमने अपने बाप दादाओं को पाया अगरचे उन के बाप दादा कुछ भी न समझते हों और न राहे रास्त ही पर चलते रहे हों
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • أَلْفَيْنَا: हमने पाया
  • آبَاءَنَا: हमारे बाप-दादा
  • يَعْقِلُونَ: समझते हैं, अक़्ल रखते हैं
  • يَهْتَدُونَ: सीधा रास्ता पाते हैं, हिदायत पाते हैं

तफ़सीर:

जब ईमानवाले नसीहत और भलाई के इरादे से गुमराह लोगों से कहते हैं कि "उस रास्ते पर चलो जो अल्लाह ने उतारा है, यानी क़ुरआन और हिदायत को अपनाओ", तो वे ज़िद और हठधर्मी से कहते हैं: "नहीं, हम तो उसी रास्ते पर चलेंगे जिस पर हमने अपने बाप-दादा को पाया है।" वे अपने पूर्वजों के अंधी नक़ल को ही अपना धर्म मान बैठे हैं, चाहे वह कितना ही गलत और बेबुनियाद क्यों न हो।

अल्लाह तआला इस पर उन्हें जवाब देते हुए फ़रमाता है: क्या वे अपने बाप-दादा की पैरवी करेंगे, भले ही उनके बाप-दादा न तो कुछ समझते हों और न ही सीधे रास्ते पर हों? क्या अंधे की अगुवाई में अंधों का चलना अक़्लमंदी है? अगर बाप-दादा ने सच्चाई नहीं समझी, हिदायत नहीं पाई, तो उनकी तक़लीद (अंधी नक़ल) करना कैसे जायज़ हो सकता है?

यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चाई का मापदंड सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह की वही (क़ुरआन) और उसके रसूल की सुन्नत है, न कि बाप-दादा की रस्में और रिवाज। हमें हर बात को अक़्ल और दलील की कसौटी पर परखना चाहिए। जो चीज़ क़ुरआन और सुन्नत के मुताबिक़ हो, उसे अपनाना चाहिए, चाहे वह हमारे माहौल और रिवाज से अलग ही क्यों न हो। और जो चीज़ इनके ख़िलाफ़ हो, उसे छोड़ देना चाहिए, चाहे वह हमारे बुज़ुर्गों से ही क्यों न मिली हो।

इस आयत में हमारे लिए बड़ी नसीहत है कि हम अंधी नक़ल से बचें और दीन को समझ कर अपनाएँ। अल्लाह ने हमें अक़्ल दी है ताकि हम सच और झूठ में फ़र्क़ कर सकें। जो लोग सच्चाई को समझ कर उस पर चलते हैं, अल्लाह उन्हें दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी देता है। हमें चाहिए कि हम अपने बुज़ुर्गों की अच्छी बातों को अपनाएँ, लेकिन अगर कोई बात क़ुरआन और सुन्नत के ख़िलाफ़ हो, तो उसे छोड़ने में ही भलाई है। यही वह रास्ता है जो हमें जन्नत तक पहुँचाता है और अल्लाह की रज़ा का ज़रिया बनता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 168-172 — अल-बकरा

168يَا أَيُّهَا النَّاسُ كُلُوا مِمَّا فِي الْأَرْضِ حَلَالًا طَيِّبًا وَلَا تَتَّبِعُوا خُطُوَاتِ الشَّيْطَانِ ۚ إِنَّهُ لَكُمْ عَدُوٌّ مُّبِينٌ
ऐ लोगों जो कुछ ज़मीन में हैं उस में से हलाल व पाकीज़ा चीज़ (शौक़ से) खाओ और शैतान के क़दम ब क़दम न चलो वह तो तुम्हारा ज़ाहिर ब ज़ाहिर दुश्मन है
169إِنَّمَا يَأْمُرُكُم بِالسُّوءِ وَالْفَحْشَاءِ وَأَن تَقُولُوا عَلَى اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ
वह तो तुम्हें बुराई और बदकारी ही का हुक्म करेगा और ये चाहेगा कि तुम बे जाने बूझे ख़ुदा पर बोहतान बाँधों
170وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ اتَّبِعُوا مَا أَنزَلَ اللَّهُ قَالُوا بَلْ نَتَّبِعُ مَا أَلْفَيْنَا عَلَيْهِ آبَاءَنَا ۗ أَوَلَوْ كَانَ آبَاؤُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ شَيْئًا وَلَا يَهْتَدُونَ
और जब उन से कहा जाता है कि जो हुक्म ख़ुदा की तरफ से नाज़िल हुआ है उस को मानो तो कहते हैं कि नहीं बल्कि हम तो उसी तरीक़े पर चलेंगे जिस पर हमने अपने बाप दादाओं को पाया अगरचे उन के बाप दादा कुछ भी न समझते हों और न राहे रास्त ही पर चलते रहे हों
171وَمَثَلُ الَّذِينَ كَفَرُوا كَمَثَلِ الَّذِي يَنْعِقُ بِمَا لَا يَسْمَعُ إِلَّا دُعَاءً وَنِدَاءً ۚ صُمٌّ بُكْمٌ عُمْيٌ فَهُمْ لَا يَعْقِلُونَ
और जिन लोगों ने कुफ्र एख्तेयार किया उन की मिसाल तो उस शख्स की मिसाल है जो ऐसे जानवर को पुकार के अपना हलक़ फाड़े जो आवाज़ और पुकार के सिवा सुनता (समझता ख़ाक) न हो ये लोग बहरे गूँगे अन्धें हैं कि ख़ाक नहीं समझते
172يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُلُوا مِن طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ وَاشْكُرُوا لِلَّهِ إِن كُنتُمْ إِيَّاهُ تَعْبُدُونَ
ऐ ईमानदारों जो कुछ हम ने तुम्हें दिया है उस में से सुथरी चीज़ें (शौक़ से) खाओं और अगर ख़ुदा ही की इबादत करते हो तो उसी का शुक्र करो
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अनुवाद — अल-बकरा 170

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Tuesday, August 18, 2026

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