अल-बकरा · 58/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
وَإِذْ قُلْنَا ادْخُلُوا هَٰذِهِ الْقَرْيَةَ فَكُلُوا مِنْهَا حَيْثُ شِئْتُمْ رَغَدًا وَادْخُلُوا الْبَابَ سُجَّدًا وَقُولُوا حِطَّةٌ نَّغْفِرْ لَكُمْ خَطَايَاكُمْ ۚ وَسَنَزِيدُ الْمُحْسِنِينَ ۝٥٨
Wa iz qulnad khuloo haazihil qaryata fakuloo minhaa haisu shi`tum raghadanw wadkhulul baaba sujjadanw wa qooloo hittatun naghfir lakum khataayaakum; wa sanazeedul muhsineen
📖 हिंदी अर्थ
और (वह वक्त भी याद करो) जब हमने तुमसे कहा कि इस गाँव (अरीहा) में जाओ और इसमें जहाँ चाहो फराग़त से खाओ (पियो) और दरवाज़े पर सजदा करते हुए और ज़बान से हित्ता बख्शिश कहते हुए आओ तो हम तुम्हारी ख़ता ये बख्श देगे और हम नेकी करने वालों की नेकी (सवाब) बढ़ा देगें
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • क़र्या (قَرْيَة): शहर या बस्ती, यहाँ अर्थ है बैतुल मुक़द्दस (यरूशलम)।
  • रग़दन (رَغَدًا): खूब, आराम से, विस्तृत और प्रचुर रूप से।
  • सुज्जदन (سُجَّدًا): झुके हुए, अल्लाह के आगे आज्ञाकारी और विनम्र होकर।
  • हित्ततुन (حِطَّةٌ): हमारे गुनाह माफ़ कर दे, यानी अल्लाह से अपने पापों की क्षमा माँगना।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला अपने बंदों को उस महान नेमत की याद दिलाता है जब उसने बनी इसराईल से कहा: "इस शहर (बैतुल मुक़द्दस) में दाखिल हो जाओ, और जहाँ से चाहो उसकी पाक और अच्छी चीज़ें खूब खाओ।" यह अल्लाह की तरफ से एक बड़ी दया और इनायत थी कि उसने उन्हें एक ऐसी जगह दी जहाँ रिज़्क़ की कोई कमी नहीं थी, और उन्हें आज़ादी दी कि वे जहाँ चाहें खाएँ।

लेकिन साथ ही अल्लाह ने उन्हें कुछ शर्तें भी दीं:

  1. शहर के दरवाज़े से सजदा करते हुए (झुककर) दाखिल होना: यानी अल्लाह के सामने पूरी विनम्रता और आज्ञाकारिता का प्रदर्शन करना। यह सिखाता है कि अल्लाह की नेमतें पाने के लिए उसके सामने अपने आपको झुकाना और उसकी इबादत करना ज़रूरी है।
  2. "हित्ततुन" कहना: यानी अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी माँगना। उन्हें हुक्म दिया गया कि वे अल्लाह से अपनी ख़ताओं की क्षमा की दुआ करें।

इसके बदले अल्लाह ने वादा किया: "हम तुम्हारे गुनाह माफ़ कर देंगे।" और जो लोग नेकी करेंगे, अच्छे काम करेंगे, उन्हें अल्लाह और भी ज़्यादा इनाम और फज़ल से नवाज़ेगा।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की रहमत कितनी वसीअ है! वह अपने बंदों को आसानी देना चाहता है, उनके लिए रिज़्क़ के दरवाज़े खोलता है, लेकिन साथ ही वह चाहता है कि बंदा उसकी तरफ रुजू करे, उसके सामने झुके और अपने गुनाहों की माफ़ी माँगे। यही असली कामयाबी है — कि इंसान अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा करे और उसकी इबादत में लगा रहे।

इस आयत से हमें यह भी सबक मिलता है कि अल्लाह की माफ़ी कितनी आसान है — बस सच्चे दिल से तौबा करो, "हित्ततुन" कहो, यानी अपने गुनाहों का एहसास करो और अल्लाह से माफ़ी माँगो। अल्लाह वादा करता है कि वह माफ़ कर देगा। और जो लोग नेकी करते हैं, उनके लिए तो अल्लाह की तरफ से और भी ज़्यादा इनाम हैं। यह अल्लाह का फज़ल है कि वह अपने नेक बंदों को उनकी अच्छाइयों का बदला कई गुना बढ़ाकर देता है।

आओ, हम भी अल्लाह की इस पुकार पर अमल करें — उसकी नेमतों का शुक्र अदा करें, उसके सामने झुकें, अपने गुनाहों से तौबा करें, और नेक कामों में लगे रहें। यही हमारी दुनिया और आख़िरत की कामयाबी है।

🎧 सुनें

📜 आयत 56-60 — अल-बकरा

56ثُمَّ بَعَثْنَاكُم مِّن بَعْدِ مَوْتِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
फिर तुम्हें तुम्हारे मरने के बाद हमने जिला उठाया ताकि तुम शुक्र करो
57وَظَلَّلْنَا عَلَيْكُمُ الْغَمَامَ وَأَنزَلْنَا عَلَيْكُمُ الْمَنَّ وَالسَّلْوَىٰ ۖ كُلُوا مِن طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ ۖ وَمَا ظَلَمُونَا وَلَٰكِن كَانُوا أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ
और हमने तुम पर अब्र का साया किया और तुम पर मन व सलवा उतारा और (ये भी तो कह दिया था कि) जो सुथरी व नफीस रोज़िया तुम्हें दी हैं उन्हें शौक़ से खाओ, और उन लोगों ने हमारा तो कुछ बिगड़ा नहीं मगर अपनी जानों पर सितम ढाते रहे
58وَإِذْ قُلْنَا ادْخُلُوا هَٰذِهِ الْقَرْيَةَ فَكُلُوا مِنْهَا حَيْثُ شِئْتُمْ رَغَدًا وَادْخُلُوا الْبَابَ سُجَّدًا وَقُولُوا حِطَّةٌ نَّغْفِرْ لَكُمْ خَطَايَاكُمْ ۚ وَسَنَزِيدُ الْمُحْسِنِينَ
और (वह वक्त भी याद करो) जब हमने तुमसे कहा कि इस गाँव (अरीहा) में जाओ और इसमें जहाँ चाहो फराग़त से खाओ (पियो) और दरवाज़े पर सजदा करते हुए और ज़बान से हित्ता बख्शिश कहते हुए आओ तो हम तुम्हारी ख़ता ये बख्श देगे और हम नेकी करने वालों की नेकी (सवाब) बढ़ा देगें
59فَبَدَّلَ الَّذِينَ ظَلَمُوا قَوْلًا غَيْرَ الَّذِي قِيلَ لَهُمْ فَأَنزَلْنَا عَلَى الَّذِينَ ظَلَمُوا رِجْزًا مِّنَ السَّمَاءِ بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ
तो जो बात उनसे कही गई थी उसे शरीरों ने बदलकर दूसरी बात कहनी शुरू कर दी तब हमने उन लोगों पर जिन्होंने शरारत की थी उनकी बदकारी की वजह से आसमानी बला नाज़िल की
60۞ وَإِذِ اسْتَسْقَىٰ مُوسَىٰ لِقَوْمِهِ فَقُلْنَا اضْرِب بِّعَصَاكَ الْحَجَرَ ۖ فَانفَجَرَتْ مِنْهُ اثْنَتَا عَشْرَةَ عَيْنًا ۖ قَدْ عَلِمَ كُلُّ أُنَاسٍ مَّشْرَبَهُمْ ۖ كُلُوا وَاشْرَبُوا مِن رِّزْقِ اللَّهِ وَلَا تَعْثَوْا فِي الْأَرْضِ مُفْسِدِينَ
और (वह वक्त भी याद करो) जब मूसा ने अपनी क़ौम के लिए पानी माँगा तो हमने कहा (ऐ मूसा) अपनी लाठी पत्थर पर मारो (लाठी मारते ही) उसमें से बारह चश्में फूट निकले और सब लोगों ने अपना-अपना घाट बखूबी जान लिया और हमने आम इजाज़त दे दी कि खुदा की दी हुईरोज़ी से खाओ पियो और मुल्क में फसाद न करते फिरो
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अनुवाद — अल-बकरा 58

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Tuesday, August 18, 2026

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