अल-अंबिया · 47/112
अनुवाद उच्चारण — अल-अंबिया
وَنَضَعُ الْمَوَازِينَ الْقِسْطَ لِيَوْمِ الْقِيَامَةِ فَلَا تُظْلَمُ نَفْسٌ شَيْئًا ۖ وَإِن كَانَ مِثْقَالَ حَبَّةٍ مِّنْ خَرْدَلٍ أَتَيْنَا بِهَا ۗ وَكَفَىٰ بِنَا حَاسِبِينَ ۝٤٧
Wa nada`ul mawaazeenal qista li Yawmil Qiyaamati falaa tuzlamu nafsun shai`aa; wa in kaana misqaala habbatim min khardalin atainaa bihaa; wa kafaa binaa haasibeen
📖 हिंदी अर्थ
और क़यामत के दिन तो हम (बन्दों के भले बुरे आमाल तौलने के लिए) इन्साफ़ की तराज़ू में खड़ी कर देंगे तो फिर किसी शख्स पर कुछ भी ज़ुल्म न किया जाएगा और अगर राई के दाने के बराबर भी किसी का (अमल) होगा तो तुम उसे ला हाज़िर करेंगे और हम हिसाब करने के वास्ते बहुत काफ़ी हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الْمَوَازِينَ (तराज़ू): न्याय के तराज़ू, जिनसे अच्छे और बुरे कर्मों को तौला जाएगा।
  • الْقِسْط (न्यायपूर्ण): सच्चा और पूर्ण न्याय।
  • مِثْقَالَ حَبَّةٍ مِنْ خَرْدَلٍ (राई के दाने के बराबर): अत्यंत छोटी मात्रा, जो सबसे छोटे दाने के बराबर होती है।
  • كَفَى بِنَا حَاسِبِينَ (हम हिसाब लेने वाले काफी हैं): अल्लाह का हिसाब लेना सबसे पूर्ण और पर्याप्त है।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में क़ियामत के दिन के उस महान न्याय का वर्णन कर रहे हैं, जब वह अपने न्यायपूर्ण तराज़ू स्थापित करेंगे। यह तराज़ू पूर्ण न्याय और सच्चाई पर आधारित होगा, जिसमें किसी भी प्रकार का ज़ुल्म या अन्याय नहीं होगा। हर आत्मा को उसके कर्मों का पूरा-पूरा बदला मिलेगा, चाहे वह अच्छा हो या बुरा। अल्लाह तआला फ़रमाते हैं कि यदि किसी व्यक्ति का कर्म राई के दाने के बराबर भी हो, तो भी उसे लाया जाएगा और उसका हिसाब लिया जाएगा। यह अल्लाह का अत्यंत सूक्ष्म न्याय है, जो किसी भी छोटी या बड़ी चीज़ को अनदेखा नहीं करता। अल्लाह तआला हर कर्म को गिनने और उसका हिसाब लेने के लिए पर्याप्त है, क्योंकि वह सब कुछ जानता है और उसकी गिनती में कोई त्रुटि नहीं हो सकती।

दावती पहलू:

यह आयत मोमिनों के लिए अत्यंत खुशखबरी और प्रोत्साहन का स्रोत है। यह बताती है कि अल्लाह तआला का न्याय पूर्ण और सटीक है, और उसकी रहमत यह है कि वह छोटे से छोटे अच्छे कर्म को भी व्यर्थ नहीं जाने देता। एक राई के दाने के बराबर भी नेकी अल्लाह के यहाँ महत्व रखती है और उसका बदला दिया जाएगा। यह हमें सिखाती है कि हमें किसी भी अच्छे काम को छोटा नहीं समझना चाहिए, चाहे वह एक मुस्कान हो, एक अच्छा शब्द हो, या किसी की मदद का एक छोटा सा कार्य हो। अल्लाह की रहमत और न्याय का यह संतुलन हमें निराशा से बचाता है और अच्छे कर्मों की ओर प्रेरित करता है। साथ ही, यह हमें बुरे कर्मों से सावधान करता है कि छोटे से छोटा गुनाह भी अल्लाह के यहाँ दर्ज होगा और उसका हिसाब होगा। यह आयत हमें अल्लाह के न्याय पर पूर्ण विश्वास दिलाती है और हमें यकीन दिलाती है कि इस दुनिया में चाहे कुछ भी हो, अंतिम फैसला अल्लाह के यहाँ सच्चाई और न्याय के साथ होगा। हमें चाहिए कि हम अपने जीवन को अच्छे कर्मों से भरें और अल्लाह की रहमत और न्याय पर भरोसा रखें।



📜 आयत 45-49 — अल-अंबिया

45قُلْ إِنَّمَا أُنذِرُكُم بِالْوَحْيِ ۚ وَلَا يَسْمَعُ الصُّمُّ الدُّعَاءَ إِذَا مَا يُنذَرُونَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं तो बस तुम लोगों को ''वही'' के मुताबिक़ (अज़ाब से) डराता हूँ (मगर तुम लोग गोया बहरे हो) और बहरों को जब डराया जाता है तो वह पुकारने ही को नहीं सुनते (डरें क्या ख़ाक)
46وَلَئِن مَّسَّتْهُمْ نَفْحَةٌ مِّنْ عَذَابِ رَبِّكَ لَيَقُولُنَّ يَا وَيْلَنَا إِنَّا كُنَّا ظَالِمِينَ
और (ऐ रसूल) अगर कहीं उनको तुम्हारे परवरदिगार के अज़ाब की ज़रा सी हवा भी लग गई तो वे सख्त! बोल उठे हाय अफसोस वाक़ई हम ही ज़ालिम थे
47وَنَضَعُ الْمَوَازِينَ الْقِسْطَ لِيَوْمِ الْقِيَامَةِ فَلَا تُظْلَمُ نَفْسٌ شَيْئًا ۖ وَإِن كَانَ مِثْقَالَ حَبَّةٍ مِّنْ خَرْدَلٍ أَتَيْنَا بِهَا ۗ وَكَفَىٰ بِنَا حَاسِبِينَ
और क़यामत के दिन तो हम (बन्दों के भले बुरे आमाल तौलने के लिए) इन्साफ़ की तराज़ू में खड़ी कर देंगे तो फिर किसी शख्स पर कुछ भी ज़ुल्म न किया जाएगा और अगर राई के दाने के बराबर भी किसी का (अमल) होगा तो तुम उसे ला हाज़िर करेंगे और हम हिसाब करने के वास्ते बहुत काफ़ी हैं
48وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَىٰ وَهَارُونَ الْفُرْقَانَ وَضِيَاءً وَذِكْرًا لِّلْمُتَّقِينَ
और हम ही ने यक़ीनन मूसा और हारून को (हक़ व बातिल की) जुदा करने वाली किताब (तौरेत) और परहेज़गारों के लिए अज़सरतापा बनूँ और नसीहत अता की
49الَّذِينَ يَخْشَوْنَ رَبَّهُم بِالْغَيْبِ وَهُم مِّنَ السَّاعَةِ مُشْفِقُونَ
जो बे देखे अपने परवरदिगार से ख़ौफ खाते हैं और ये लोग रोज़े क़यामत से भी डरते हैं
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अनुवाद — अल-अंबिया 47

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Tuesday, August 18, 2026

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