अल-अंबिया · 51/112
अनुवाद उच्चारण — अल-अंबिया
۞ وَلَقَدْ آتَيْنَا إِبْرَاهِيمَ رُشْدَهُ مِن قَبْلُ وَكُنَّا بِهِ عَالِمِينَ ۝٥١
Wa laqad aatainaaa Ibraaheema rushdahoo min qablu wa kunnaa bihee `aalimeen
📖 हिंदी अर्थ
और इसमें भी शक नहीं कि हमने इबराहीम को पहले ही से फ़हेम सलीम अता की थी और हम उन (की हालत) से खूब वाक़िफ थे
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • रुश्द (رشد): सीधा रास्ता, हिदायत, समझ-बूझ और सत्य को पहचानने की शक्ति।
  • मिन क़ब्लु (من قبل): पहले से, यानी मूसा और हारून (अलैहिमास्सलाम) से पहले।
  • आलिमीन (عالمين): जानने वाले, पूर्ण ज्ञान रखने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के उस महान सम्मान का ज़िक्र कर रहे हैं, जो उन्होंने उन्हें बहुत पहले प्रदान किया था। अल्लाह ने हज़रत इब्राहीम को वह हिदायत और सत्य-बोध (रुश्द) अता किया, जिसके ज़रिए उन्होंने अपनी क़ौम को सीधा रास्ता दिखाया। यह अनुग्रह उन्हें मूसा और हारून (अलैहिमास्सलाम) से भी पहले मिला था। अल्लाह तआला ने उन्हें बचपन से ही सत्य को समझने की क्षमता, तर्क-शक्ति और अपनी क़ौम के सामने ठोस प्रमाण पेश करने का ज्ञान दिया।

अल्लाह तआला का यह कथन कि "हम उन्हें भली-भाँति जानते थे" — यह बताता है कि अल्लाह ने यह विशेष अनुग्रह उन्हें इसलिए दिया क्योंकि वह जानता था कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) इसके योग्य हैं। उनका दिल सत्य की तलाश में बेचैन था, वह बुतों की पूजा से घृणा करते थे, और उन्होंने अपनी पूरी आत्मा से अल्लाह की ओर रुख किया था। अल्लाह ने उनकी इस नीयत और पाक दिल को देखते हुए उन्हें नबुव्वत, हिदायत और अपने दीन की दावत के लिए चुन लिया।

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह तआला अपने बंदों के दिलों का हाल जानता है। जो सच्चे दिल से सत्य की तलाश करता है और अपनी पूरी हिम्मत से अल्लाह की ओर बढ़ता है, अल्लाह उसे ज़रूर रास्ता दिखाता है और उसे वह तौफ़ीक़ देता है जो दूसरों को नहीं मिलती। हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की यही विशेषता थी कि उन्होंने अंधी परंपरा को नहीं माना, बल्कि अपनी अक़्ल और फ़ितरत से सत्य को पहचाना और फिर पूरी दुनिया के सामने उसे पेश किया।

इस आयत से हमें यह भी सबक मिलता है कि अल्लाह की राह में सच्ची कोशिश और नेक नीयत कभी बेकार नहीं जाती। जो बंदा अल्लाह के लिए अपने आप को समर्पित कर देता है, अल्लाह उसे दुनिया और आख़िरत दोनों में इज़्ज़त देता है। हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की याद हमें यह भी सिखाती है कि हमें अपने जीवन में सत्य को तलाश करना चाहिए, चाहे हमारे आस-पास की परिस्थितियाँ कैसी भी हों। अल्लाह उन लोगों को कभी निराश नहीं करता जो सच्चे दिल से उसकी ओर रुख करते हैं।

🎧 सुनें

📜 आयत 49-53 — अल-अंबिया

49الَّذِينَ يَخْشَوْنَ رَبَّهُم بِالْغَيْبِ وَهُم مِّنَ السَّاعَةِ مُشْفِقُونَ
जो बे देखे अपने परवरदिगार से ख़ौफ खाते हैं और ये लोग रोज़े क़यामत से भी डरते हैं
50وَهَٰذَا ذِكْرٌ مُّبَارَكٌ أَنزَلْنَاهُ ۚ أَفَأَنتُمْ لَهُ مُنكِرُونَ
और ये (कुरान भी) एक बाबरकत तज़किरा है जिसको हमने उतारा है तो क्या तुम लोग इसको नहीं मानते
51۞ وَلَقَدْ آتَيْنَا إِبْرَاهِيمَ رُشْدَهُ مِن قَبْلُ وَكُنَّا بِهِ عَالِمِينَ
और इसमें भी शक नहीं कि हमने इबराहीम को पहले ही से फ़हेम सलीम अता की थी और हम उन (की हालत) से खूब वाक़िफ थे
52إِذْ قَالَ لِأَبِيهِ وَقَوْمِهِ مَا هَٰذِهِ التَّمَاثِيلُ الَّتِي أَنتُمْ لَهَا عَاكِفُونَ
जब उन्होंने अपने (मुँह बोले) बाप और अपनी क़ौम से कहा ये मूर्ते जिनकी तुम लोग मुजाबिरी करते हो आख़िर क्या (बला) है
53قَالُوا وَجَدْنَا آبَاءَنَا لَهَا عَابِدِينَ
वह लोग बोले (और तो कुछ नहीं जानते मगर) अपने बडे बूढ़ों को इनही की परसतिश करते देखा है
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अनुवाद — अल-अंबिया 51

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Tuesday, August 18, 2026

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