अल-अंबिया · 8/112
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-अंबिया
وَمَا جَعَلْنَاهُمْ جَسَدًا لَّا يَأْكُلُونَ الطَّعَامَ وَمَا كَانُوا خَالِدِينَ ۝٨
Wa maa ja`alnaahum jasadal laa yaakuloonat ta`aama wa maa kaanoo khaalideen
📖 हिंदी अर्थ
और हमने उन (पैग़म्बरों) के बदन ऐसे नहीं बनाए थे कि वह खाना न खाएँ और न वह (दुनिया में) हमेशा रहने सहने वाले थे

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • जसदन – शरीर वाला, ऐसा शरीर जो भोजन की मोहताज न हो।
  • ला याकुलून – नहीं खाते।
  • ख़ालिदीन – सदैव रहने वाले, अमर।

व्याख्या:

अल्लाह तआला ने इस आयत में उन लोगों के उस आक्षेप का उत्तर दिया है जो कहते थे कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) आम इंसानों की तरह खाते-पीते और चलते-फिरते क्यों हैं? वे चाहते थे कि रसूल फ़रिश्ते हों या ऐसे जिस्म हों जिन्हें खाने-पीने की ज़रूरत ही न हो।

अल्लाह तआला फ़रमाता है: हमने अपने रसूलों को ऐसा जिस्म नहीं बनाया जो खाना न खाता हो। बल्कि हमने उन्हें इंसान ही बनाया, जो दूसरे इंसानों की तरह खाते-पीते हैं, बाज़ारों में चलते-फिरते हैं, और जीवन की आम ज़रूरतों को पूरा करते हैं। यही उनकी रिसालत की सच्चाई की गवाही है कि वे अपनी उम्मत के लिए नमूना हैं – अगर वे खाने-पीने से पाक होते, तो लोग उनकी पैरवी में असमर्थ हो जाते।

और यह भी कि वे दुनिया में हमेशा रहने वाले नहीं थे। हर नबी ने अपनी उम्र पूरी की, अपना पैग़ाम पहुँचाया और वफ़ात पाई। यह भी उनके इंसान होने की दलील है। अगर वे अमर होते, तो लोग उन्हें फ़रिश्ता या ख़ुदा समझने लगते, जबकि उनकी मौत ने साबित कर दिया कि वे अल्लाह के बंदे और रसूल थे।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि नबियों की सीरत हमारे लिए अमली नमूना है। उन्होंने अपनी ज़िंदगी में खाने-पीने, सोने, उठने-बैठने, ख़ुशी और ग़म – हर हाल में अल्लाह की इबादत और दावत का काम किया। यह हमारे लिए बड़ी रहमत है कि हमारे रसूल हम जैसे इंसान थे, ताकि हम उनकी हर अदा में उनकी पैरवी कर सकें। अगर वे फ़रिश्ते होते, तो हम उनकी तरह अमल करना मुश्किल पाते। यही अल्लाह की मेहरबानी है कि उसने रसूलों को हमारी ही जिंस से भेजा, ताकि हम उनके नक़्शे-क़दम पर चलकर जन्नत के हक़दार बनें। और याद रखें – दुनिया किसी के लिए भी हमेशा नहीं रहती, इसलिए सच्ची कामयाबी उसी में है कि हम अपनी ज़िंदगी को रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सुन्नत के मुताबिक़ ढाल लें।



📜 आयत 6-10 — सूरा अल-अंबिया

6مَا آمَنَتْ قَبْلَهُم مِّن قَرْيَةٍ أَهْلَكْنَاهَا ۖ أَفَهُمْ يُؤْمِنُونَ
उसी तरह ये भी कोई मौजिज़ा (जैसा हम कहें) हमारे पास भला लाए तो सही इनसे पहले जिन बस्तियों को तबाह कर डाला (मौजिज़े भी देखकर तो) ईमान न लाए
7وَمَا أَرْسَلْنَا قَبْلَكَ إِلَّا رِجَالًا نُّوحِي إِلَيْهِمْ ۖ فَاسْأَلُوا أَهْلَ الذِّكْرِ إِن كُنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ
तो क्या ये लोग ईमान लाएँगे और ऐ रसूल हमने तुमसे पहले भी आदमियों ही को (रसूल बनाकर) भेजा था कि उनके पास ''वही'' भेजा करते थे तो अगर तुम लोग खुद नहीं जानते हो तो आलिमों से पूँछकर देखो
8وَمَا جَعَلْنَاهُمْ جَسَدًا لَّا يَأْكُلُونَ الطَّعَامَ وَمَا كَانُوا خَالِدِينَ
और हमने उन (पैग़म्बरों) के बदन ऐसे नहीं बनाए थे कि वह खाना न खाएँ और न वह (दुनिया में) हमेशा रहने सहने वाले थे
9ثُمَّ صَدَقْنَاهُمُ الْوَعْدَ فَأَنجَيْنَاهُمْ وَمَن نَّشَاءُ وَأَهْلَكْنَا الْمُسْرِفِينَ
फिर हमने उन्हें (अपना अज़ाब का) वायदा सच्चा कर दिखाया (और जब अज़ाब आ पहुँचा) तो हमने उन पैग़म्बरों को और जिस जिसको चाहा छुटकारा दिया और हद से बढ़ जाने वालों को हलाक कर डाला
10لَقَدْ أَنزَلْنَا إِلَيْكُمْ كِتَابًا فِيهِ ذِكْرُكُمْ ۖ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
हमने तो तुम लोगों के पास वह किताब (कुरान) नाज़िल की है जिसमें तुम्हारा (भी) ज़िक्रे (ख़ैर) है तो क्या तुम लोग (इतना भी) समझते
अल-अंबियाकुरान सूची
112आयत
मक्कीअवतरण स्थान
8आयत

अनुवाद — अल-अंबिया 8

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Friday, October 2, 2026

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