अल-मोमिनुन · 35/118
अनुवाद उच्चारण — अल-मोमिनुन
أَيَعِدُكُمْ أَنَّكُمْ إِذَا مِتُّمْ وَكُنتُمْ تُرَابًا وَعِظَامًا أَنَّكُم مُّخْرَجُونَ ۝٣٥
A-Ya`idukum annakum izaa mittum wa kuntum turaabanw wa izaaman annakum mukhrajoon
📖 हिंदी अर्थ
क्या ये शख्स तुमसे वायदा करता है कि जब तुम मर जाओगे और (मर कर) सिर्फ मिट्टी और हड्डियाँ (बनकर) रह जाओगे तो तुम दुबारा ज़िन्दा करके कब्रों से निकाले जाओगे (है है अरे) जिसका तुमसे वायदा किया जाता है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • أَيَعِدُكُمْ – क्या वह तुमसे वादा करता है
  • مِتُّمْ – तुम मर जाओ
  • تُرَابًا – मिट्टी
  • وَعِظَامًا – और हड्डियाँ
  • مُخْرَجُونَ – निकाले जाने वाले (कब्रों से जीवित होकर उठाए जाने वाले)

तफ़सीर:

यह आयत उन काफ़िरों की बात बयान कर रही है जो हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) की उम्मत में थे और उनके दावे का मज़ाक उड़ाते थे। वे लोग हैरानी और इनकार के अंदाज़ में कहते थे: "क्या यह शख्स तुमसे वादा करता है कि जब तुम मर जाओगे और मिट्टी और बिखरी हुई हड्डियों में बदल जाओगे, तो तुम्हें कब्रों से जीवित निकाला जाओगे?" वे इस बात को असंभव और बेतुका समझते थे, क्योंकि उनका दिल मौत के बाद जीवन पर यकीन नहीं करता था।

यह आयत उन लोगों की मानसिकता को उजागर करती है जो आख़िरत पर ईमान नहीं रखते। वे सिर्फ़ इस दुनिया की ज़िंदगी को ही सब कुछ मानते हैं और उन्हें यह समझ नहीं आता कि जो शरीर मिट्टी में मिलकर नष्ट हो जाए, वह दोबारा कैसे ज़िंदा हो सकता है। लेकिन अल्लाह तआला ने इसका जवाब अपनी क़ुदरत के ज़रिए दिया है—जिसने पहली बार इंसान को पैदा किया, वही उसे दोबारा ज़िंदा करने पर भी पूरी तरह क़ादिर है।

इस आयत से हमें सबक लेना चाहिए कि मौत के बाद का जीवन हक़ीक़त है, और जो लोग इस पर शक करते हैं, वह अपनी समझ पर भरोसा करके अल्लाह की क़ुदरत को भूल जाते हैं। अल्लाह तआला ने इंसान को पैदा करने की शुरुआत की, और वही उसे दोबारा पैदा करेगा। यह उसके लिए बिल्कुल आसान है। हमें चाहिए कि हम आख़िरत पर पक्का ईमान रखें, क्योंकि यही ईमान इंसान को अच्छे कामों की तरफ़ राह दिखाता है और बुराइयों से रोकता है। जो लोग इस हक़ीक़त को नहीं मानते, वे अपने अंजाम से ग़ाफ़िल हैं, और क़यामत के दिन उन्हें अपनी ग़लती का एहसास होगा, लेकिन तब पछताना बेकार होगा।



📜 आयत 33-37 — अल-मोमिनुन

33وَقَالَ الْمَلَأُ مِن قَوْمِهِ الَّذِينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِلِقَاءِ الْآخِرَةِ وَأَتْرَفْنَاهُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا مَا هَٰذَا إِلَّا بَشَرٌ مِّثْلُكُمْ يَأْكُلُ مِمَّا تَأْكُلُونَ مِنْهُ وَيَشْرَبُ مِمَّا تَشْرَبُونَ
और उनकी क़ौम के चन्द सरदारों ने जो काफिर थे और (रोज़) आख़िरत की हाज़िरी को भी झुठलाते थे और दुनिया की (चन्द रोज़ा) ज़िन्दगी में हमने उन्हें शहवत भी दे रखी थी आपस में कहने लगे (अरे) ये तो बस तुम्हारा ही सा आदमी है जो चीज़े तुम खाते वही ये भी खाता है और जो चीज़े तुम पीते हो उन्हीं में से ये भी पीता है
34وَلَئِنْ أَطَعْتُم بَشَرًا مِّثْلَكُمْ إِنَّكُمْ إِذًا لَّخَاسِرُونَ
और अगर कहीं तुम लोगों ने अपने ही से आदमी की इताअत कर ली तो तुम ज़रुर घाटे में रहोगे
35أَيَعِدُكُمْ أَنَّكُمْ إِذَا مِتُّمْ وَكُنتُمْ تُرَابًا وَعِظَامًا أَنَّكُم مُّخْرَجُونَ
क्या ये शख्स तुमसे वायदा करता है कि जब तुम मर जाओगे और (मर कर) सिर्फ मिट्टी और हड्डियाँ (बनकर) रह जाओगे तो तुम दुबारा ज़िन्दा करके कब्रों से निकाले जाओगे (है है अरे) जिसका तुमसे वायदा किया जाता है
36۞ هَيْهَاتَ هَيْهَاتَ لِمَا تُوعَدُونَ
बिल्कुल (अक्ल से) दूर और क़यास से बईद है (दो बार ज़िन्दा होना कैसा) बस यही तुम्हारी दुनिया की ज़िन्दगी है
37إِنْ هِيَ إِلَّا حَيَاتُنَا الدُّنْيَا نَمُوتُ وَنَحْيَا وَمَا نَحْنُ بِمَبْعُوثِينَ
कि हम मरते भी हैं और जीते भी हैं और हम तो फिर (दुबारा) उठाए नहीं जाएँगे हो न हो ये (सालेह) वह शख्स है जिसने खुदा पर झूठ मूठ बोहतान बाँधा है
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अनुवाद — अल-मोमिनुन 35

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Tuesday, August 18, 2026

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