अल-फुरकान · 50/77
अनुवाद उच्चारण — अल-फुरकान
وَلَقَدْ صَرَّفْنَاهُ بَيْنَهُمْ لِيَذَّكَّرُوا فَأَبَىٰ أَكْثَرُ النَّاسِ إِلَّا كُفُورًا ۝٥٠
Wa laqad sarrafnaahu bainahum li yazzakkaroo fa abaaa aksarun naasi illaa kufooraa
📖 हिंदी अर्थ
और हमने पानी को उनके दरमियान (तरह तरह से) तक़सीम किया ताकि लोग नसीहत हासिल करें मगर अक्सर लोगों ने नाशुक्री के सिवा कुछ न माना

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • صَرَّفْنَاهُ: हमने उसे (बारिश को) बदल-बदल कर भेजा, यानी अलग-अलग जगहों और अलग-अलग समयों पर।
  • لِيَذَّكَّرُوا: ताकि वे सीखें और सबक हासिल करें, अल्लाह की नेमतों पर ग़ौर करें।
  • كُفُورًا: जुर्म और इन्कार, यानी नेमतों का अहसान न मानना और उन्हें जताने वाले की तरफ़ से मुँह मोड़ना।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने इस आयत में अपनी रहमत और क़ुदरत का एक ज़िंदा नमूना पेश किया है। उसने बारिश को बदल-बदल कर भेजा—कभी किसी ज़मीन पर बरसाया, कभी किसी और पर; कभी किसी मौसम में, कभी किसी और मौसम में। यह तक़सीम अल्लाह की हिक्मत से होती है, ताकि लोग उसकी नेमतों को पहचानें, उसका शुक्र अदा करें, और जिन लोगों को बारिश न मिले वे अपने गुनाहों से तौबा करें और अल्लाह की तरफ़ रुजू करें। यह भी एक तरह से अल्लाह का पैग़ाम है कि वह अपने बंदों को मौका देता है कि वे उसकी तरफ़ लौटें।

लेकिन अफ़सोस! अधिकतर लोग इससे सबक नहीं लेते। वे बारिश को अल्लाह की तरफ़ से न मानकर किसी सितारे या मौसम के असर से मान बैठते हैं, और कहते हैं: "हमें फलाँ नक्षत्र से बारिश मिली।" यह उनकी नेमतों का इन्कार है। वे अल्लाह की रहमत को भूलकर उसके वसीले (साधन) को ही सब कुछ समझ लेते हैं। यही उनका कुफ़्र और जुर्म है।

दावती पहलू:

ऐसे इंसान! ज़रा सोच—जब बारिश होती है, तो क्या वह किसी सितारे के इशारे पर होती है, या उस रब के हुक्म से जो आसमान और ज़मीन का मालिक है? जो ज़मीन सूखी पड़ी है, उसे वह हरा-भरा कर देता है; जो लोग प्यासे हैं, उन्हें वह सैराब कर देता है। यह अल्लाह की रहमत है जो हर पल बरसती है। क्या यह क़ाबिले-शुक्र नहीं? क्या यह क़ाबिले-ग़ौर नहीं? अल्लाह ने यह सब इसलिए किया कि तुम उसे पहचानो, उसका शुक्र अदा करो, और उसकी तरफ़ रुजू करो। लेकिन इंसान अपनी नादानी से उसकी नेमतों को जताने वाले की तरफ़ से मुँह मोड़ लेता है। यह कितनी बड़ी नाइंसाफ़ी है कि इंसान उस रब का शुक्र न करे जो उसे पल-पल रिज़्क़ देता है, और उसकी नेमतों को किसी और की तरफ़ मंसूब कर दे।

आओ, हम उन लोगों में से न बनें जो अल्लाह की नेमतों का इन्कार करते हैं। बल्कि हम उन बंदों में से बनें जो हर नेमत पर अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं, और उसकी तरफ़ अपने दिल को जोड़ते हैं। क्योंकि अल्लाह ने बारिश को बदल-बदल कर भेजा, ताकि हम उसकी रहमत को महसूस करें और उसके क़रीब आएं। यही उसका मक़सद है—हमारी हिदायत और हमारी भलाई।



📜 आयत 48-52 — अल-फुरकान

48وَهُوَ الَّذِي أَرْسَلَ الرِّيَاحَ بُشْرًا بَيْنَ يَدَيْ رَحْمَتِهِ ۚ وَأَنزَلْنَا مِنَ السَّمَاءِ مَاءً طَهُورًا
और वही तो वह (ख़ुदा) है जिसने अपनी रहमत (बारिश) के आगे आगे हवाओं को खुश ख़बरी देने के लिए (पेश ख़ेमा बना के) भेजा और हम ही ने आसमान से बहुत पाक और सुथरा हुआ पानी बरसाया
49لِّنُحْيِيَ بِهِ بَلْدَةً مَّيْتًا وَنُسْقِيَهُ مِمَّا خَلَقْنَا أَنْعَامًا وَأَنَاسِيَّ كَثِيرًا
ताकि हम उसके ज़रिए से मुर्दा (वीरान) शहर को ज़िन्दा (आबाद) कर दें और अपनी मख़लूकात में से चौपायों और बहुत से आदमियों को उससे सेराब करें
50وَلَقَدْ صَرَّفْنَاهُ بَيْنَهُمْ لِيَذَّكَّرُوا فَأَبَىٰ أَكْثَرُ النَّاسِ إِلَّا كُفُورًا
और हमने पानी को उनके दरमियान (तरह तरह से) तक़सीम किया ताकि लोग नसीहत हासिल करें मगर अक्सर लोगों ने नाशुक्री के सिवा कुछ न माना
51وَلَوْ شِئْنَا لَبَعَثْنَا فِي كُلِّ قَرْيَةٍ نَّذِيرًا
और अगर हम चाहते तो हर बस्ती में ज़रुर एक (अज़ाबे ख़ुदा से) डराने वाला पैग़म्बर भेजते
52فَلَا تُطِعِ الْكَافِرِينَ وَجَاهِدْهُم بِهِ جِهَادًا كَبِيرًا
(तो ऐ रसूल) तुम काफिरों की इताअत न करना और उनसे कुरान के (दलाएल) से खूब लड़ों
अल-फुरकानकुरान सूची
77आयत
मक्कीRevelation
50आयत

अनुवाद — अल-फुरकान 50

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Tuesday, August 18, 2026

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