अल-फुरकान · 49/77
अनुवाद उच्चारण — अल-फुरकान
لِّنُحْيِيَ بِهِ بَلْدَةً مَّيْتًا وَنُسْقِيَهُ مِمَّا خَلَقْنَا أَنْعَامًا وَأَنَاسِيَّ كَثِيرًا ۝٤٩
Linuhyiya bihee balda tam maitanw wa nusqiyahoo mimmaa khalaqnaaa an`aa manw wa anaasiyya kaseeraa
📖 हिंदी अर्थ
ताकि हम उसके ज़रिए से मुर्दा (वीरान) शहर को ज़िन्दा (आबाद) कर दें और अपनी मख़लूकात में से चौपायों और बहुत से आदमियों को उससे सेराब करें

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لِنُحْيِيَ بِهِ – ताकि हम उस (पानी) के द्वारा ज़िंदा करें।
  • بَلْدَةً مَّيْتًا – एक मुर्दा (बंजर) भूमि।
  • وَنُسْقِيَهُ – और हम उस (पानी) को पिलाते हैं।
  • أَنْعَامًا – चौपाए (जानवर)।
  • وَأَنَاسِيَّ – बहुत से इंसान (अनासी, इंसी की बहुवचन है)।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला ने अपनी रहमत और क़ुदरत का ज़िक्र करते हुए फ़रमाया कि हमने आसमान से पाक पानी उतारा, ताकि उसके ज़रिए एक मुर्दा (बंजर) ज़मीन को ज़िंदा करें – यानी उसमें हरियाली, खेती और तरह-तरह के पौधे उगाएँ, जो पहले बिल्कुल सूखी और बेकार पड़ी थी। यह अल्लाह की कुदरत की निशानी है कि वही ज़मीन, जो मुर्दा थी, पानी बरसते ही ज़िंदा हो जाती है और अपनी गोद से अनगिनत नेअमतें निकालती है।

इसी पानी से हम अपनी मख़लूक़ात में से चौपाए जानवरों (ऊँट, गाय, बकरी आदि) को और बहुत से इंसानों को सिंचाई करते हैं – यानी उन्हें पिलाते हैं, जिससे उनकी ज़िंदगी क़ायम रहती है। यहाँ पहले ज़मीन का ज़िक्र किया गया, फिर जानवरों और इंसानों का, क्योंकि ज़मीन की ज़िंदगी ही उनकी ज़िंदगी का ज़रिया है। जब ज़मीन हरी-भरी होती है, तो चारा पैदा होता है, जानवर पलते हैं, और इंसान उनसे फ़ायदा उठाते हैं।

यह आयत हमें अल्लाह की उस महान नेअमत पर ग़ौर करने की तरग़ीब देती है जो हर पल हमारे काम आ रही है। पानी ही वह असल ज़रिया है जिससे ज़िंदगी क़ायम है। अगर पानी न हो, तो न खेती हो, न जानवर, न इंसान। यह हमारे रब की रहमत है कि उसने बारिश का निज़ाम बनाया, ताकि हम उसके शुक्रगुज़ार बनें और उसकी कुदरत को पहचानें। जिस अल्लाह ने बंजर ज़मीन को ज़िंदा करने की ताक़त रखी है, वही क़यामत के दिन मुर्दों को भी ज़िंदा करेगा – यह हमारे लिए एक बड़ी सबक़ और ईमान की दावत है। हमें चाहिए कि इस नेअमत की क़द्र करें, अल्लाह का शुक्र अदा करें और उसकी नाफ़रमानी से बचें, क्योंकि वही हमें पानी देने वाला और ज़िंदगी बख़्शने वाला है।



📜 आयत 47-51 — अल-फुरकान

47وَهُوَ الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ اللَّيْلَ لِبَاسًا وَالنَّوْمَ سُبَاتًا وَجَعَلَ النَّهَارَ نُشُورًا
और वही तो वह (ख़ुदा) है जिसने तुम्हारे वास्ते रात को पर्दा बनाया और नींद को राहत और दिन को (कारोबार के लिए) उठ खड़ा होने का वक्त बनाया
48وَهُوَ الَّذِي أَرْسَلَ الرِّيَاحَ بُشْرًا بَيْنَ يَدَيْ رَحْمَتِهِ ۚ وَأَنزَلْنَا مِنَ السَّمَاءِ مَاءً طَهُورًا
और वही तो वह (ख़ुदा) है जिसने अपनी रहमत (बारिश) के आगे आगे हवाओं को खुश ख़बरी देने के लिए (पेश ख़ेमा बना के) भेजा और हम ही ने आसमान से बहुत पाक और सुथरा हुआ पानी बरसाया
49لِّنُحْيِيَ بِهِ بَلْدَةً مَّيْتًا وَنُسْقِيَهُ مِمَّا خَلَقْنَا أَنْعَامًا وَأَنَاسِيَّ كَثِيرًا
ताकि हम उसके ज़रिए से मुर्दा (वीरान) शहर को ज़िन्दा (आबाद) कर दें और अपनी मख़लूकात में से चौपायों और बहुत से आदमियों को उससे सेराब करें
50وَلَقَدْ صَرَّفْنَاهُ بَيْنَهُمْ لِيَذَّكَّرُوا فَأَبَىٰ أَكْثَرُ النَّاسِ إِلَّا كُفُورًا
और हमने पानी को उनके दरमियान (तरह तरह से) तक़सीम किया ताकि लोग नसीहत हासिल करें मगर अक्सर लोगों ने नाशुक्री के सिवा कुछ न माना
51وَلَوْ شِئْنَا لَبَعَثْنَا فِي كُلِّ قَرْيَةٍ نَّذِيرًا
और अगर हम चाहते तो हर बस्ती में ज़रुर एक (अज़ाबे ख़ुदा से) डराने वाला पैग़म्बर भेजते
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अनुवाद — अल-फुरकान 49

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Wednesday, August 19, 2026

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