अल-फुरकान · 64/77
अनुवाद उच्चारण — अल-फुरकान
وَالَّذِينَ يَبِيتُونَ لِرَبِّهِمْ سُجَّدًا وَقِيَامًا ۝٦٤
Wallazeena yabeetoona li Rabbihim sujjadanw wa qiyaamaa
📖 हिंदी अर्थ
और वह लोग जो अपने परवरदिगार के वास्ते सज़दे और क़याम में रात काट देते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَبِيتُونَ (यबीतून): रात बिताते हैं।
  • سُجَّدًا (सुज्जदन): सजदे की हालत में।
  • قِيَامًا (क़ियामन): खड़े होकर (नमाज़ में)।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत अल्लाह के उन नेक बंदों की खूबियाँ बयान कर रही है जो रात की गहरी नींद को छोड़कर अपने रब की इबादत में मशगूल रहते हैं। ये लोग रात को सजदे में अपने माथे ज़मीन पर टिकाए और क़ियाम (खड़े होकर) में अपने पैरों पर खड़े होकर नमाज़ अदा करते हैं। वे रात की तन्हाई में अपने अंदर अल्लाह के सामने पूरी तरह झुक जाते हैं, अपनी कमज़ोरी और अल्लाह की बड़ाई का इज़हार करते हैं।

रात की इबादत का ख़ास ज़िक्र इसलिए किया गया क्योंकि रात का वक़्त दिखावे और रियाकारी से सबसे ज़्यादा पाक होता है। दिन में लोग देख सकते हैं, लेकिन रात में सिर्फ़ अल्लाह ही देखता है। यह इबादत की सच्चाई और ख़ुलूस (नियत की पवित्रता) की सबसे बड़ी निशानी है। ये लोग सिर्फ़ ज़रूरत के वक़्त ही नहीं, बल्कि हर रात अपने रब के सामने सजदे में पड़ते हैं और क़ियाम में खड़े होकर उससे दुआ करते हैं, अपनी हाजतें पेश करते हैं और उसकी तारीफ़ करते हैं।

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के करीब होने का सबसे बेहतरीन तरीक़ा रात की नमाज़ है। जब इंसान रात को उठकर अल्लाह के सामने खड़ा होता है और सजदे में गिरता है, तो उसका दिल साफ़ हो जाता है, उसके गुनाह माफ़ होते हैं और उसे सुकून मिलता है। यह वक़्त दुआओं की क़बूलियत का होता है। प्यारे नबी ﷺ ने भी रात की नमाज़ को सबसे अफ़ज़ल नमाज़ बताया है। हमें चाहिए कि हम भी अपनी रातों में से कुछ हिस्सा अल्लाह के लिए निकालें, ताकि हमारी ज़िंदगी में बरकत हो और हमारा दिल अल्लाह की याद से रोशन हो। यह आदत हमें दुनिया की मुसीबतों से निकालकर अल्लाह की रहमत के साये में ले आती है।



📜 आयत 62-66 — अल-फुरकान

62وَهُوَ الَّذِي جَعَلَ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ خِلْفَةً لِّمَنْ أَرَادَ أَن يَذَّكَّرَ أَوْ أَرَادَ شُكُورًا
और वही तो वह (ख़ुदा) है जिसने रात और दिन (एक) को (एक का) जानशीन बनाया (ये) उस के (समझने के) लिए है जो नसीहत हासिल करना चाहे या शुक्र गुज़ारी का इरादा करें
63وَعِبَادُ الرَّحْمَٰنِ الَّذِينَ يَمْشُونَ عَلَى الْأَرْضِ هَوْنًا وَإِذَا خَاطَبَهُمُ الْجَاهِلُونَ قَالُوا سَلَامًا
और (ख़ुदाए) रहमान के ख़ास बन्दे तो वह हैं जो ज़मीन पर फिरौतनी के साथ चलते हैं और जब जाहिल उनसे (जिहालत) की बात करते हैं तो कहते हैं कि सलाम (तुम सलामत रहो)
64وَالَّذِينَ يَبِيتُونَ لِرَبِّهِمْ سُجَّدًا وَقِيَامًا
और वह लोग जो अपने परवरदिगार के वास्ते सज़दे और क़याम में रात काट देते हैं
65وَالَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَا اصْرِفْ عَنَّا عَذَابَ جَهَنَّمَ ۖ إِنَّ عَذَابَهَا كَانَ غَرَامًا
और वह लोग जो दुआ करते हैं कि परवरदिगारा हम से जहन्नुम का अज़ाब फेरे रहना क्योंकि उसका अज़ाब बहुत (सख्त और पाएदार होगा)
66إِنَّهَا سَاءَتْ مُسْتَقَرًّا وَمُقَامًا
बेशक वह बहुत बुरा ठिकाना और बुरा मक़ाम है
अल-फुरकानकुरान सूची
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64आयत

अनुवाद — अल-फुरकान 64

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Tuesday, August 18, 2026

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