अल-फुरकान · 65/77
अनुवाद उच्चारण — अल-फुरकान
وَالَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَا اصْرِفْ عَنَّا عَذَابَ جَهَنَّمَ ۖ إِنَّ عَذَابَهَا كَانَ غَرَامًا ۝٦٥
Wallazeena yaqooloona Rabbanas rif `annnaa `azaaba Jahannama inn `azaabahaa kaana gharaamaa
📖 हिंदी अर्थ
और वह लोग जो दुआ करते हैं कि परवरदिगारा हम से जहन्नुम का अज़ाब फेरे रहना क्योंकि उसका अज़ाब बहुत (सख्त और पाएदार होगा)
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • اصْرِفْ عَنَّا – हमसे दूर कर दे
  • غَرَامًا – स्थायी, लगातार बना रहने वाला, जो कभी अलग न हो (जैसे कर्ज़दार का कर्ज़ उसका पीछा नहीं छोड़ता)

तफसीर:

अल्लाह तआला इन आयात में अपने नेक बंदों की विशेषताओं का वर्णन कर रहे हैं, जो रात-दिन उनकी इबादत में मशगूल रहते हैं, और साथ ही उनके दिल अल्लाह के अज़ाब से डरते रहते हैं। ये वे लोग हैं जो अपनी सारी नेकियों और इबादतों के बावजूद अपने रब की रहमत से निराश नहीं होते, बल्कि उसकी पनाह चाहते हैं और दुआ करते हैं: "ऐ हमारे रब! हमसे जहन्नम का अज़ाब दूर कर दे।"

यह दुआ उनके दिल की गहराई से निकलती है, क्योंकि वे जानते हैं कि जहन्नम का अज़ाब कोई आम अज़ाब नहीं है, बल्कि ग़राम है – यानी ऐसा अज़ाब जो हमेशा रहने वाला है, जो कभी खत्म नहीं होगा और न ही उसमें कोई कमी आएगी। जिस तरह कर्ज़दार का कर्ज़ उसका पीछा नहीं छोड़ता, उसी तरह जहन्नम का अज़ाब अपने लोगों का पीछा नहीं छोड़ेगा।

यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चा मोमिन वह है जो इबादत भी करे और अल्लाह के अज़ाब से डरता भी रहे। वह अपनी इबादतों पर घमंड नहीं करता, बल्कि हमेशा अल्लाह की रहमत का मोहताज रहता है। यही विनम्रता और खौफ उसे अल्लाह के और करीब लाता है।

प्यारे भाइयों और बहनों! हमें भी इन नेक बंदों की तरह अपनी दुआओं में यह माँग करनी चाहिए कि अल्लाह हमें जहन्नम के अज़ाब से बचाए। यह दुआ हमारे ईमान की निशानी है, क्योंकि जब हम अज़ाब से डरते हैं तो हम अल्लाह की रहमत की तरफ रुजू करते हैं। अल्लाह तआला अपने बंदों पर बहुत मेहरबान है, वह चाहता है कि हम उससे डरें और उसी से पनाह माँगें। याद रखिए, जहन्नम का अज़ाब सच्चा है और उससे बचने का एक ही रास्ता है – अल्लाह की इबादत, उसके हुक्मों की पैरवी और उसकी रहमत की दुआ।

🎧 सुनें

📜 आयत 63-67 — अल-फुरकान

63وَعِبَادُ الرَّحْمَٰنِ الَّذِينَ يَمْشُونَ عَلَى الْأَرْضِ هَوْنًا وَإِذَا خَاطَبَهُمُ الْجَاهِلُونَ قَالُوا سَلَامًا
और (ख़ुदाए) रहमान के ख़ास बन्दे तो वह हैं जो ज़मीन पर फिरौतनी के साथ चलते हैं और जब जाहिल उनसे (जिहालत) की बात करते हैं तो कहते हैं कि सलाम (तुम सलामत रहो)
64وَالَّذِينَ يَبِيتُونَ لِرَبِّهِمْ سُجَّدًا وَقِيَامًا
और वह लोग जो अपने परवरदिगार के वास्ते सज़दे और क़याम में रात काट देते हैं
65وَالَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَا اصْرِفْ عَنَّا عَذَابَ جَهَنَّمَ ۖ إِنَّ عَذَابَهَا كَانَ غَرَامًا
और वह लोग जो दुआ करते हैं कि परवरदिगारा हम से जहन्नुम का अज़ाब फेरे रहना क्योंकि उसका अज़ाब बहुत (सख्त और पाएदार होगा)
66إِنَّهَا سَاءَتْ مُسْتَقَرًّا وَمُقَامًا
बेशक वह बहुत बुरा ठिकाना और बुरा मक़ाम है
67وَالَّذِينَ إِذَا أَنفَقُوا لَمْ يُسْرِفُوا وَلَمْ يَقْتُرُوا وَكَانَ بَيْنَ ذَٰلِكَ قَوَامًا
और वह लोग कि जब खर्च करते हैं तो न फुज़ूल ख़र्ची करते हैं और न तंगी करते हैं और उनका ख़र्च उसके दरमेयान औसत दर्जे का रहता है
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अनुवाद — अल-फुरकान 65

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Tuesday, August 18, 2026

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