अल-अंकबूत · 27/69
अनुवाद उच्चारण — अल-अंकबूत
وَوَهَبْنَا لَهُ إِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ وَجَعَلْنَا فِي ذُرِّيَّتِهِ النُّبُوَّةَ وَالْكِتَابَ وَآتَيْنَاهُ أَجْرَهُ فِي الدُّنْيَا ۖ وَإِنَّهُ فِي الْآخِرَةِ لَمِنَ الصَّالِحِينَ ۝٢٧
Wa wahabnaa lahoo Ishaaqa wa Ya`Qooba wa ja`alnaa fee zurriyyatihin Nubuwwata wal Kitaaba wa aatainaahu ajrahoo fid dunyaa wa innahoo fil aakhirati laminas saaliheen
📖 हिंदी अर्थ
इसमे शक नहीं कि वह ग़ालिब (और) हिकमत वाला है और हमने इबराहीम को इसहाक़ (सा बेटा) और याक़ूब (सा पोता) अता किया और उनकी नस्ल में पैग़म्बरी और किताब क़रार दी और हम न इबराहीम को दुनिया में भी अच्छा बदला अता किया और वह तो आख़ेरत में भी यक़ीनी नेको कारों से हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • وَهَبْنَا: हमने (अल्लाह ने) दान किया / प्रदान किया
  • ذُرِّيَّتِهِ: उसकी संतान / उसके वंश में
  • النُّبُوَّةَ: पैग़म्बरी / नबुव्वत
  • الْكِتَابَ: किताबें (आसमानी किताबें, जैसे तौरात, ज़बूर, इंजील, क़ुरआन)
  • أَجْرَهُ: उसका प्रतिफल / बदला
  • الصَّالِحِينَ: नेक लोग / सच्चे और अच्छे लोग

तफ़सीर (व्याख्या):

इस पवित्र आयत में अल्लाह तआला अपने ख़लील (दोस्त) हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की उस महान कुर्बानी और सब्र का ज़िक्र कर रहे हैं, जो उन्होंने अपने रब की राह में दी। अल्लाह ने उन्हें न सिर्फ़ बेटा इशाक़ अता किया, बल्कि उनके बेटे याक़ूब को भी उनकी नस्ल में दिया, और इससे भी बड़ी बात यह कि उनकी संतान में नबुव्वत और आसमानी किताबों का सिलसिला जारी किया। यानी हज़रत इब्राहीम के वंश से ही अधिकतर पैग़म्बर आए, और तौरात, ज़बूर, इंजील और क़ुरआन जैसी किताबें उन्हीं की नस्ल में उतारी गईं। यह अल्लाह की तरफ से इब्राहीम अलैहिस्सलाम के लिए एक बहुत बड़ा सम्मान और इनाम था।

अल्लाह ने उन्हें दुनिया में भी अच्छा बदला दिया — यानी नेक संतान, अच्छी शोहरत और लोगों के दिलों में उनका सम्मान। और आख़िरत में भी वह उन नेक लोगों के साथ होंगे जिन्हें अल्लाह की रहमत और जन्नत हासिल होगी। यह उनके सब्र, ईमान और अल्लाह की राह में हर कुर्बानी देने का नतीजा था।

दावत और नसीहत:

इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि जो व्यक्ति अल्लाह की राह में सब्र करता है, अपनी ज़िंदगी को अल्लाह के हुक्मों के मुताबिक ढालता है, और अपने ईमान पर क़ायम रहता है, अल्लाह उसे कभी अकेला नहीं छोड़ता। वह उसे दुनिया में भी इज़्ज़त देता है और आख़िरत में भी। हज़रत इब्राहीम ने अपने बेटे को कुर्बानी करने का हुक्म मिलने पर भी सब्र किया, और अल्लाह ने उन्हें ऐसा इनाम दिया जो आज तक ज़िंदा है। हमें भी चाहिए कि अपनी ज़िंदगी में अल्लाह पर भरोसा रखें, उसकी राह में मुश्किलों का सामना करें, और यक़ीन रखें कि अल्लाह हमें कभी निराश नहीं करेगा। जो लोग अल्लाह की राह में नेकी करते हैं, उनका अंजाम हमेशा अच्छा होता है — दुनिया में भी और आख़िरत में भी। यही सच्ची कामयाबी है।



📜 आयत 25-29 — अल-अंकबूत

25وَقَالَ إِنَّمَا اتَّخَذْتُم مِّن دُونِ اللَّهِ أَوْثَانًا مَّوَدَّةَ بَيْنِكُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۖ ثُمَّ يَوْمَ الْقِيَامَةِ يَكْفُرُ بَعْضُكُم بِبَعْضٍ وَيَلْعَنُ بَعْضُكُم بَعْضًا وَمَأْوَاكُمُ النَّارُ وَمَا لَكُم مِّن نَّاصِرِينَ
और इबराहीम ने (अपनी क़ौम से) कहा कि तुम लोगों ने ख़ुदा को छोड़कर बुतो को सिर्फ दुनिया की ज़िन्दगी में बाहम मोहब्त करने की वजह से (ख़ुदा) बना रखा है फिर क़यामत के दिन तुम में से एक का एक इनकार करेगा और एक दूसरे पर लानत करेगा और (आख़िर) तुम लोगों का ठिकाना जहन्नुम है और (उस वक्त तुम्हारा कोई भी मददगार न होगा)
26۞ فَآمَنَ لَهُ لُوطٌ ۘ وَقَالَ إِنِّي مُهَاجِرٌ إِلَىٰ رَبِّي ۖ إِنَّهُ هُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ
तब सिर्फ लूत इबराहीम पर ईमान लाए और इबराहीम ने कहा मै तो देस को छोड़कर अपने परवरदिगार की तरफ (जहाँ उसको मंज़ूर हो ) निकल जाऊँगा
27وَوَهَبْنَا لَهُ إِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ وَجَعَلْنَا فِي ذُرِّيَّتِهِ النُّبُوَّةَ وَالْكِتَابَ وَآتَيْنَاهُ أَجْرَهُ فِي الدُّنْيَا ۖ وَإِنَّهُ فِي الْآخِرَةِ لَمِنَ الصَّالِحِينَ
इसमे शक नहीं कि वह ग़ालिब (और) हिकमत वाला है और हमने इबराहीम को इसहाक़ (सा बेटा) और याक़ूब (सा पोता) अता किया और उनकी नस्ल में पैग़म्बरी और किताब क़रार दी और हम न इबराहीम को दुनिया में भी अच्छा बदला अता किया और वह तो आख़ेरत में भी यक़ीनी नेको कारों से हैं
28وَلُوطًا إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِ إِنَّكُمْ لَتَأْتُونَ الْفَاحِشَةَ مَا سَبَقَكُم بِهَا مِنْ أَحَدٍ مِّنَ الْعَالَمِينَ
(और ऐ रसूल) लूत को (याद करो) जब उन्होंने अपनी क़ौम से कहा कि तुम लोग अजब बेहयाई का काम करते हो कि तुमसे पहले सारी खुदायी के लोगों में से किसी ने नहीं किया
29أَئِنَّكُمْ لَتَأْتُونَ الرِّجَالَ وَتَقْطَعُونَ السَّبِيلَ وَتَأْتُونَ فِي نَادِيكُمُ الْمُنكَرَ ۖ فَمَا كَانَ جَوَابَ قَوْمِهِ إِلَّا أَن قَالُوا ائْتِنَا بِعَذَابِ اللَّهِ إِن كُنتَ مِنَ الصَّادِقِينَ
तुम लोग (औरतों को छोड़कर कज़ाए शहवत के लिए) मर्दों की तरफ गिरते हो और (मुसाफिरों की) रहजनी करते हो और तुम लोग अपनी महफिलों में बुरी बुरी हरकते करते हो तो (इन सब बातों का) लूत की क़ौम के पास इसके सिवा कोई जवाब न था कि वह लोग कहने लगे कि भला अगर तुम सच्चे हो तो हम पर ख़ुदा का अज़ाब तो ले आओ
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अनुवाद — अल-अंकबूत 27

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