अल-अंकबूत · 44/69
अनुवाद उच्चारण — अल-अंकबूत
خَلَقَ اللَّهُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ بِالْحَقِّ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً لِّلْمُؤْمِنِينَ ۝٤٤
Khalaqal laahus samaawaati wal arda bilhaqq; inna fee zaalika la aayatal lilmu mineen
📖 हिंदी अर्थ
ख़ुदा ने सारे आसमान और ज़मीन को बिल्कुल ठीक पैदा किया इसमें शक नहीं कि उसमें ईमानदारों के वास्ते (कुदरते ख़ुदा की) यक़ीनी बड़ी निशानी है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • बिल-हक़्क़ (بِالْحَقِّ): सही उद्देश्य के साथ, बुद्धिमानी और न्याय पर आधारित, न कि बेकार या खेल-तमाशे के तौर पर।
  • आयत (آيَةً): निशानी, सबूत, दलील।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला ने आसमानों और ज़मीन को सच्चाई और अदल के साथ पैदा किया है। उसने यह सब कुछ बेकार या मज़ाक़ के तौर पर नहीं बनाया, बल्कि एक गहरे हिकमत (बुद्धिमत्ता) और सही मक़सद के तहत पैदा किया। यह पूरी कायनात — ये विशाल आसमान, ये चमकते सितारे, ये ऊँचे पहाड़, ये बहते समुद्र, और यह धरती जो हमें सहारा देती है — सब कुछ अल्लाह की क़ुदरत (शक्ति) का ज़िंदा सबूत है।

इस सृष्टि में मोमिनों (ईमानवालों) के लिए एक बड़ी निशानी है। जब वे इस कायनात को देखते हैं, तो उनकी आँखें खुल जाती हैं और उनका दिल अल्लाह की अज़मत (महानता) और वहदानियत (एकता) की गवाही देता है। वे हर चीज़ में अल्लाह की क़ुदरत के निशान देखते हैं — रात और दिन के बदलने में, बारिश के बाद ज़मीन के हरे-भरे होने में, और अपने जिस्म के बनावट में भी। यह सब उन्हें याद दिलाता है कि इस कायनात का ख़ालिक़ (रचनेवाला) एक ही है, और वही इबादत के लायक़ है।

लेकिन यह निशानी सिर्फ़ उन्हीं लोगों के लिए फ़ायदेमंद है जो ईमान रखते हैं। काफ़िर लोग इन्हीं आयतों के बीच रहते हुए भी ग़ाफ़िल रहते हैं — वे आसमान की बुलंदी देखते हैं, लेकिन उसके बनाने वाले की अज़मत नहीं पहचानते; वे ज़मीन की हुस्न-ओ-जमाल देखते हैं, लेकिन उसके पैदा करने वाले की क़ुदरत से बेख़बर रहते हैं। उनकी निगाहें देखती हैं, लेकिन उनके दिल अंधे हैं।

प्यारे भाइयो और बहनो! यह आयत हमें ग़ौर और फ़िक्र की दावत देती है। जब भी तुम आसमान की तरफ़ देखो, जब भी ज़मीन की हरियाली पर नज़र पड़े, तो याद करो कि यह सब किसी खिलाड़ी ने नहीं बनाया, बल्कि उस ज़ात ने बनाया है जो हर चीज़ पर क़ादिर है। यही ग़ौर-ओ-फ़िक्र हमारे ईमान को मज़बूत करता है और हमें अल्लाह के और करीब लाता है। अल्लाह तआला हम सबको इस कायनात की निशानियों से सीखने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।



📜 आयत 42-46 — अल-अंकबूत

42إِنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا يَدْعُونَ مِن دُونِهِ مِن شَيْءٍ ۚ وَهُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ
ख़ुदा को छोड़कर ये लोग जिस चीज़ को पुकारते हैं उससे ख़ुदा यक़ीनी वाक़िफ है और वह तो (सब पर) ग़ालिब (और) हिकमत वाला है
43وَتِلْكَ الْأَمْثَالُ نَضْرِبُهَا لِلنَّاسِ ۖ وَمَا يَعْقِلُهَا إِلَّا الْعَالِمُونَ
और हम ये मिसाले लोगों के (समझाने) के वास्ते बयान करते हैं और उन को तो बस उलमा ही समझते हैं
44خَلَقَ اللَّهُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ بِالْحَقِّ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً لِّلْمُؤْمِنِينَ
ख़ुदा ने सारे आसमान और ज़मीन को बिल्कुल ठीक पैदा किया इसमें शक नहीं कि उसमें ईमानदारों के वास्ते (कुदरते ख़ुदा की) यक़ीनी बड़ी निशानी है
45اتْلُ مَا أُوحِيَ إِلَيْكَ مِنَ الْكِتَابِ وَأَقِمِ الصَّلَاةَ ۖ إِنَّ الصَّلَاةَ تَنْهَىٰ عَنِ الْفَحْشَاءِ وَالْمُنكَرِ ۗ وَلَذِكْرُ اللَّهِ أَكْبَرُ ۗ وَاللَّهُ يَعْلَمُ مَا تَصْنَعُونَ
(ऐ रसूल) जो किताब तुम्हारे पास नाज़िल की गयी है उसकी तिलावत करो और पाबन्दी से नमाज़ पढ़ो बेशक नमाज़ बेहयाई और बुरे कामों से बाज़ रखती है और ख़ुदा की याद यक़ीनी बड़ा मरतबा रखती है और तुम लोग जो कुछ करते हो ख़ुदा उससे वाक़िफ है
46۞ وَلَا تُجَادِلُوا أَهْلَ الْكِتَابِ إِلَّا بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ إِلَّا الَّذِينَ ظَلَمُوا مِنْهُمْ ۖ وَقُولُوا آمَنَّا بِالَّذِي أُنزِلَ إِلَيْنَا وَأُنزِلَ إِلَيْكُمْ وَإِلَٰهُنَا وَإِلَٰهُكُمْ وَاحِدٌ وَنَحْنُ لَهُ مُسْلِمُونَ
और (ऐ ईमानदारों) अहले किताब से मनाज़िरा न किया करो मगर उमदा और शाएस्ता अलफाज़ व उनवान से लेकिन उनमें से जिन लोगों ने तुम पर ज़ुल्म किया (उनके साथ रिआयत न करो) और साफ साफ कह दो कि जो किताब हम पर नाज़िल हुई और जो किताब तुम पर नाज़िल हुई है हम तो सब पर ईमान ला चुके और हमारा माबूद और तुम्हारा माबूद एक ही है और हम उसी के फरमाबरदार है
अल-अंकबूतकुरान सूची
69आयत
मक्कीRevelation
44आयत

अनुवाद — अल-अंकबूत 44

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Tuesday, August 18, 2026

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