अल-अंकबूत · 60/69
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-अंकबूत
وَكَأَيِّن مِّن دَابَّةٍ لَّا تَحْمِلُ رِزْقَهَا اللَّهُ يَرْزُقُهَا وَإِيَّاكُمْ ۚ وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ ۝٦٠
Wa ka ayyim min daaabbatil laa tahmilu riqqahaa; al laahu yarzuquhaa wa iyyaakum; wa Huwas Samee`ul Aleem
📖 हिंदी अर्थ
और ज़मीन पर चलने वालों में बहुतेरे ऐसे हैं जो अपनी रोज़ी अपने ऊपर लादे नहीं फिरते ख़ुदा ही उनको भी रोज़ी देता है और तुम को भी और वह बड़ा सुनने वाला वाक़िफकार है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • دَابَّةٍ (दाब्बह): धरती पर चलने वाला हर जीव-जंतु।
  • لَا تَحْمِلُ رِزْقَهَا (ला तहमिलु रिज़्क़हा): अपनी रोज़ी को उठा नहीं सकती, यानी अपने भोजन को जमा करके रखने या ले जाने की ताकत नहीं रखती।
  • وَإِيَّاكُمْ (व इय्याकुम): और तुम्हें भी (रोज़ी देता है)।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस पवित्र आयत में अल्लाह तआला अपने बंदों को एक बहुत बड़ा सबक़ सिखा रहा है। वह फ़रमाता है कि धरती पर कितने ही ऐसे जीव-जंतु हैं जो अपनी रोज़ी का इंतज़ाम ख़ुद नहीं कर सकते। न वे अपने लिए खाना जमा कर सकते हैं, न उसे ढो सकते हैं, न किसी गोदाम में रख सकते हैं। फिर भी अल्लाह तआला उन्हें रोज़ी पहुँचाता है — चाहे वे जंगलों में हों, पहाड़ों की दरारों में, समुद्र की गहराइयों में या रेगिस्तान की तपती रेत पर। वे कमज़ोर और लाचार हैं, लेकिन अल्लाह की रहमत उन तक पहुँचती है।

यह आयत उस समय नाज़िल हुई जब कुछ मुसलमान मक्का से मदीना हिजरत (प्रवास) करने में झिझक रहे थे, क्योंकि उन्हें डर था कि वहाँ जाकर उन्हें रोज़ी कैसे मिलेगी, उनका धंधा-रोज़गार क्या होगा। अल्लाह ने उन्हें समझाया कि जिस अल्लाह ने तुम्हें मक्का में रोज़ी दी, वही मदीना में भी देगा। जो ख़ुदा पक्षियों, कीड़ों और छोटे जानवरों को रोज़ी देता है, क्या वह अपने ईमानवाले बंदों को भूल जाएगा? हरगिज़ नहीं!

अल्लाह तआला फ़रमाता है: "वह सुनने वाला है, जानने वाला है।" यानी वह तुम्हारी उन बातों को सुनता है जो तुम कहते हो कि "हमें डर है कि हिजरत के बाद भूखे मर जाएँगे", और वह तुम्हारे दिलों के राज़ और नीयतों को भी जानता है। वह जानता है कि तुम्हारा डर सच्चा है या बहाना। वह तुम्हारे अच्छे कर्मों और बुरे कर्मों से बेख़बर नहीं है, और हर एक को उसके कर्मों का बदला देगा।

दावती पहलू:

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें यक़ीन दिलाती है कि रोज़ी देने वाला सिर्फ़ अल्लाह है। हम चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, जो हमारे नसीब में लिखा है, वही मिलेगा। और जो हमारे नसीब में नहीं, वह हमें कभी नहीं मिल सकता। इसलिए अल्लाह की राह में क़दम बढ़ाते समय रोज़ी का डर हमें रोकना नहीं चाहिए। जब हम अल्लाह पर भरोसा करते हैं, तो वह हमें ऐसी जगह से रोज़ी देता है जिसका हमें ख़याल भी नहीं होता। यही तो अल्लाह का वादा है — और अल्लाह का वादा कभी झूठा नहीं होता। आइए, हम अपने दिलों से रोज़ी का डर निकालें और अल्लाह पर पूरा भरोसा रखें। वह सब कुछ सुनता और जानता है, और वह अपने बंदों को कभी अकेला नहीं छोड़ता।



📜 आयत 58-62 — सूरा अल-अंकबूत

58وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَنُبَوِّئَنَّهُم مِّنَ الْجَنَّةِ غُرَفًا تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا ۚ نِعْمَ أَجْرُ الْعَامِلِينَ
और जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए उनको हम बेहश्त के झरोखों में जगह देगें जिनके नीचे नहरें जारी हैं जिनमें वह हमेशा रहेंगे (अच्छे चलन वालो की भी क्या ख़ूब ख़री मज़दूरी है)
59الَّذِينَ صَبَرُوا وَعَلَىٰ رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ
जिन्होंने (दुनिया में मुसिबतों पर) सब्र किया और अपने परवरदिगार पर भरोसा रखते हैं
60وَكَأَيِّن مِّن دَابَّةٍ لَّا تَحْمِلُ رِزْقَهَا اللَّهُ يَرْزُقُهَا وَإِيَّاكُمْ ۚ وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ
और ज़मीन पर चलने वालों में बहुतेरे ऐसे हैं जो अपनी रोज़ी अपने ऊपर लादे नहीं फिरते ख़ुदा ही उनको भी रोज़ी देता है और तुम को भी और वह बड़ा सुनने वाला वाक़िफकार है
61وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّنْ خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ وَسَخَّرَ الشَّمْسَ وَالْقَمَرَ لَيَقُولُنَّ اللَّهُ ۖ فَأَنَّىٰ يُؤْفَكُونَ
(ऐ रसूल) अगर तुम उनसे पूछो कि (भला) किसने सारे आसमान व ज़मीन को पैदा किया और चाँद और सूरज को काम में लगाया तो वह ज़रुर यही कहेंगे कि अल्लाह ने फिर वह कहाँ बहके चले जाते हैं
62اللَّهُ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ وَيَقْدِرُ لَهُ ۚ إِنَّ اللَّهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ
ख़ुदा ही अपने बन्दों में से जिसकी रोज़ी चाहता है कुशादा कर देता है और जिसके लिए चाहता है तंग कर देता है इसमें शक नहीं कि ख़ुदा ही हर चीज़ से वाक़िफ है
अल-अंकबूतकुरान सूची
69आयत
मक्कीअवतरण स्थान
60आयत

अनुवाद — अल-अंकबूत 60

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Thursday, October 1, 2026

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