आल-इमरान · 156/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ كَفَرُوا وَقَالُوا لِإِخْوَانِهِمْ إِذَا ضَرَبُوا فِي الْأَرْضِ أَوْ كَانُوا غُزًّى لَّوْ كَانُوا عِندَنَا مَا مَاتُوا وَمَا قُتِلُوا لِيَجْعَلَ اللَّهُ ذَٰلِكَ حَسْرَةً فِي قُلُوبِهِمْ ۗ وَاللَّهُ يُحْيِي وَيُمِيتُ ۗ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ ۝١٥٦
Yaaa ayyuhul lazeena aamanoo laa takoonoo kallazeena kafaroo wa qaaloo li ikhwaanihim izaa daraboo fil ardi aw kaanoo ghuzzal law kaanoo `indanaa maa maatoo wa maa qutiloo liyaj`alal laahu zaalika hasratan fee quloobihim; qallaahu yuhyee wa yumeet; wallaahu bimaa ta`maloona Baseer
📖 हिंदी अर्थ
ऐ ईमानदारों उन लोगों के ऐसे न बनो जो काफ़िर हो गए भाई बन्द उनके परदेस में निकले हैं या जेहाद करने गए हैं (और वहॉ) मर (गए) तो उनके बारे में कहने लगे कि वह हमारे पास रहते तो न मरते ओर न मारे जाते (और ये इस वजह से कहते हैं) ताकि ख़ुदा (इस ख्याल को) उनके दिलों में (बाइसे) हसरत बना दे और (यूं तो) ख़ुदा ही जिलाता और मारता है और जो कुछ तुम करते हो ख़ुदा उसे देख रहा है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ضَرَبُوا فِي الْأَرْضِ: धरती पर यात्रा करना, व्यापार या किसी अन्य कार्य के लिए सफर करना।
  • غُزًّى: "غازٍ" का बहुवचन, अर्थात युद्ध करने वाले, जिहाद के लिए निकलने वाले।
  • حَسْرَةً: पछतावा, गहरा दुःख और अफसोस।

तफसीर (व्याख्या):

हे ईमानवालों! तुम उन काफिरों और मुनाफिकों की तरह न बनो, जो अपने भाइयों (रिश्तेदारों या हम-विचारधारा वालों) के बारे में, जब वे धरती पर व्यापार या किसी और काम के लिए सफर करते हैं या युद्ध में भाग लेने जाते हैं और फिर मर जाते हैं या मारे जाते हैं, तो कहते हैं: "काश! वे हमारे पास रहते, तो न मरते और न मारे जाते।" यह कहना और ऐसा विश्वास रखना उनके दिलों में और अधिक पछतावा और हसरत पैदा करता है। अल्लाह ने यह बात उनके दिलों में इसलिए डाली कि वे और अधिक दुःखी और पछतावे में डूबे रहें। लेकिन ईमानवालों को यह समझना चाहिए कि मौत और ज़िंदगी पूरी तरह अल्लाह के हाथ में है। वही जीवन देता है और वही मौत देता है। कोई व्यक्ति सफर में हो या घर पर, युद्ध में हो या शांति में, उसकी मौत का समय अल्लाह ही निर्धारित करता है। न तो सफर मौत को जल्दी लाता है और न ही घर पर रहना उसे टाल सकता है। अल्लाह तुम्हारे सभी कर्मों को देख रहा है और उसके अनुसार तुम्हें बदला देगा। इसलिए तुम उन लोगों की तरह बातें मत करो, जो अल्लाह के फैसले पर संदेह करते हैं।

फायदे और सबक:

  1. मौत और ज़िंदगी पूरी तरह अल्लाह के इख्तियार में है। किसी भी जतन से उसके फैसले को नहीं बदला जा सकता।
  2. किसी मुसीबत या मौत पर अफसोस करना और "काश ऐसा न हुआ होता" कहना ईमान की कमजोरी की निशानी है। सच्चे मुसलमान को अल्लाह के फैसले पर संतुष्ट रहना चाहिए।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि दूसरों के दुःख पर उन्हें और दुखी करने वाली बातें न कहें, बल्कि उन्हें सब्र और अल्लाह के भरोसे की तालीम दें।
  4. अल्लाह की निगरानी का एहसास हमें हर अच्छे और बुरे काम में सावधानी सिखाता है, क्योंकि वह सब कुछ देख रहा है।
  5. यह आयत मुनाफिकों की सोच से बचने की ताकीद करती है, जो अल्लाह की तकदीर पर भरोसा नहीं करते और अपनी नासमझी से दूसरों को भी गुमराह करते हैं।
🎧 सुनें

📜 आयत 154-158 — आल-इमरान

154ثُمَّ أَنزَلَ عَلَيْكُم مِّن بَعْدِ الْغَمِّ أَمَنَةً نُّعَاسًا يَغْشَىٰ طَائِفَةً مِّنكُمْ ۖ وَطَائِفَةٌ قَدْ أَهَمَّتْهُمْ أَنفُسُهُمْ يَظُنُّونَ بِاللَّهِ غَيْرَ الْحَقِّ ظَنَّ الْجَاهِلِيَّةِ ۖ يَقُولُونَ هَل لَّنَا مِنَ الْأَمْرِ مِن شَيْءٍ ۗ قُلْ إِنَّ الْأَمْرَ كُلَّهُ لِلَّهِ ۗ يُخْفُونَ فِي أَنفُسِهِم مَّا لَا يُبْدُونَ لَكَ ۖ يَقُولُونَ لَوْ كَانَ لَنَا مِنَ الْأَمْرِ شَيْءٌ مَّا قُتِلْنَا هَاهُنَا ۗ قُل لَّوْ كُنتُمْ فِي بُيُوتِكُمْ لَبَرَزَ الَّذِينَ كُتِبَ عَلَيْهِمُ الْقَتْلُ إِلَىٰ مَضَاجِعِهِمْ ۖ وَلِيَبْتَلِيَ اللَّهُ مَا فِي صُدُورِكُمْ وَلِيُمَحِّصَ مَا فِي قُلُوبِكُمْ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ
फिर ख़ुदा ने इस रंज के बाद तुमपर इत्मिनान की हालत तारी की कि तुममें से एक गिरोह का (जो सच्चे ईमानदार थे) ख़ूब गहरी नींद आ गयी और एक गिरोह जिनको उस वक्त भी (भागने की शर्म से) जान के लाले पड़े थे ख़ुदा के साथ (ख्वाह मख्वाह) ज़मानाए जिहालत की ऐसी बदगुमानियॉ करने लगे और कहने लगे भला क्या ये अम्र (फ़तेह) कुछ भी हमारे इख्तियार में है (ऐ रसूल) कह दो कि हर अम्र का इख्तियार ख़ुदा ही को है (ज़बान से तो कहते ही है नहीं) ये अपने दिलों में ऐसी बातें छिपाए हुए हैं जो तुमसे ज़ाहिर नहीं करते (अब सुनो) कहते हैं कि इस अम्र (फ़तेह) में हमारा कुछ इख़्तियार होता तो हम यहॉ मारे न जाते (ऐ रसूल उनसे) कह दो कि तुम अपने घरों में रहते तो जिन जिन की तकदीर में लड़के मर जाना लिखा था वह अपने (घरो से) निकल निकल के अपने मरने की जगह ज़रूर आ जाते और (ये इस वास्ते किया गया) ताकि जो कुछ तुम्हारे दिल में है उसका इम्तिहान कर दे और ख़ुदा तो दिलों के राज़ खूब जानता है
155إِنَّ الَّذِينَ تَوَلَّوْا مِنكُمْ يَوْمَ الْتَقَى الْجَمْعَانِ إِنَّمَا اسْتَزَلَّهُمُ الشَّيْطَانُ بِبَعْضِ مَا كَسَبُوا ۖ وَلَقَدْ عَفَا اللَّهُ عَنْهُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ حَلِيمٌ
बेशक जिस दिन (जंगे औहद में) दो जमाअतें आपस में गुथ गयीं उस दिन जो लोग तुम (मुसलमानों) में से भाग खड़े हुए (उसकी वजह ये थी कि) उनके बाज़ गुनाहों (मुख़ालफ़ते रसूल) की वजह से शैतान ने बहका के उनके पॉव उखाड़ दिए और (उसी वक्त तो) ख़ुदा ने ज़रूर उनसे दरगुज़र की बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला बुर्दवार है
156يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ كَفَرُوا وَقَالُوا لِإِخْوَانِهِمْ إِذَا ضَرَبُوا فِي الْأَرْضِ أَوْ كَانُوا غُزًّى لَّوْ كَانُوا عِندَنَا مَا مَاتُوا وَمَا قُتِلُوا لِيَجْعَلَ اللَّهُ ذَٰلِكَ حَسْرَةً فِي قُلُوبِهِمْ ۗ وَاللَّهُ يُحْيِي وَيُمِيتُ ۗ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ
ऐ ईमानदारों उन लोगों के ऐसे न बनो जो काफ़िर हो गए भाई बन्द उनके परदेस में निकले हैं या जेहाद करने गए हैं (और वहॉ) मर (गए) तो उनके बारे में कहने लगे कि वह हमारे पास रहते तो न मरते ओर न मारे जाते (और ये इस वजह से कहते हैं) ताकि ख़ुदा (इस ख्याल को) उनके दिलों में (बाइसे) हसरत बना दे और (यूं तो) ख़ुदा ही जिलाता और मारता है और जो कुछ तुम करते हो ख़ुदा उसे देख रहा है
157وَلَئِن قُتِلْتُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَوْ مُتُّمْ لَمَغْفِرَةٌ مِّنَ اللَّهِ وَرَحْمَةٌ خَيْرٌ مِّمَّا يَجْمَعُونَ
और अगर तुम ख़ुदा की राह में मारे जाओ या (अपनी मौत से) मर जाओ तो बेशक ख़ुदा की बख्शिश और रहमत इस (माल व दौलत) से जिसको तुम जमा करते हो ज़रूर बेहतर है
158وَلَئِن مُّتُّمْ أَوْ قُتِلْتُمْ لَإِلَى اللَّهِ تُحْشَرُونَ
और अगर तुम (अपनी मौत से) मरो या मारे जाओ (आख़िरकार) ख़ुदा ही की तरफ़ (क़ब्रों से) उठाए जाओगे
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अनुवाद — आल-इमरान 156

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Tuesday, August 18, 2026

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