आल-इमरान · 70/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تَكْفُرُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَأَنتُمْ تَشْهَدُونَ ۝٧٠
Yaaa Ahlal Kitaabi lima takfuroona bi Aayaatil laahi wan antum tashadoon
📖 हिंदी अर्थ
और उसको समझते (भी) नहीं ऐ अहले किताब तुम ख़ुदा की आयतों से क्यों इन्कार करते हो, हालॉकि तुम ख़ुद गवाह बन सकते हो
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لِمَ (लिमा): क्यों, किस कारण से
  • تَكْفُرُونَ (तक्फुरून): तुम इनकार करते हो, झुठलाते हो
  • بِآيَاتِ اللَّهِ (बिआयातिल्लाह): अल्लाह की निशानियों और उसकी प्रकट की हुई आयतों के साथ
  • تَشْهَدُونَ (तश्हदून): तुम गवाही देते हो, तुम्हें यक़ीन है और तुम जानते हो

विस्तृत व्याख्या:

अल्लाह तआला अपने नबी मुहम्मद ﷺ के ज़रिए अहले-किताब (यहूदियों और ईसाइयों) को संबोधित करते हुए फ़रमाता है: "ऐ किताब वालो! तुम अल्लाह की आयतों और उसकी निशानियों को क्यों झुठलाते हो और उनका इनकार क्यों करते हो?" ये आयतें वो हैं जो अल्लाह ने अपने रसूलों पर उतारीं, जिनमें तौरात और इंजील में मौजूद वो स्पष्ट निशानियाँ और गुण शामिल हैं जो मुहम्मद ﷺ की नबुव्वत की गवाही देती हैं। इन किताबों में उनके आने की ख़ुशख़बरी दी गई थी और उनके नाम, गुण और आने के समय का ज़िक्र मौजूद था।

अल्लाह उनसे कहता है: तुम ख़ुद जानते हो और गवाही देते हो कि ये बातें तुम्हारी किताबों में लिखी हुई हैं, फिर भी तुम हठ और ज़िद की वजह से इन्हें छिपाते हो और मुहम्मद ﷺ पर ईमान नहीं लाते। तुम्हारा ये इनकार किसी अज्ञानता की वजह से नहीं, बल्कि सच्चाई जानते हुए भी उसे ठुकराने की वजह से है। तुम्हारे पास इल्म है, फिर भी तुम अल्लाह की आयतों का इनकार करते हो, जबकि तुम ख़ुद गवाह हो कि ये सच हैं। ये तुम्हारी सबसे बड़ी ग़लती और सरकशी है।

फ़ायदे और सबक़:

  1. इस आयत से पता चलता है कि इल्म और जानकारी के बावजूद सच्चाई को न मानना सबसे बड़ा ज़ुल्म और गुमराही है। अल्लाह के पास इंसान का इल्म उसके हुज्जत (प्रमाण) के ख़िलाफ़ गवाह बनेगा।
  2. अल्लाह तआला ने अपने नबी ﷺ की नबुव्वत की पुष्टि पहले की किताबों में भी की थी, ताकि लोगों पर हुज्जत क़ायम हो जाए और कोई बहाना न बचे।
  3. ये आयत हमें सिखाती है कि सच्चाई को कबूल करने में देरी नहीं करनी चाहिए, चाहे वो किसी भी ज़रिए से मिले। जब दिल को यक़ीन हो जाए तो फ़ौरन ईमान लाना चाहिए।
  4. अल्लाह की आयतों को छिपाना और जानते हुए उनका इनकार करना बहुत बड़ा गुनाह है, जिससे बचना हर मुसलमान का फ़र्ज़ है।
  5. ये आयत हमें बताती है कि क़ुरआन और पहले की किताबों में जो भी सच्चाई है, वो एक ही अल्लाह की तरफ़ से है, और इस्लाम ही वो दीन है जिसे अल्लाह ने सब नबियों के ज़रिए भेजा।
🎧 सुनें

📜 आयत 68-72 — आल-इमरान

68إِنَّ أَوْلَى النَّاسِ بِإِبْرَاهِيمَ لَلَّذِينَ اتَّبَعُوهُ وَهَٰذَا النَّبِيُّ وَالَّذِينَ آمَنُوا ۗ وَاللَّهُ وَلِيُّ الْمُؤْمِنِينَ
इबराहीम से ज्यादा ख़ुसूसियत तो उन लोगों को थी जो ख़ास उनकी पैरवी करते थे और उस पैग़म्बर और ईमानदारों को (भी) है और मोमिनीन का ख़ुदा मालिक है
69وَدَّت طَّائِفَةٌ مِّنْ أَهْلِ الْكِتَابِ لَوْ يُضِلُّونَكُمْ وَمَا يُضِلُّونَ إِلَّا أَنفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَ
(मुसलमानो) अहले किताब से एक गिरोह ने बहुत चाहा कि किसी तरह तुमको राहेरास्त से भटका दे हालॉकि वह (अपनी तदबीरों से तुमको तो नहीं मगर) अपने ही को भटकाते हैं
70يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تَكْفُرُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَأَنتُمْ تَشْهَدُونَ
और उसको समझते (भी) नहीं ऐ अहले किताब तुम ख़ुदा की आयतों से क्यों इन्कार करते हो, हालॉकि तुम ख़ुद गवाह बन सकते हो
71يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تَلْبِسُونَ الْحَقَّ بِالْبَاطِلِ وَتَكْتُمُونَ الْحَقَّ وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ
ऐ अहले किताब तुम क्यो हक़ व बातिल को गड़बड़ करते और हक़ को छुपाते हो हालॉकि तुम जानते हो
72وَقَالَت طَّائِفَةٌ مِّنْ أَهْلِ الْكِتَابِ آمِنُوا بِالَّذِي أُنزِلَ عَلَى الَّذِينَ آمَنُوا وَجْهَ النَّهَارِ وَاكْفُرُوا آخِرَهُ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
और अहले किताब से एक गिरोह ने (अपने लोगों से) कहा कि मुसलमानों पर जो किताब नाज़िल हुईहै उसपर सुबह सवेरे ईमान लाओ और आख़िर वक्त ऌन्कार कर दिया करो शायद मुसलमान (इसी तदबीर से अपने दीन से) फिर जाए
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अनुवाद — आल-इमरान 70

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Tuesday, August 18, 2026

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