आल-इमरान · 9/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
رَبَّنَا إِنَّكَ جَامِعُ النَّاسِ لِيَوْمٍ لَّا رَيْبَ فِيهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يُخْلِفُ الْمِيعَادَ ۝٩
Rabbanaaa innaka jaami `un-naasi li Yawmil laa raibafeeh; innal laaha laa yukhliful mee`aad
📖 हिंदी अर्थ
ऐ हमारे परवरदिगार बेशक तू एक न एक दिन जिसके आने में शुबह नहीं लोगों को इक्ट्ठा करेगा (तो हम पर नज़रे इनायत रहे) बेशक ख़ुदा अपने वायदे के ख़िलाफ़ नहीं करता
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • جَامِعُ النَّاسِ: सभी लोगों को इकट्ठा करने वाला।
  • لِيَوْمٍ لَّا رَيْبَ فِيهِ: उस दिन के लिए जिसमें कोई संदेह नहीं।
  • لَا يُخْلِفُ الْمِيعَادَ: वादे के विपरीत नहीं करता, अर्थात अपना वादा अवश्य पूरा करता है।

व्याख्या:

यह आयत उन ईमानवालों की प्रार्थना का हिस्सा है जो अपने रब से दुआ करते हुए कहते हैं: "हे हमारे पालनहार! हम इस बात की गवाही देते हैं और पूर्ण विश्वास रखते हैं कि तू सभी इंसानों को—चाहे वे पहले आए हों या बाद में—एक निश्चित दिन अवश्य इकट्ठा करेगा। वह दिन क़यामत का दिन है, जिसके आने में ज़रा भी संदेह नहीं। यह दिन अवश्य आएगा, क्योंकि तूने अपने बंदों से इसका वादा किया है, और तू कभी अपने वादे के विपरीत नहीं करता। तेरा वादा सत्य है, तेरा फ़ैसला न्यायपूर्ण है, और तू जो कहता है उसे पूरा करके ही रहता है।"

यह दुआ उन लोगों की ज़ुबान से निकलती है जो अक़्ल और दिल दोनों से क़यामत के दिन पर यक़ीन रखते हैं, और इस यक़ीन की बिना पर वे अपने रब से सच्चाई पर साबित-क़दम रहने की ताक़त माँगते हैं। वे जानते हैं कि यह दिन उनके लिए इनाम और उनके दुश्मनों के लिए सज़ा का दिन होगा, इसलिए वे इस दिन की पुष्टि करते हुए अपने ईमान का इज़हार करते हैं।

फ़ायदे:

  • इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि क़यामत का दिन एक हक़ीक़त है जिस पर ईमान लाना हर मुसलमान का फ़र्ज़ है। यह यक़ीन इंसान को नेक कामों की तरफ़ राग़िब करता है और गुनाहों से दूर रखता है।
  • अल्लाह का वादा कभी नहीं टूटता—यह बात मोमिन के दिल में अल्लाह पर भरोसा और उम्मीद पैदा करती है कि चाहे दुनिया में कितनी भी मुश्किलें हों, अल्लाह का इनाम और उसकी मदद ज़रूर आएगी।
  • यह दुआ हमें सिखाती है कि हमें अपने रब से उस चीज़ की गवाही देनी चाहिए जो हमारे दिल में बसी हो, और अपने ईमान को ज़ुबान पर लाना चाहिए—यह ईमान की मज़बूती की निशानी है।
  • यह आयत हमें याद दिलाती है कि इस दुनिया की ज़िंदगी आख़िरी नहीं है, बल्कि एक बड़ा दिन आने वाला है जब हर इंसान को उसके अमल का बदला मिलेगा। यह सोच इंसान को ज़िम्मेदार बनाती है और उसे अच्छे कामों की तरफ़ प्रेरित करती है।
🎧 सुनें

📜 आयत 7-11 — आल-इमरान

7هُوَ الَّذِي أَنزَلَ عَلَيْكَ الْكِتَابَ مِنْهُ آيَاتٌ مُّحْكَمَاتٌ هُنَّ أُمُّ الْكِتَابِ وَأُخَرُ مُتَشَابِهَاتٌ ۖ فَأَمَّا الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِمْ زَيْغٌ فَيَتَّبِعُونَ مَا تَشَابَهَ مِنْهُ ابْتِغَاءَ الْفِتْنَةِ وَابْتِغَاءَ تَأْوِيلِهِ ۗ وَمَا يَعْلَمُ تَأْوِيلَهُ إِلَّا اللَّهُ ۗ وَالرَّاسِخُونَ فِي الْعِلْمِ يَقُولُونَ آمَنَّا بِهِ كُلٌّ مِّنْ عِندِ رَبِّنَا ۗ وَمَا يَذَّكَّرُ إِلَّا أُولُو الْأَلْبَابِ
वही (हर चीज़ पर) ग़ालिब और दाना है (ए रसूल) वही (वह ख़ुदा) है जिसने तुमपर किताब नाज़िल की उसमें की बाज़ आयतें तो मोहकम (बहुत सरीह) हैं वही (अमल करने के लिए) असल (व बुनियाद) किताब है और कुछ (आयतें) मुतशाबेह (मिलती जुलती) (गोल गोल जिसके मायने में से पहलू निकल सकते हैं) पस जिन लोगों के दिलों में कज़ी है वह उन्हीं आयतों के पीछे पड़े रहते हैं जो मुतशाबेह हैं ताकि फ़साद बरपा करें और इस ख्याल से कि उन्हें मतलब पर ढाले लें हालाँकि ख़ुदा और उन लोगों के सिवा जो इल्म से बड़े पाए पर फ़ायज़ हैं उनका असली मतलब कोई नहीं जानता वह लोग (ये भी) कहते हैं कि हम उस पर ईमान लाए (यह) सब (मोहकम हो या मुतशाबेह) हमारे परवरदिगार की तरफ़ से है और अक्ल वाले ही समझते हैं
8رَبَّنَا لَا تُزِغْ قُلُوبَنَا بَعْدَ إِذْ هَدَيْتَنَا وَهَبْ لَنَا مِن لَّدُنكَ رَحْمَةً ۚ إِنَّكَ أَنتَ الْوَهَّابُ
(और दुआ करते हैं) ऐ हमारे पालने वाले हमारे दिल को हिदायत करने के बाद डॉवाडोल न कर और अपनी बारगाह से हमें रहमत अता फ़रमा इसमें तो शक ही नहीं कि तू बड़ा देने वाला है
9رَبَّنَا إِنَّكَ جَامِعُ النَّاسِ لِيَوْمٍ لَّا رَيْبَ فِيهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يُخْلِفُ الْمِيعَادَ
ऐ हमारे परवरदिगार बेशक तू एक न एक दिन जिसके आने में शुबह नहीं लोगों को इक्ट्ठा करेगा (तो हम पर नज़रे इनायत रहे) बेशक ख़ुदा अपने वायदे के ख़िलाफ़ नहीं करता
10إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا لَن تُغْنِيَ عَنْهُمْ أَمْوَالُهُمْ وَلَا أَوْلَادُهُم مِّنَ اللَّهِ شَيْئًا ۖ وَأُولَٰئِكَ هُمْ وَقُودُ النَّارِ
बेशक जिन लोगों ने कुफ्र किया इख्तेयार किया उनको ख़ुदा (के अज़ाब) से न उनके माल ही कुछ बचाएंगे, न उनकी औलाद (कुछ काम आएगी) और यही लोग जहन्नुम के ईधन होंगे
11كَدَأْبِ آلِ فِرْعَوْنَ وَالَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا فَأَخَذَهُمُ اللَّهُ بِذُنُوبِهِمْ ۗ وَاللَّهُ شَدِيدُ الْعِقَابِ
(उनकी भी) क़ौमे फ़िरऔन और उनसे पहले वालों की सी हालत है कि उन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया तो खुदा ने उन्हें उनके गुनाहों की पादाश (सज़ा) में ले डाला और ख़ुदा सख्त सज़ा देने वाला है
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अनुवाद — आल-इमरान 9

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Tuesday, August 18, 2026

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