अल-अहज़ाब · 22/73
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-अहज़ाब
وَلَمَّا رَأَى الْمُؤْمِنُونَ الْأَحْزَابَ قَالُوا هَٰذَا مَا وَعَدَنَا اللَّهُ وَرَسُولُهُ وَصَدَقَ اللَّهُ وَرَسُولُهُ ۚ وَمَا زَادَهُمْ إِلَّا إِيمَانًا وَتَسْلِيمًا ۝٢٢
Wa lammaa ra al mu`minoonal Ahzaaba qaaloo haaza maa wa`adanal laahu wa Rasooluh; wa maa zaadahum illaaa eemaananw wa tasleemaa
📖 हिंदी अर्थ
और जब सच्चे ईमानदारों ने (कुफ्फार के) जमघटों को देखा तो (बेतकल्लुफ़) कहने लगे कि ये वही चीज़ तो है जिसका हम से खुदा ने और उसके रसूल ने वायदा किया था (इसकी परवाह क्या है) और खुदा ने और उसके रसूल ने बिल्कुल ठीक कहा था और (इसके देखने से) उनका ईमानदार और उनकी इताअत और भी ज़िन्दा हो गयी

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • الأَحْزَاب (अहज़ाब): विभिन्न जनजातियों और समूहों का गठबंधन जो मदीना पर आक्रमण करने के लिए एकत्र हुए थे।
  • تَسْلِيمًا (तस्लीमन): पूर्ण आत्मसमर्पण, अल्लाह के आदेश के आगे सिर झुकाना और उसके फैसले पर संतुष्ट रहना।

तफ़सीर:

जब ईमानवालों ने अहज़ाब (विभिन्न कबीलों के संयुक्त गठबंधन) को देखा जो मदीना को घेरे हुए थे और उनके चारों ओर एकत्र हो गए थे, तो उन्होंने घबराहट और भय के बजाय वही बात कही जो अल्लाह और उसके रसूल ने उन्हें पहले से बता दी थी। उन्होंने कहा: "यह वही है जिसका अल्लाह और उसके रसूल ने हमसे वादा किया था।" उन्हें याद आया कि अल्लाह ने अपनी किताब में और उसके रसूल ﷺ ने अपनी बातों में पहले ही बता दिया था कि ईमानवालों को परीक्षाओं, कठिनाइयों और संघर्षों का सामना करना पड़ेगा, और इसके बाद ही विजय और सफलता मिलेगी। यह परीक्षा उनके ईमान की सच्चाई को प्रकट करने का ज़रिया थी।

फिर उन्होंने कहा: "और अल्लाह और उसके रसूल ने सच कहा।" यानी जो वादा किया गया था, वह पूरा हुआ। यह दृश्य देखकर उनके ईमान में कोई कमी नहीं आई, बल्कि उनका ईमान और अधिक मज़बूत हुआ और अल्लाह के प्रति उनकी समर्पण भावना और बढ़ गई। उन्होंने अल्लाह के फैसले पर पूर्ण संतुष्टि का प्रदर्शन किया और उसके आदेश के आगे सिर झुका दिया।

यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चे ईमानवालों की पहचान यह है कि वे कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अल्लाह पर भरोसा रखते हैं और उसके वादे को सच मानते हैं। मुसीबतें और परीक्षाएं उन्हें कमज़ोर नहीं करतीं, बल्कि उनके ईमान को और मज़बूत करती हैं। यही वह दृढ़ विश्वास है जो मुसलमान को हर हाल में सब्र और शुक्र पर क़ायम रखता है।

प्यारे भाइयों और बहनों! जब भी जीवन में कठिनाइयाँ आएं, तो याद रखें कि अल्लाह का वादा सच्चा है। हर परीक्षा के बाद आसानी है, हर मुसीबत के बाद राहत है। ईमानवालों के लिए हर हालत में भलाई है - जब वे सुख में हों तो शुक्र करें और जब दुख में हों तो सब्र करें। यही वह रास्ता है जो हमें अल्लाह की रहमत और उसकी मदद तक पहुँचाता है।



📜 आयत 20-24 — सूरा अल-अहज़ाब

20يَحْسَبُونَ الْأَحْزَابَ لَمْ يَذْهَبُوا ۖ وَإِن يَأْتِ الْأَحْزَابُ يَوَدُّوا لَوْ أَنَّهُم بَادُونَ فِي الْأَعْرَابِ يَسْأَلُونَ عَنْ أَنبَائِكُمْ ۖ وَلَوْ كَانُوا فِيكُم مَّا قَاتَلُوا إِلَّا قَلِيلًا
(मदीने का मुहासेरा करने वाले चल भी दिए मगर) ये लोग अभी यही समझ रहे हैं कि (काफ़िरों के) लश्कर अभी नहीं गए और अगर कहीं (कुफ्फार का) लश्कर फिर आ पहुँचे तो ये लोग चाहेंगे कि काश वह जंगलों में गँवारों में जा बसते और (वहीं से बैठे बैठे) तुम्हारे हालात दरयाफ्त करते रहते और अगर उनको तुम लोगों में रहना पड़ता तो फ़क़त (पीछा छुड़ाने को) ज़रा ज़हूर (कहीं) लड़ते
21لَّقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِّمَن كَانَ يَرْجُو اللَّهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ وَذَكَرَ اللَّهَ كَثِيرًا
(मुसलमानों) तुम्हारे वास्ते तो खुद रसूल अल्लाह का (ख़न्दक़ में बैठना) एक अच्छा नमूना था (मगर हाँ यह) उस शख्स के वास्ते है जो खुदा और रोजे आखेरत की उम्मीद रखता हो और खुदा की याद बाकसरत करता हो
22وَلَمَّا رَأَى الْمُؤْمِنُونَ الْأَحْزَابَ قَالُوا هَٰذَا مَا وَعَدَنَا اللَّهُ وَرَسُولُهُ وَصَدَقَ اللَّهُ وَرَسُولُهُ ۚ وَمَا زَادَهُمْ إِلَّا إِيمَانًا وَتَسْلِيمًا
और जब सच्चे ईमानदारों ने (कुफ्फार के) जमघटों को देखा तो (बेतकल्लुफ़) कहने लगे कि ये वही चीज़ तो है जिसका हम से खुदा ने और उसके रसूल ने वायदा किया था (इसकी परवाह क्या है) और खुदा ने और उसके रसूल ने बिल्कुल ठीक कहा था और (इसके देखने से) उनका ईमानदार और उनकी इताअत और भी ज़िन्दा हो गयी
23مِّنَ الْمُؤْمِنِينَ رِجَالٌ صَدَقُوا مَا عَاهَدُوا اللَّهَ عَلَيْهِ ۖ فَمِنْهُم مَّن قَضَىٰ نَحْبَهُ وَمِنْهُم مَّن يَنتَظِرُ ۖ وَمَا بَدَّلُوا تَبْدِيلًا
ईमानदारों में से कुछ लोग ऐसे भी हैं कि खुदा से उन्होंने (जॉनिसारी का) जो एहद किया था उसे पूरा कर दिखाया ग़रज़ उनमें से बाज़ वह हैं जो (मर कर) अपना वक्त पूरा कर गए और उनमें से बाज़ (हुक्मे खुदा के) मुन्तज़िर बैठे हैं और उन लोगों ने (अपनी बात) ज़रा भी नहीं बदली
24لِّيَجْزِيَ اللَّهُ الصَّادِقِينَ بِصِدْقِهِمْ وَيُعَذِّبَ الْمُنَافِقِينَ إِن شَاءَ أَوْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ كَانَ غَفُورًا رَّحِيمًا
ये इम्तेहान इसलिए था ताकि खुद सच्चे (ईमानदारों) को उनकी सच्चाई की जज़ाए ख़ैर दे और अगर चाहे तो मुनाफेक़ीन की सज़ा करे या (अगर वह लागे तौबा करें तो) खुदा उनकी तौबा कुबूल फरमाए इसमें शक नहीं कि खुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
अल-अहज़ाबकुरान सूची
73आयत
मदनीअवतरण स्थान
22आयत

अनुवाद — अल-अहज़ाब 22

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Wednesday, September 30, 2026

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