अल-अहज़ाब · 56/73
अनुवाद उच्चारण — अल-अहज़ाब
إِنَّ اللَّهَ وَمَلَائِكَتَهُ يُصَلُّونَ عَلَى النَّبِيِّ ۚ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا صَلُّوا عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا تَسْلِيمًا ۝٥٦
Innal laaha wa malaaa`i katahoo yusalloona `alan Nabiyy; yaaa aiyuhal lazeena aamanoo salloo `alaihi wa sallimoo tasleemaa
📖 हिंदी अर्थ
इसमें भी शक नहीं कि खुदा और उसके फरिश्ते पैग़म्बर (और उनकी आल) पर दुरूद भेजते हैं तो ऐ ईमानदारों तुम भी दुरूद भेजते रहो और बराबर सलाम करते रहो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يُصَلُّونَ عَلَى النَّبِيِّ: अल्लाह की ओर से नबी पर रहमत भेजना और उनकी प्रशंसा करना, तथा फ़रिश्तों की ओर से उनके लिए दुआ और इस्तिग़फ़ार करना।
  • صَلُّوا عَلَيْهِ: उन पर दुरूद भेजो, यानी उनकी प्रशंसा करो और उनके लिए दुआ करो।
  • وَسَلِّمُوا تَسْلِيمًا: उन्हें सम्मान और आदर के साथ सलाम करो।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला अपने प्यारे नबी ﷺ की अज़ीमुश्शान शान बयान करते हुए फ़रमाता है कि अल्लाह स्वयं अपने नबी ﷺ पर रहमत भेजता है और उनकी प्रशंसा करता है, और उसके मुक़र्रब फ़रिश्ते भी उनके लिए दुआएं करते हैं और उनकी तारीफ़ करते हैं। यह नबी ﷺ का वह मर्तबा है जो किसी और को नसीब नहीं हुआ। फिर अल्लाह तआला ईमानवालों को संबोधित करते हुए फ़रमाता है: "ऐ ईमान लाने वालों! तुम भी अपने नबी ﷺ पर दुरूद भेजो और उन्हें सलाम करो।"

दुरूद भेजने का मतलब है उनकी प्रशंसा करना, उनके लिए दुआ करना और उनके सम्मान को ज़ाहिर करना। सलाम करने का मतलब है उन्हें इस्लामी तरीक़े से सलाम करना, जैसे "अस्सलामु अलैका अय्युहन्नबिय्यु व रहमतुल्लाहि व बरकातुहु" कहना।

नबी ﷺ पर दुरूद भेजने की फ़ज़ीलत बहुत बड़ी है। यह अल्लाह की रहमत का ज़रिया है, गुनाहों की माफ़ी का सबब है, और क़यामत के दिन नबी ﷺ की शफ़ाअत का वसीला है। हदीस में आया है कि जो व्यक्ति एक बार नबी ﷺ पर दुरूद भेजता है, अल्लाह उस पर दस रहमतें नाज़िल करता है।

दुरूद का सबसे अफ़ज़ल तरीक़ा वह है जो नबी ﷺ ने खुद सिखाया: "अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिन व अला आले मुहम्मद, कमा सल्लैता अला आले इब्राहीम, इन्नका हमीदुन मजीद। अल्लाहुम्मा बारिक अला मुहम्मदिन व अला आले मुहम्मद, कमा बारक्ता अला आले इब्राहीम, इन्नका हमीदुन मजीद।"

प्यारे भाइयों! यह आयत हमें सिखाती है कि नबी ﷺ से मुहब्बत का तक़ाज़ा है कि हम उन पर दुरूद और सलाम भेजें। यह हमारे ईमान की निशानी है और हमें नबी ﷺ की उम्मत होने का शरफ़ दिलाती है। आइए, हम अपनी ज़िंदगी में इस अमल को अपनाएं और जितना हो सके नबी ﷺ पर दुरूद और सलाम भेजें, ताकि हमें दुनिया और आख़िरत में कामयाबी हासिल हो।



📜 आयत 54-58 — अल-अहज़ाब

54إِن تُبْدُوا شَيْئًا أَوْ تُخْفُوهُ فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمًا
चाहे किसी चीज़ को तुम ज़ाहिर करो या उसे छिपाओ खुदा तो (बहरहाल) हर चीज़ से यक़ीनी खूब आगाह है
55لَّا جُنَاحَ عَلَيْهِنَّ فِي آبَائِهِنَّ وَلَا أَبْنَائِهِنَّ وَلَا إِخْوَانِهِنَّ وَلَا أَبْنَاءِ إِخْوَانِهِنَّ وَلَا أَبْنَاءِ أَخَوَاتِهِنَّ وَلَا نِسَائِهِنَّ وَلَا مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُنَّ ۗ وَاتَّقِينَ اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدًا
औरतों पर न अपने बाप दादाओं (के सामने होने) में कुछ गुनाह है और न अपने बेटों के और न अपने भाईयों के और न अपने भतीजों के और अपने भांजों के और न अपनी (क़िस्म कि) औरतों के और न अपनी लौंडियों के सामने होने में कुछ गुनाह है (ऐ पैग़म्बर की बीबियों) तुम लोग खुदा से डरती रहो इसमें कोई शक ही नहीं की खुदा (तुम्हारे आमाल में) हर चीज़ से वाक़िफ़ है
56إِنَّ اللَّهَ وَمَلَائِكَتَهُ يُصَلُّونَ عَلَى النَّبِيِّ ۚ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا صَلُّوا عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا تَسْلِيمًا
इसमें भी शक नहीं कि खुदा और उसके फरिश्ते पैग़म्बर (और उनकी आल) पर दुरूद भेजते हैं तो ऐ ईमानदारों तुम भी दुरूद भेजते रहो और बराबर सलाम करते रहो
57إِنَّ الَّذِينَ يُؤْذُونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ لَعَنَهُمُ اللَّهُ فِي الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ وَأَعَدَّ لَهُمْ عَذَابًا مُّهِينًا
बेशक जो लोग खुदा को और उसके रसूल को अज़ीयत देते हैं उन पर खुदा ने दुनिया और आखेरत (दोनों) में लानत की है और उनके लिए रूसवाई का अज़ाब तैयार कर रखा है
58وَالَّذِينَ يُؤْذُونَ الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ بِغَيْرِ مَا اكْتَسَبُوا فَقَدِ احْتَمَلُوا بُهْتَانًا وَإِثْمًا مُّبِينًا
और जो लोग ईमानदार मर्द और ईमानदार औरतों को बगैर कुछ किए द्दरे (तोहमत देकर) अज़ीयत देते हैं तो वह एक बोहतान और सरीह गुनाह का बोझ (अपनी गर्दन पर) उठाते हैं
अल-अहज़ाबकुरान सूची
73आयत
मदनीRevelation
56आयत

अनुवाद — अल-अहज़ाब 56

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Tuesday, August 18, 2026

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