सबा · 16/54
अनुवाद उच्चारण — सबा
فَأَعْرَضُوا فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ سَيْلَ الْعَرِمِ وَبَدَّلْنَاهُم بِجَنَّتَيْهِمْ جَنَّتَيْنِ ذَوَاتَيْ أُكُلٍ خَمْطٍ وَأَثْلٍ وَشَيْءٍ مِّن سِدْرٍ قَلِيلٍ ۝١٦
Fa-a``radoo fa-arsalnaa `alaihim Sailal `Arimi wa baddalnaahum bijannataihim jannataini azwaatai ukulin khamtinw wa aslinw wa shai`im min sidrin qaleel
📖 हिंदी अर्थ
इस पर भी उन लोगों ने मुँह फेर लिया (और पैग़म्बरों का कहा न माना) तो हमने (एक ही बन्द तोड़कर) उन पर बड़े ज़ोरों का सैलाब भेज दिया और (उनको तबाह करके) उनके दोनों बाग़ों के बदले ऐसे दो बाग़ दिए जिनके फल बदमज़ा थे और उनमें झाऊ था और कुछ थोड़ी सी बेरियाँ थी

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • سَيْلَ الْعَرِمِ: वह प्रचंड बाढ़ जो बाँध तोड़कर आई और सब कुछ बहा ले गई।
  • أُكُلٍ خَمْطٍ: कड़वे और बुरे स्वाद वाला फल।
  • أَثْلٍ: एक पेड़ जो झाऊ (Tamarix) के समान होता है, जिसमें कोई फल नहीं होता।
  • سِدْرٍ: बेर का पेड़ (नबक़), जिसके फल मीठे होते हैं।

तफ़सीर:

जब वे लोग अल्लाह की नेमतों से मुँह मोड़कर उसके शुक्र से दूर हो गए और अपने रसूलों को झुठलाने लगे, तो अल्लाह ने उन पर अपना अज़ाब भेजा। उनके बाँध (आरिम) पर एक ऐसा जबरदस्त सैलाब आया जिसने उनके बाँध को तोड़ दिया और उनके खूबसूरत बाग़ों को तबाह कर दिया। यह वही बाग़ थे जो उनके लिए अल्लाह की ओर से एक विशेष इनाम थे, लेकिन उन्होंने नेमतों की क़द्र नहीं की और नाशुक्री की।

फिर अल्लाह ने उनके उन हरे-भरे और फलदार बाग़ों की जगह उन्हें दो ऐसे बाग़ दिए जिनमें कड़वे फल वाले पेड़ थे, और झाऊ के पेड़ जिनमें कोई फल नहीं होता, और बहुत थोड़े से बेर के पेड़ जिनमें काँटे भी बहुत थे। यानी उनकी नेमतें अज़ाब में बदल गईं और उनकी खुशहाली बर्बादी में।

यह सब कुछ उनके कुफ़्र और नाशुक्री का नतीजा था। अल्लाह अपने बंदों पर बड़ा मेहरबान है, लेकिन जब कोई उसकी नेमतों को ठुकराता है और हद से गुज़र जाता है, तो अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त होती है। यह अज़ाब सिर्फ़ उन्हीं लोगों को दिया जाता है जो कुफ़्र में हद से बढ़ जाएँ और अल्लाह की नेमतों का इनकार करें।

इस क़िस्से में हमारे लिए बड़ी सीख है। अल्लाह की हर नेमत का शुक्र अदा करना चाहिए। जब हम अल्लाह के आभारी बनते हैं, तो वह हमें और नेमतें देता है, और जब हम नाशुक्री करते हैं, तो नेमतें छिन जाती हैं। याद रखिए, अल्लाह का दरवाज़ा हमेशा खुला है — वह चाहता है कि हम उसकी ओर लौटें, उसके शुक्रगुज़ार बनें, और उसकी रहमत के साये में जीवन बिताएँ। जो लोग अल्लाह की ओर लौटते हैं, उनके लिए अल्लाह के पास बेहतरीन बदला है — इस दुनिया में भी और आख़िरत में भी।



📜 आयत 14-18 — सबा

14فَلَمَّا قَضَيْنَا عَلَيْهِ الْمَوْتَ مَا دَلَّهُمْ عَلَىٰ مَوْتِهِ إِلَّا دَابَّةُ الْأَرْضِ تَأْكُلُ مِنسَأَتَهُ ۖ فَلَمَّا خَرَّ تَبَيَّنَتِ الْجِنُّ أَن لَّوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ الْغَيْبَ مَا لَبِثُوا فِي الْعَذَابِ الْمُهِينِ
फिर जब हमने सुलेमान पर मौत का हुक्म जारी किया तो (मर गए) मगर लकड़ी के सहारे खड़े थे और जिन्नात को किसी ने उनके मरने का पता न बताया मगर ज़मीन की दीमक ने कि वह सुलेमान के असा को खा रही थी फिर (जब खोखला होकर टूट गया और) सुलेमान (की लाश) गिरी तो जिन्नात ने जाना कि अगर वह लोग ग़ैब वॉ (ग़ैब के जानने वाले) होते तो (इस) ज़लील करने वाली (काम करने की) मुसीबत में न मुब्तिला रहते
15لَقَدْ كَانَ لِسَبَإٍ فِي مَسْكَنِهِمْ آيَةٌ ۖ جَنَّتَانِ عَن يَمِينٍ وَشِمَالٍ ۖ كُلُوا مِن رِّزْقِ رَبِّكُمْ وَاشْكُرُوا لَهُ ۚ بَلْدَةٌ طَيِّبَةٌ وَرَبٌّ غَفُورٌ
और (क़ौम) सबा के लिए तो यक़ीनन ख़ुद उन्हीं के घरों में (कुदरते खुदा की) एक बड़ी निशानी थी कि उनके शहर के दोनों तरफ दाहिने बाएं (हरे-भरे) बाग़ात थे (और उनको हुक्म था) कि अपने परवरदिगार की दी हुई रोज़ी Âाओ (पियो) और उसका शुक्र अदा करो (दुनिया में) ऐसा पाकीज़ा शहर और (आख़ेरत में) परवरदिगार सा बख्शने वाला
16فَأَعْرَضُوا فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ سَيْلَ الْعَرِمِ وَبَدَّلْنَاهُم بِجَنَّتَيْهِمْ جَنَّتَيْنِ ذَوَاتَيْ أُكُلٍ خَمْطٍ وَأَثْلٍ وَشَيْءٍ مِّن سِدْرٍ قَلِيلٍ
इस पर भी उन लोगों ने मुँह फेर लिया (और पैग़म्बरों का कहा न माना) तो हमने (एक ही बन्द तोड़कर) उन पर बड़े ज़ोरों का सैलाब भेज दिया और (उनको तबाह करके) उनके दोनों बाग़ों के बदले ऐसे दो बाग़ दिए जिनके फल बदमज़ा थे और उनमें झाऊ था और कुछ थोड़ी सी बेरियाँ थी
17ذَٰلِكَ جَزَيْنَاهُم بِمَا كَفَرُوا ۖ وَهَلْ نُجَازِي إِلَّا الْكَفُورَ
ये हमने उनकी नाशुक्री की सज़ा दी और हम तो बड़े नाशुक्रों ही की सज़ा किया करते हैं
18وَجَعَلْنَا بَيْنَهُمْ وَبَيْنَ الْقُرَى الَّتِي بَارَكْنَا فِيهَا قُرًى ظَاهِرَةً وَقَدَّرْنَا فِيهَا السَّيْرَ ۖ سِيرُوا فِيهَا لَيَالِيَ وَأَيَّامًا آمِنِينَ
और हम अहले सबा और (शाम) की उन बस्तियों के दरमियान जिनमें हमने बरकत अता की थी और चन्द बस्तियाँ (सरे राह) आबाद की थी जो बाहम नुमाया थीं और हमने उनमें आमद व रफ्त की राह मुक़र्रर की थी कि उनमें रातों को दिनों को (जब जी चाहे) बेखटके चलो फिरो
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Tuesday, August 18, 2026

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