सबा · 17/54
अनुवाद उच्चारण — सबा
ذَٰلِكَ جَزَيْنَاهُم بِمَا كَفَرُوا ۖ وَهَلْ نُجَازِي إِلَّا الْكَفُورَ ۝١٧
Zaalika jazainaahum bimaa kafaroo wa hal nujaazeee illal kafoor
📖 हिंदी अर्थ
ये हमने उनकी नाशुक्री की सज़ा दी और हम तो बड़े नाशुक्रों ही की सज़ा किया करते हैं
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • ذَٰلِكَ — यह (बदला)
  • جَزَيْنَاهُم — हमने उन्हें बदला दिया
  • بِمَا كَفَرُوا — उनके कुफ़्र (अस्वीकार) के कारण
  • وَهَلْ نُجَازِي — और क्या हम बदला देते हैं
  • إِلَّا الْكَفُورَ — सिवाय उसके जो अत्यधिक कृतघ्न (नाशुक्रा) हो

तफसीर:

यह वह बदला था जो हमने उन्हें उनके कुफ़्र और अहसान-ए-ख़ुदा से मुँह मोड़ने की सज़ा में दिया। उन्होंने अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा नहीं किया, उसके आदेशों को ठुकराया और अपने रसूलों को झुठलाया। नतीजा यह हुआ कि हमने उन पर विनाशकारी बाढ़ भेज दी, जिसने उनके बाँध को तोड़ दिया और उनके बाग़ों को तबाह कर दिया। उनके उन हरे-भरे, फलदार बाग़ों की जगह हमने उन्हें ऐसे बाग़ दिए जिनमें कड़वे फल, बेकार पेड़ (झाऊ) और काँटेदार झाड़ियाँ थीं — यानी उनकी भलाई को बुराई से बदल दिया गया।

यह सब कुछ उनके कुफ़्र और नाशुक्री का नतीजा था। अल्लाह तआला अपने बंदों पर ज़ुल्म नहीं करता, बल्कि लोग ख़ुद अपने कर्मों से अपनी तक़दीर बदल लेते हैं। और अल्लाह तआला ऐसी सख़्त सज़ा केवल उन्हीं को देता है जो कुफ़्र में हद से गुज़र जाएँ, नेमतों का इनकार करें और अल्लाह की निशानियों से मुँह मोड़ें।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की नेमतें उसकी रहमत हैं, और शुक्र अदा करने से नेमतें बरकत पाती हैं, जबकि नाशुक्री और कुफ़्र नेमतों के जाने का सबब बनता है। अल्लाह रहीम और करीम है — वह अपने बंदों पर रहमतें बरसाता है, लेकिन जब बंदा हद से गुज़र जाए और अल्लाह के साथ कुफ़्रान करे, तो अल्लाह की पकड़ बहुत सख़्त होती है। हमें चाहिए कि हर हाल में अल्लाह का शुक्र अदा करें, उसकी नेमतों को पहचानें और उसकी नाफ़रमानी से बचें। अल्लाह का दरवाज़ा तौबा करने वालों के लिए हमेशा खुला है — जो भी अपनी ग़लतियों से तौबा करके अल्लाह की तरफ़ लौटता है, अल्लाह उसे माफ़ कर देता है और उसकी नेमतें लौटा देता है। याद रखें, अल्लाह की रहमत उसके अज़ाब से कहीं ज़्यादा वसी' है, और वह अपने बंदों के तौबा करने का इंतज़ार करता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 15-19 — सबा

15لَقَدْ كَانَ لِسَبَإٍ فِي مَسْكَنِهِمْ آيَةٌ ۖ جَنَّتَانِ عَن يَمِينٍ وَشِمَالٍ ۖ كُلُوا مِن رِّزْقِ رَبِّكُمْ وَاشْكُرُوا لَهُ ۚ بَلْدَةٌ طَيِّبَةٌ وَرَبٌّ غَفُورٌ
और (क़ौम) सबा के लिए तो यक़ीनन ख़ुद उन्हीं के घरों में (कुदरते खुदा की) एक बड़ी निशानी थी कि उनके शहर के दोनों तरफ दाहिने बाएं (हरे-भरे) बाग़ात थे (और उनको हुक्म था) कि अपने परवरदिगार की दी हुई रोज़ी Âाओ (पियो) और उसका शुक्र अदा करो (दुनिया में) ऐसा पाकीज़ा शहर और (आख़ेरत में) परवरदिगार सा बख्शने वाला
16فَأَعْرَضُوا فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ سَيْلَ الْعَرِمِ وَبَدَّلْنَاهُم بِجَنَّتَيْهِمْ جَنَّتَيْنِ ذَوَاتَيْ أُكُلٍ خَمْطٍ وَأَثْلٍ وَشَيْءٍ مِّن سِدْرٍ قَلِيلٍ
इस पर भी उन लोगों ने मुँह फेर लिया (और पैग़म्बरों का कहा न माना) तो हमने (एक ही बन्द तोड़कर) उन पर बड़े ज़ोरों का सैलाब भेज दिया और (उनको तबाह करके) उनके दोनों बाग़ों के बदले ऐसे दो बाग़ दिए जिनके फल बदमज़ा थे और उनमें झाऊ था और कुछ थोड़ी सी बेरियाँ थी
17ذَٰلِكَ جَزَيْنَاهُم بِمَا كَفَرُوا ۖ وَهَلْ نُجَازِي إِلَّا الْكَفُورَ
ये हमने उनकी नाशुक्री की सज़ा दी और हम तो बड़े नाशुक्रों ही की सज़ा किया करते हैं
18وَجَعَلْنَا بَيْنَهُمْ وَبَيْنَ الْقُرَى الَّتِي بَارَكْنَا فِيهَا قُرًى ظَاهِرَةً وَقَدَّرْنَا فِيهَا السَّيْرَ ۖ سِيرُوا فِيهَا لَيَالِيَ وَأَيَّامًا آمِنِينَ
और हम अहले सबा और (शाम) की उन बस्तियों के दरमियान जिनमें हमने बरकत अता की थी और चन्द बस्तियाँ (सरे राह) आबाद की थी जो बाहम नुमाया थीं और हमने उनमें आमद व रफ्त की राह मुक़र्रर की थी कि उनमें रातों को दिनों को (जब जी चाहे) बेखटके चलो फिरो
19فَقَالُوا رَبَّنَا بَاعِدْ بَيْنَ أَسْفَارِنَا وَظَلَمُوا أَنفُسَهُمْ فَجَعَلْنَاهُمْ أَحَادِيثَ وَمَزَّقْنَاهُمْ كُلَّ مُمَزَّقٍ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّكُلِّ صَبَّارٍ شَكُورٍ
तो वह लोग ख़ुद कहने लगे परवरदिगार (क़रीब के सफर में लुत्फ नहीं) तो हमारे सफ़रों में दूरी पैदा कर दे और उन लोगों ने खुद अपने ऊपर ज़ुल्म किया तो हमने भी उनको (तबाह करके उनके) अफसाने बना दिए - और उनकी धज्जियाँ उड़ा के उनको तितिर बितिर कर दिया बेशक उनमें हर सब्र व शुक्र करने वालोंके वास्ते बड़ी इबरते हैं
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Tuesday, August 18, 2026

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