यासीन · 40/83
अनुवाद उच्चारण — यासीन
لَا الشَّمْسُ يَنبَغِي لَهَا أَن تُدْرِكَ الْقَمَرَ وَلَا اللَّيْلُ سَابِقُ النَّهَارِ ۚ وَكُلٌّ فِي فَلَكٍ يَسْبَحُونَ ۝٤٠
Lash shamsu yambaghee lahaaa an tudrikal qamara wa lal lailu saabiqun nahaar; wa kullun fee falaki yasbahoon
📖 हिंदी अर्थ
न तो आफताब ही से ये बन पड़ता है कि वह माहताब को जा ले और न रात ही दिन से आगे बढ़ सकती है (चाँद, सूरज, सितारे) हर एक अपने-अपने आसमान (मदार) में चक्कर लगा रहें हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يَنبَغِي – उचित होना, संभव होना
  • تُدرِكَ – पकड़ लेना, मिल जाना, अपनी चपेट में ले लेना
  • سَابِقُ – आगे निकल जाने वाला, पहले आ जाने वाला
  • فَلَكٍ – कक्षा, वह गोलाकार मार्ग जिस पर ग्रह-तारे चलते हैं
  • يَسبَحُونَ – तैरते हैं, चलते हैं (यहाँ अर्थ: अपनी-अपनी कक्षा में निरंतर गतिशील रहते हैं)

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने इस आयत में अपनी कुदरत के वे नज़ारे दिखाए हैं जो हर पल हमारी आँखों के सामने घटित होते हैं, लेकिन हम उन पर ग़ौर नहीं करते। सूरज, चाँद, रात और दिन — ये सब अल्लाह की बनाई हुई व्यवस्था के अधीन हैं। इनमें से कोई भी अपनी निर्धारित सीमा से आगे नहीं बढ़ सकता।

सूरज के लिए यह कभी संभव नहीं कि वह चाँद को जा पकड़े, उससे जा मिले या उसके प्रकाश को मिटा दे। दोनों की कक्षाएँ अलग-अलग हैं, उनके रास्ते अलग-अलग हैं, और उनकी गति की गति भी अलग-अलग है। सूरज अपनी कक्षा में साल भर में अपना चक्कर पूरा करता है, जबकि चाँद महीने भर में। इसी तरह रात दिन से आगे निकलकर उसके समय से पहले नहीं आ सकती, और न ही दिन रात से पहले आ सकता है। दोनों एक निश्चित हिसाब से एक-दूसरे की जगह लेते हैं। जब रात आती है तो दिन जाता है, और जब दिन आता है तो रात जाती है — बिल्कुल सटीक समय पर, बिना किसी देरी या जल्दबाज़ी के।

और यह सब कुछ — सूरज, चाँद, तारे, ग्रह, आकाशगंगाएँ — सभी अपनी-अपनी कक्षा में तैर रहे हैं। जिस तरह एक तैराक पानी में तैरता है, उसी तरह ये सारे खगोलीय पिंड अपनी-अपनी कक्षाओं में निरंतर गतिशील हैं। यह गति इतनी नियमित और सटीक है कि अरबों-खरबों वर्षों से इसमें कोई फ़र्क नहीं आया।


दावती पहलू:

इस आयत पर ग़ौर करने वाले के लिए यह स्पष्ट हो जाता है कि यह ब्रह्मांड अपने आप नहीं चल रहा। इसे चलाने वाला एक महान शक्तिशाली प्रशासक है, जिसने हर चीज़ के लिए एक माप निर्धारित कर रखा है। जिस अल्लाह ने सूरज और चाँद को इतनी सटीकता से चलाया, क्या वह इंसानों के मामलों का प्रबंधन नहीं कर सकता? जिसने रात और दिन के आने-जाने का नियम बनाया, क्या वह हमारे जीवन के हर पहलू का हिसाब नहीं लेगा?

यह आयत हमें सिखाती है कि जिस तरह ये सारे खगोलीय पिंड अपनी-अपनी कक्षा में चलते हैं और अपनी सीमा से आगे नहीं बढ़ते, उसी तरह हम इंसानों को भी अल्लाह द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर रहना चाहिए। जब सूरज जैसा विशाल पिंड अपनी जगह से नहीं हटता, तो हमें भी अपने रब के हुक्मों का पालन करते हुए अपनी ज़िंदगी गुज़ारनी चाहिए। यह नियमितता और अनुशासन हमें सिखाता है कि अल्लाह की हर चीज़ में एक व्यवस्था है, और यह व्यवस्था हमें उसकी ओर बुलाती है।

जो व्यक्ति इन नज़ारों पर ग़ौर करता है, उसका ईमान मज़बूत होता है और उसका दिल अल्लाह की महानता के सामने झुक जाता है। यही तो वह चीज़ है जो इंसान को इस कायनात के मालिक की तरफ़ खींचती है — कि वह उसे पहचाने, उसकी इबादत करे और उसके बताए हुए रास्ते पर चले।

🎧 सुनें

📜 आयत 38-42 — यासीन

38وَالشَّمْسُ تَجْرِي لِمُسْتَقَرٍّ لَّهَا ۚ ذَٰلِكَ تَقْدِيرُ الْعَزِيزِ الْعَلِيمِ
और (एक निशानी) आफताब है जो अपने एक ठिकाने पर चल रहा है ये (सबसे) ग़ालिब वाक़िफ (खुदा) का (बाँद्दा हुआ) अन्दाज़ा है
39وَالْقَمَرَ قَدَّرْنَاهُ مَنَازِلَ حَتَّىٰ عَادَ كَالْعُرْجُونِ الْقَدِيمِ
और हमने चाँद के लिए मंज़िलें मुक़र्रर कर दीं हैं यहाँ तक कि हिर फिर के (आख़िर माह में) खजूर की पुरानी टहनी का सा (पतला टेढ़ा) हो जाता है
40لَا الشَّمْسُ يَنبَغِي لَهَا أَن تُدْرِكَ الْقَمَرَ وَلَا اللَّيْلُ سَابِقُ النَّهَارِ ۚ وَكُلٌّ فِي فَلَكٍ يَسْبَحُونَ
न तो आफताब ही से ये बन पड़ता है कि वह माहताब को जा ले और न रात ही दिन से आगे बढ़ सकती है (चाँद, सूरज, सितारे) हर एक अपने-अपने आसमान (मदार) में चक्कर लगा रहें हैं
41وَآيَةٌ لَّهُمْ أَنَّا حَمَلْنَا ذُرِّيَّتَهُمْ فِي الْفُلْكِ الْمَشْحُونِ
और उनके लिए (मेरी कुदरत) की एक निशानी ये है कि उनके बुर्ज़ुगों को (नूह की) भरी हुई कश्ती में सवार किया
42وَخَلَقْنَا لَهُم مِّن مِّثْلِهِ مَا يَرْكَبُونَ
और उस कशती के मिसल उन लोगों के वास्ते भी वह चीज़े (कशतियाँ) जहाज़ पैदा कर दी
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अनुवाद — यासीन 40

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Tuesday, August 18, 2026

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