अन-निसा · 107/176
अनुवाद उच्चारण — सूरा अन-निसा
وَلَا تُجَادِلْ عَنِ الَّذِينَ يَخْتَانُونَ أَنفُسَهُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ مَن كَانَ خَوَّانًا أَثِيمًا ۝١٠٧
Wa laa tujaadil `anil lazeena yakhtaanoona anfusahum; innal laaha laa yuhibbuman kaana khawwaanan aseemaa
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) तुम (उन बदमाशों) की तरफ़ होकर (लोगों से) न लड़ो जो अपने ही (लोगों) से दग़ाबाज़ी करते हैं बेशक ख़ुदा ऐसे शख्स को दोस्त नहीं रखता जो दग़ाबाज़ गुनाहगार हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَخْتَانُونَ: धोखा देना, ख़ियानत करना।
  • أَنفُسَهُمْ: स्वयं अपनी आत्माओं को।
  • خَوَّانًا: बहुत अधिक ख़ियानत करने वाला।
  • أَثِيمًا: बहुत अधिक पाप करने वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों के बारे में है जो ख़ुद को धोखा देते हैं—यानी जो गुनाह और ख़ियानत के रास्ते पर चलकर अपनी ही आत्माओं को नुक़सान पहुँचाते हैं। अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को निर्देश दे रहा है कि ऐसे लोगों की ओर से झगड़ा न करें, उनके बचाव में दलीलें न दें, और न ही उनके लिए कोई वकालत करें। क्योंकि ये लोग जान-बूझकर ख़ियानत करते हैं और अपने कर्मों से अल्लाह की नाराज़गी मोल लेते हैं।

अल्लाह तआला स्पष्ट करता है कि वह उन लोगों से प्रेम नहीं करता जो ख़ियानत में डूबे हों और लगातार पापों में मशगूल रहते हों। यह एक गंभीर चेतावनी है कि ख़ियानत और पाप का रास्ता अल्लाह की मुहब्बत से दूर कर देता है। जो व्यक्ति इस हद तक गिर जाए कि उसकी पहचान ही ख़ियानत और गुनाह बन जाए, वह अल्लाह की रहमत से महरूम हो जाता है।

इस आयत में एक बड़ी शिक्षा है कि मुसलमान को चाहिए कि वह सच्चाई और इंसाफ़ पर क़ायम रहे। किसी की मदद करना अच्छा है, लेकिन अगर कोई व्यक्ति ख़ुद गुनाहगार हो और अपनी ख़ियानत छिपाने की कोशिश कर रहा हो, तो उसके बचाव में झूठी वकालत करना अल्लाह की नज़र में बहुत बुरा काम है। यह सिर्फ़ उस व्यक्ति को और गुनाह में धकेलता है और उसे अल्लाह की पनाह से दूर करता है।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि ईमानदारी और सच्चाई ही वह रास्ता है जो अल्लाह की मुहब्बत और उसकी रहमत तक पहुँचाता है। जो लोग ख़ियानत और धोखे से बचते हैं, अल्लाह उन्हें इज़्ज़त देता है और उनके दिलों को सुकून से भर देता है। हमें चाहिए कि हम अपनी ज़िंदगी में सच्चाई को अपनाएँ, किसी की हक़ तलफ़ी न करें, और न ही किसी गुनाहगार की मदद उसके गुनाह में करें। अल्लाह उन लोगों से मुहब्बत करता है जो सच्चे, ईमानदार और नेक हों। याद रखें, अल्लाह की मुहब्बत सबसे बड़ी नेमत है, और वह उन्हीं को मिलती है जो पापों से बचते हैं और तौबा करके सीधे रास्ते पर चलते हैं।



📜 आयत 105-109 — सूरा अन-निसा

105إِنَّا أَنزَلْنَا إِلَيْكَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ لِتَحْكُمَ بَيْنَ النَّاسِ بِمَا أَرَاكَ اللَّهُ ۚ وَلَا تَكُن لِّلْخَائِنِينَ خَصِيمًا
(ऐ रसूल) हमने तुमपर बरहक़ किताब इसलिए नाज़िल की है कि ख़ुदा ने तुम्हारी हिदायत की है उसी तरह लोगों के दरमियान फ़ैसला करो और ख्यानत करने वालों के तरफ़दार न बनो
106وَاسْتَغْفِرِ اللَّهَ ۖ إِنَّ اللَّهَ كَانَ غَفُورًا رَّحِيمًا
और (अपनी उम्मत के लिये) ख़ुदा से मग़फ़िरत की दुआ मॉगों बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
107وَلَا تُجَادِلْ عَنِ الَّذِينَ يَخْتَانُونَ أَنفُسَهُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ مَن كَانَ خَوَّانًا أَثِيمًا
और (ऐ रसूल) तुम (उन बदमाशों) की तरफ़ होकर (लोगों से) न लड़ो जो अपने ही (लोगों) से दग़ाबाज़ी करते हैं बेशक ख़ुदा ऐसे शख्स को दोस्त नहीं रखता जो दग़ाबाज़ गुनाहगार हो
108يَسْتَخْفُونَ مِنَ النَّاسِ وَلَا يَسْتَخْفُونَ مِنَ اللَّهِ وَهُوَ مَعَهُمْ إِذْ يُبَيِّتُونَ مَا لَا يَرْضَىٰ مِنَ الْقَوْلِ ۚ وَكَانَ اللَّهُ بِمَا يَعْمَلُونَ مُحِيطًا
लोगों से तो अपनी शरारत छुपाते हैं और (ख़ुदा से नहीं छुपा सकते) हालॉकि वह तो उस वक्त भी उनके साथ साथ है जब वह लोग रातों को (बैठकर) उन बातों के मशवरे करते हैं जिनसे ख़ुदा राज़ी नहीं और ख़ुदा तो उनकी सब करतूतों को (इल्म के अहाते में) घेरे हुए है
109هَا أَنتُمْ هَٰؤُلَاءِ جَادَلْتُمْ عَنْهُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا فَمَن يُجَادِلُ اللَّهَ عَنْهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ أَم مَّن يَكُونُ عَلَيْهِمْ وَكِيلًا
(मुसलमानों) ख़बरदार हो जाओ भला दुनिया की (ज़रा सी) ज़िन्दगी में तो तुम उनकी तरफ़ होकर लड़ने खडे हो गए (मगर ये तो बताओ) फिर क़यामत के दिन उनका तरफ़दार बनकर ख़ुदा से कौन लड़ेगा या कौन उनका वकील होगा
अन-निसाकुरान सूची
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107आयत

अनुवाद — अन-निसा 107

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Monday, September 28, 2026

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