अन-निसा · 106/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
وَاسْتَغْفِرِ اللَّهَ ۖ إِنَّ اللَّهَ كَانَ غَفُورًا رَّحِيمًا ۝١٠٦
Wastaghfiril laaha innal laaha kaana Ghafoorar Raheema
📖 हिंदी अर्थ
और (अपनी उम्मत के लिये) ख़ुदा से मग़फ़िरत की दुआ मॉगों बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • وَاسْتَغْفِرِ اللهَ: अल्लाह से क्षमा माँगो।
  • غَفُورًا: बहुत क्षमा करने वाला।
  • رَّحِيمًا: अत्यंत दयालु।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को निर्देश दे रहे हैं कि वे हर हालत में अल्लाह से क्षमा माँगते रहें। यह आदेश उस घटना के संदर्भ में है जब नबी ﷺ ने एक यहूदी व्यक्ति के मामले में कुछ इरादा किया था, जिसके बाद अल्लाह ने आपको सच्चाई से अवगत कराया। अल्लाह आपको सिखा रहे हैं कि किसी भी मामले में जल्दबाज़ी न करें और अपने फ़ैसलों में अल्लाह से क्षमा और मार्गदर्शन माँगते रहें। यह आदेश नबी ﷺ के लिए है, और उनकी उम्मत के लिए भी एक शिक्षा है कि हर मुसलमान को चाहिए कि वह अपनी कमियों और गलतियों पर अल्लाह से क्षमा माँगे। अल्लाह तआला अपने बंदों के लिए बहुत क्षमा करने वाला और अत्यंत दयालु है, वह उन लोगों की क्षमा की प्रार्थना स्वीकार करता है जो सच्चे दिल से उसकी ओर रुजू करते हैं और उससे माफ़ी माँगते हैं। यह आयत इस बात की तरफ़ इशारा करती है कि अल्लाह की रहमत और क्षमा असीम है, और वह अपने बंदों की भूलों को माफ़ करने के लिए हमेशा तैयार है।

फ़ायदे (लाभ):

  1. अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को भी क्षमा माँगने का निर्देश दे रहे हैं, ताकि उम्मत के लिए यह एक आदर्श हो कि इस्तिग़फ़ार (क्षमा माँगना) कितनी बड़ी नेमत है। यह हमें सिखाता है कि इंसान चाहे कितना भी अच्छा हो, उसे अल्लाह से क्षमा माँगते रहना चाहिए।
  2. यह आयत हमें यह विश्वास दिलाती है कि अल्लाह की क्षमा और दया असीम है। चाहे हमसे कितनी भी गलतियाँ हुई हों, अगर हम सच्चे दिल से तौबा करें और क्षमा माँगें, तो अल्लाह हमें माफ़ कर देगा।
  3. इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि किसी भी मामले में जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए, बल्कि अल्लाह से मार्गदर्शन और क्षमा माँगनी चाहिए, क्योंकि इंसान की समझ सीमित है और अल्लाह का ज्ञान असीम है।
  4. यह आयत मुसलमानों को यह प्रेरणा देती है कि वे अपने जीवन के हर पल में अल्लाह से जुड़े रहें और उसकी रहमत और क्षमा की उम्मीद रखें, क्योंकि अल्लाह अपने बंदों के साथ बहुत दयालु और क्षमाशील है।


📜 आयत 104-108 — अन-निसा

104وَلَا تَهِنُوا فِي ابْتِغَاءِ الْقَوْمِ ۖ إِن تَكُونُوا تَأْلَمُونَ فَإِنَّهُمْ يَأْلَمُونَ كَمَا تَأْلَمُونَ ۖ وَتَرْجُونَ مِنَ اللَّهِ مَا لَا يَرْجُونَ ۗ وَكَانَ اللَّهُ عَلِيمًا حَكِيمًا
और (मुसलमानों) दुशमनों के पीछा करने में सुस्ती न करो अगर लड़ाई में तुमको तकलीफ़ पहुंचती है तो जैसी तुमको तकलीफ़ पहुंचती है उनको भी वैसी ही अज़ीयत होती है और (तुमको) ये भी (उम्मीद है कि) तुम ख़ुदा से वह वह उम्मीदें रखते हो जो (उनको) नसीब नहीं और ख़ुदा तो सबसे वाक़िफ़ (और) हिकमत वाला है
105إِنَّا أَنزَلْنَا إِلَيْكَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ لِتَحْكُمَ بَيْنَ النَّاسِ بِمَا أَرَاكَ اللَّهُ ۚ وَلَا تَكُن لِّلْخَائِنِينَ خَصِيمًا
(ऐ रसूल) हमने तुमपर बरहक़ किताब इसलिए नाज़िल की है कि ख़ुदा ने तुम्हारी हिदायत की है उसी तरह लोगों के दरमियान फ़ैसला करो और ख्यानत करने वालों के तरफ़दार न बनो
106وَاسْتَغْفِرِ اللَّهَ ۖ إِنَّ اللَّهَ كَانَ غَفُورًا رَّحِيمًا
और (अपनी उम्मत के लिये) ख़ुदा से मग़फ़िरत की दुआ मॉगों बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
107وَلَا تُجَادِلْ عَنِ الَّذِينَ يَخْتَانُونَ أَنفُسَهُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ مَن كَانَ خَوَّانًا أَثِيمًا
और (ऐ रसूल) तुम (उन बदमाशों) की तरफ़ होकर (लोगों से) न लड़ो जो अपने ही (लोगों) से दग़ाबाज़ी करते हैं बेशक ख़ुदा ऐसे शख्स को दोस्त नहीं रखता जो दग़ाबाज़ गुनाहगार हो
108يَسْتَخْفُونَ مِنَ النَّاسِ وَلَا يَسْتَخْفُونَ مِنَ اللَّهِ وَهُوَ مَعَهُمْ إِذْ يُبَيِّتُونَ مَا لَا يَرْضَىٰ مِنَ الْقَوْلِ ۚ وَكَانَ اللَّهُ بِمَا يَعْمَلُونَ مُحِيطًا
लोगों से तो अपनी शरारत छुपाते हैं और (ख़ुदा से नहीं छुपा सकते) हालॉकि वह तो उस वक्त भी उनके साथ साथ है जब वह लोग रातों को (बैठकर) उन बातों के मशवरे करते हैं जिनसे ख़ुदा राज़ी नहीं और ख़ुदा तो उनकी सब करतूतों को (इल्म के अहाते में) घेरे हुए है
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अनुवाद — अन-निसा 106

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Tuesday, August 18, 2026

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