अन-निसा · 125/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
وَمَنْ أَحْسَنُ دِينًا مِّمَّنْ أَسْلَمَ وَجْهَهُ لِلَّهِ وَهُوَ مُحْسِنٌ وَاتَّبَعَ مِلَّةَ إِبْرَاهِيمَ حَنِيفًا ۗ وَاتَّخَذَ اللَّهُ إِبْرَاهِيمَ خَلِيلًا ۝١٢٥
Wa man ahsanu deenam mimmman aslama wajhahoo lillaahi wa huwa muhsinunw wattaba`a Millata Ibraaheema haneefaa; wattakhazal laahu Ibraaheema khaleelaa
📖 हिंदी अर्थ
और उस शख्स से दीन में बेहतर कौन होगा जिसने ख़ुदा के सामने अपना सरे तसलीम झुका दिया और नेको कार भी है और इबराहीम के तरीके पर चलता है जो बातिल से कतरा कर चलते थे और ख़ुदा ने इब्राहिम को तो अपना ख़लिस दोस्त बना लिया

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَسْلَمَ وَجْهَهُ لِلَّهِ: अपने आप को पूरी तरह अल्लाह के हवाले कर दिया, अपनी नीयत और इरादे को अल्लाह के लिए खालिस कर लिया।
  • مُحْسِنٌ: अच्छे कर्म करने वाला, एकेश्वरवादी (मुवह्हिद), जो अपने अमल को अल्लाह की रज़ा के लिए खूबसूरती से अंजाम दे।
  • حَنِيفًا: हर बातिल (झूठे) धर्म से हटकर सच्चे ईमान और तौहीद की तरफ झुका हुआ।
  • خَلِيلًا: ऐसा दोस्त जिसकी मुहब्बत में कोई कमी न हो, ख़ास दोस्त, जिसे अल्लाह ने अपनी मुहब्बत के लिए चुन लिया।

तफसीर:

इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि क्या कोई ऐसा इंसान हो सकता है जिसका दीन (धर्म) उस इंसान से बेहतर हो जो अपने आप को पूरी तरह अल्लाह के हवाले कर दे? यानी कोई नहीं। जो शख्स अपने दिल और अपने पूरे जिस्म के साथ अल्लाह की इबादत में झुक जाए, अपनी नीयत को सिर्फ अल्लाह के लिए खालिस कर ले, और साथ ही वह मुहसिन भी हो — यानी अपने अमल को अल्लाह के बताए हुए तरीके पर खूबसूरती से अंजाम दे, अल्लाह की इबादत में किसी को शरीक न करे — और फिर वह हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की मिल्लत (राह) की पैरवी करे, जो हर बातिल और झूठे धर्म से हटकर सिर्फ तौहीद और ईमान की तरफ झुका हुआ था। यही वह रास्ता है जो सबसे अच्छा और सबसे सीधा है।

फिर अल्लाह तआला ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की तारीफ में फ़रमाया कि अल्लाह ने उन्हें अपनी सारी मखलूकात (सृष्टि) में से चुनकर अपना खलील (खास दोस्त) बना लिया। खलील वह दोस्त होता है जिसकी मुहब्बत में कोई कमी या खोट न हो — यानी अल्लाह की मुहब्बत उनके दिल में पूरी तरह भर गई थी और अल्लाह ने भी उन्हें अपनी खास मुहब्बत और क़ुर्बत से नवाज़ा। यह मक़ाम (दर्जा) मुहब्बत की सबसे ऊंची मंज़िल है।

इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चा दीन वही है जो अल्लाह के सामने पूरी तरह सर झुका दे, नीयत को खालिस कर ले, अमल को अच्छा बनाए, और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत (तरीके) की पैरवी करे। यही वह रास्ता है जो इंसान को अल्लाह की मुहब्बत तक पहुंचाता है, और यही वह दीन है जो दुनिया और आखिरत में कामयाबी दिलाता है। अल्लाह तआला अपने बंदों को इसी सच्चे दीन की तरफ बुलाता है, और जो इसे अपना लेता है, वह सबसे अच्छे दीन पर होता है।



📜 आयत 123-127 — अन-निसा

123لَّيْسَ بِأَمَانِيِّكُمْ وَلَا أَمَانِيِّ أَهْلِ الْكِتَابِ ۗ مَن يَعْمَلْ سُوءًا يُجْزَ بِهِ وَلَا يَجِدْ لَهُ مِن دُونِ اللَّهِ وَلِيًّا وَلَا نَصِيرًا
न तुम लोगों की आरज़ू से (कुछ काम चल सकता है) न अहले किताब की तमन्ना से कुछ हासिल हो सकता है बल्कि (जैसा काम वैसा दाम) जो बुरा काम करेगा उसे उसका बदला दिया जाएगा और फिर ख़ुदा के सिवा किसी को न तो अपना सरपरस्त पाएगा और न मददगार
124وَمَن يَعْمَلْ مِنَ الصَّالِحَاتِ مِن ذَكَرٍ أَوْ أُنثَىٰ وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَأُولَٰئِكَ يَدْخُلُونَ الْجَنَّةَ وَلَا يُظْلَمُونَ نَقِيرًا
और जो शख्स अच्छे अच्छे काम करेगा (ख्वाह) मर्द हो या औरत और ईमानदार (भी) हो तो ऐसे लोग बेहिश्त में (बेखटके) जा पहुंचेंगे और उनपर तिल भी ज़ुल्म न किया जाएगा
125وَمَنْ أَحْسَنُ دِينًا مِّمَّنْ أَسْلَمَ وَجْهَهُ لِلَّهِ وَهُوَ مُحْسِنٌ وَاتَّبَعَ مِلَّةَ إِبْرَاهِيمَ حَنِيفًا ۗ وَاتَّخَذَ اللَّهُ إِبْرَاهِيمَ خَلِيلًا
और उस शख्स से दीन में बेहतर कौन होगा जिसने ख़ुदा के सामने अपना सरे तसलीम झुका दिया और नेको कार भी है और इबराहीम के तरीके पर चलता है जो बातिल से कतरा कर चलते थे और ख़ुदा ने इब्राहिम को तो अपना ख़लिस दोस्त बना लिया
126وَلِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۚ وَكَانَ اللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ مُّحِيطًا
और जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (ग़रज़ सब कुछ) ख़ुदा ही का है और ख़ुदा ही सब चीज़ को (अपनी) कुदरत से घेरे हुए है
127وَيَسْتَفْتُونَكَ فِي النِّسَاءِ ۖ قُلِ اللَّهُ يُفْتِيكُمْ فِيهِنَّ وَمَا يُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ فِي الْكِتَابِ فِي يَتَامَى النِّسَاءِ اللَّاتِي لَا تُؤْتُونَهُنَّ مَا كُتِبَ لَهُنَّ وَتَرْغَبُونَ أَن تَنكِحُوهُنَّ وَالْمُسْتَضْعَفِينَ مِنَ الْوِلْدَانِ وَأَن تَقُومُوا لِلْيَتَامَىٰ بِالْقِسْطِ ۚ وَمَا تَفْعَلُوا مِنْ خَيْرٍ فَإِنَّ اللَّهَ كَانَ بِهِ عَلِيمًا
(ऐ रसूल) ये लोग तुमसे (यतीम लड़कियों) से निकाह के बारे में फ़तवा तलब करते हैं तुम उनसे कह दो कि ख़ुदा तुम्हें उनसे (निकाह करने) की इजाज़त देता है और जो हुक्म मनाही का कुरान में तुम्हें (पहले) सुनाया जा चुका है वह हक़ीक़तन उन यतीम लड़कियों के वास्ते था जिन्हें तुम उनका मुअय्यन किया हुआ हक़ नहीं देते और चाहते हो (कि यूं ही) उनसे निकाह कर लो और उन कमज़ोर नातवॉ (कमजोर) बच्चों के बारे में हुक्म फ़रमाता है और (वो) ये है कि तुम यतीमों के हुक़ूक़ के बारे में इन्साफ पर क़ायम रहो और (यक़ीन रखो कि) जो कुछ तुम नेकी करोगे तो ख़ुदा ज़रूर वाक़िफ़कार है
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अनुवाद — अन-निसा 125

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Tuesday, August 18, 2026

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