अन-निसा · 50/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
انظُرْ كَيْفَ يَفْتَرُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ ۖ وَكَفَىٰ بِهِ إِثْمًا مُّبِينًا ۝٥٠
Unzur kaifa yaftaroona `alal laahil kazib, wakafaa biheee ismamm mubeenaa
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) ज़रा देखो तो ये लोग ख़ुदा पर कैसे कैसे झूठ तूफ़ान जोड़ते हैं और खुल्लम खुल्ला गुनाह के वास्ते तो यही काफ़ी है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَفْتَرُونَ: झूठ गढ़ना, मनगढ़ंत बातें बनाना।
  • الْكَذِبَ: झूठ, असत्य बात।
  • إِثْمًا مُّبِينًا: स्पष्ट और प्रत्यक्ष पाप।

तफसीर (व्याख्या):

ऐ नबी! आप आश्चर्यचकित होकर देखिए कि ये लोग अल्लाह पर झूठ कैसे गढ़ते हैं। वे अपने मन से बातें बनाकर अल्लाह की ओर आरोपित करते हैं, जबकि अल्लाह हर उस चीज़ से पाक और परे है जो उसके शान के खिलाफ हो। वे अपनी तारीफ़ खुद करते हैं और दावा करते हैं कि वे सच्चे और पवित्र हैं, हालाँकि वे झूठे हैं। वे अल्लाह की किताब को बदलने और उसमें अपनी मनमानी बातें जोड़ने का भी साहस करते हैं। यह झूठ गढ़ना अपने आप में एक स्पष्ट और प्रत्यक्ष पाप है, जो उनके कुटिल विश्वास और पथभ्रष्टता को उजागर करता है। यह पाप इतना बड़ा है कि इसकी सच्चाई किसी पर छिपी नहीं है, और यही उनके लिए पर्याप्त है कि वे अल्लाह की यातना के हक़दार बन जाएँ।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. अल्लाह पर झूठ गढ़ना सबसे बड़ा पाप है, चाहे वह उसके नाम पर कोई आरोप लगाना हो या उसकी किताब में मनमानी बातें जोड़ना हो। यह किसी भी मुसलमान के लिए कभी जायज़ नहीं है।
  2. यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चाई और ईमानदारी इस्लाम की बुनियाद है। जो लोग झूठ का सहारा लेते हैं, वे अल्लाह की नज़र में बड़े गुनाहगार हैं।
  3. इस्लाम हमें यह शिक्षा देता है कि हमें अपने दावों को सबूत और सच्चाई पर आधारित रखना चाहिए, न कि मनगढ़ंत बातों पर। अल्लाह का दीन पाक और सच्चा है, और उसके साथ किसी भी तरह का झूठ जोड़ना उसकी पाकी के खिलाफ है।
  4. यह आयत मुसलमानों को सावधान करती है कि वे अपने अमल और अक़ीदे को हमेशा कुरआन और सुन्नत की रोशनी में जाँचते रहें, ताकि वे किसी भी तरह के झूठ और बिदअत से बचे रहें।


📜 आयत 48-52 — अन-निसा

48إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَن يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَٰلِكَ لِمَن يَشَاءُ ۚ وَمَن يُشْرِكْ بِاللَّهِ فَقَدِ افْتَرَىٰ إِثْمًا عَظِيمًا
और ख़ुदा का हुक्म किया कराया हुआ काम समझो ख़ुदा उस जुर्म को तो अलबत्ता नहीं माफ़ करता कि उसके साथ शिर्क किया जाए हॉ उसके सिवा जो गुनाह हो जिसको चाहे माफ़ कर दे और जिसने (किसी को) ख़ुदा का शरीक बनाया तो उसने बड़े गुनाह का तूफान बॉधा
49أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ يُزَكُّونَ أَنفُسَهُم ۚ بَلِ اللَّهُ يُزَكِّي مَن يَشَاءُ وَلَا يُظْلَمُونَ فَتِيلًا
(ऐ रसूल) क्या तुमने उन लोगों के हाल पर नज़र नहीं की जो आप बड़े मुक़द्दस बनते हैं (मगर उससे क्या होता है) बल्कि ख़ुदा जिसे चाहता है मुक़द्दस बनाता है और ज़ुल्म तो किसी पर धागे के बराबर हो ही गा नहीं
50انظُرْ كَيْفَ يَفْتَرُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ ۖ وَكَفَىٰ بِهِ إِثْمًا مُّبِينًا
(ऐ रसूल) ज़रा देखो तो ये लोग ख़ुदा पर कैसे कैसे झूठ तूफ़ान जोड़ते हैं और खुल्लम खुल्ला गुनाह के वास्ते तो यही काफ़ी है
51أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ أُوتُوا نَصِيبًا مِّنَ الْكِتَابِ يُؤْمِنُونَ بِالْجِبْتِ وَالطَّاغُوتِ وَيَقُولُونَ لِلَّذِينَ كَفَرُوا هَٰؤُلَاءِ أَهْدَىٰ مِنَ الَّذِينَ آمَنُوا سَبِيلًا
(ऐ रसूल) क्या तुमने उन लोगों के (हाल पर) नज़र नहीं की जिन्हें किताबे ख़ुदा का कुछ हिस्सा दिया गया था और (फिर) शैतान और बुतों का कलमा पढ़ने लगे और जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तेयार किया है उनकी निस्बत कहने लगे कि ये तो ईमान लाने वालों से ज्यादा राहे रास्त पर हैं
52أُولَٰئِكَ الَّذِينَ لَعَنَهُمُ اللَّهُ ۖ وَمَن يَلْعَنِ اللَّهُ فَلَن تَجِدَ لَهُ نَصِيرًا
(ऐ रसूल) यही वह लोग हैं जिनपर ख़ुदा ने लानत की है और जिस पर ख़ुदा ने लानत की है तुम उनका मददगार हरगिज़ किसी को न पाओगे
अन-निसाकुरान सूची
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अनुवाद — अन-निसा 50

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Tuesday, August 18, 2026

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