अन-निसा · 73/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
وَلَئِنْ أَصَابَكُمْ فَضْلٌ مِّنَ اللَّهِ لَيَقُولَنَّ كَأَن لَّمْ تَكُن بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُ مَوَدَّةٌ يَا لَيْتَنِي كُنتُ مَعَهُمْ فَأَفُوزَ فَوْزًا عَظِيمًا ۝٧٣
Wa la`in asaabakum fadlum minal laahi la yaqoolanna ka al lam takum bainakum wa bainahoo mawaddatuny yaa laitanee kuntu ma`ahum fa afooza fawzan `azeemaa
📖 हिंदी अर्थ
और अगर तुमपर ख़ुदा ने फ़ज़ल किया (और दुश्मन पर ग़ालिब आए) तो इस तरह अजनबी बनके कि गोया तुममें उसमें कभी मोहब्बत ही न थी यूं कहने लगा कि ऐ काश उनके साथ होता तो मैं भी बड़ी कामयाबी हासिल करता

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَضْلٌ: अल्लाह की ओर से मिलने वाली भलाई, विजय, या ग़नीमत (युद्ध-धन)।
  • مَوَدَّةٌ: प्रेम, मित्रता, और आपसी संबंध।
  • فَأَفُوزَ: मैं सफलता प्राप्त कर लूँ, कामयाबी हासिल कर लूँ।
  • فَوْزًا عَظِيمًا: बहुत बड़ी सफलता, जो निःसंदेह रूप से महान हो।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) के हाल का वर्णन करती है जो जिहाद और अल्लाह के रास्ते में लड़ने से पीछे रह जाते हैं। जब मुसलमानों को अल्लाह की ओर से कोई भलाई मिलती है—जैसे विजय, सुरक्षा, या ग़नीमत का धन—तो ये मुनाफ़िक़ पछतावे और ईर्ष्या के साथ कहते हैं: "काश! मैं भी उनके साथ होता, तो मुझे भी यह बड़ी सफलता मिलती।" वे यह बात ऐसे कहते हैं जैसे उनका तुमसे कोई प्रेम या संबंध ही नहीं था, हालाँकि वे तुम्हारे साथ मिलकर रहते थे और उन्हें तुम्हारी स्थिति की पूरी जानकारी थी। उनका यह पछतावा ईमान की वजह से नहीं होता, बल्कि सिर्फ़ दुनियावी माल और फ़ायदे के लिए होता है। वे सच्चे दिल से अल्लाह के रास्ते में कुर्बानी नहीं देते, बल्कि जब देखते हैं कि मुसलमानों को कामयाबी मिली है, तो उनके मुँह से यह बात निकलती है—जबकि अगर उन्हें नुक़सान पहुँचता, तो वे ख़ुश होते और कहते कि हमने अच्छा किया जो लड़ने नहीं गए।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान और अल्लाह के रास्ते में कुर्बानी की असली पहचान मुश्किलों में होती है, न कि सिर्फ़ फ़ायदे के समय। सच्चा मुसलमान वही है जो हर हाल में अल्लाह के दीन की मदद करे।
  2. मुनाफ़िक़ी की पहचान यह है कि वे दुनियावी माल और शोहरत के लिए काम करते हैं, जबकि मोमिन की नीयत अल्लाह की रज़ा और आख़िरत की कामयाबी होती है।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के रास्ते में जिहाद और भलाई के कामों में आगे बढ़ना चाहिए, क्योंकि असली फ़ायदा और सफलता उसी में है। दुनिया की ग़नीमत तो मिल सकती है, लेकिन आख़िरत की सफलता उन्हीं को मिलेगी जो अल्लाह की राह में सच्चे दिल से निकलें।
  4. हमें अपने दिल को ईर्ष्या और पछतावे से पाक रखना चाहिए और हर हाल में अल्लाह के फ़ैसले पर राज़ी रहना चाहिए। मुसलमानों की कामयाबी पर ख़ुश होना चाहिए, न कि जलन और हसद करना।
  5. यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि अल्लाह की नेमतों की क़द्र करनी चाहिए और उनके लिए शुक्र अदा करना चाहिए, क्योंकि यही वह चीज़ है जो इंसान को सच्ची कामयाबी की तरफ़ ले जाती है।


📜 आयत 71-75 — अन-निसा

71يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا خُذُوا حِذْرَكُمْ فَانفِرُوا ثُبَاتٍ أَوِ انفِرُوا جَمِيعًا
ऐ ईमानवालों (जिहाद के वक्त) अपनी हिफ़ाज़त के (ज़राए) अच्छी तरह देखभाल लो फिर तुम्हें इख्तेयार है ख्वाह दस्ता दस्ता निकलो या सबके सब इकट्ठे होकर निकल खड़े हो
72وَإِنَّ مِنكُمْ لَمَن لَّيُبَطِّئَنَّ فَإِنْ أَصَابَتْكُم مُّصِيبَةٌ قَالَ قَدْ أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيَّ إِذْ لَمْ أَكُن مَّعَهُمْ شَهِيدًا
और तुममें से बाज़ ऐसे भी हैं जो (जेहाद से) ज़रूर पीछे रहेंगे फिर अगर इत्तेफ़ाक़न तुमपर कोई मुसीबत आ पड़ी तो कहने लगे ख़ुदा ने हमपर बड़ा फ़ज़ल किया कि उनमें (मुसलमानों) के साथ मौजूद न हुआ
73وَلَئِنْ أَصَابَكُمْ فَضْلٌ مِّنَ اللَّهِ لَيَقُولَنَّ كَأَن لَّمْ تَكُن بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُ مَوَدَّةٌ يَا لَيْتَنِي كُنتُ مَعَهُمْ فَأَفُوزَ فَوْزًا عَظِيمًا
और अगर तुमपर ख़ुदा ने फ़ज़ल किया (और दुश्मन पर ग़ालिब आए) तो इस तरह अजनबी बनके कि गोया तुममें उसमें कभी मोहब्बत ही न थी यूं कहने लगा कि ऐ काश उनके साथ होता तो मैं भी बड़ी कामयाबी हासिल करता
74۞ فَلْيُقَاتِلْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ الَّذِينَ يَشْرُونَ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا بِالْآخِرَةِ ۚ وَمَن يُقَاتِلْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ فَيُقْتَلْ أَوْ يَغْلِبْ فَسَوْفَ نُؤْتِيهِ أَجْرًا عَظِيمًا
पस जो लोग दुनिया की ज़िन्दगी (जान तक) आख़ेरत के वास्ते दे डालने को मौजूद हैं उनको ख़ुदा की राह में जेहाद करना चाहिए और जिसने ख़ुदा की राह में जेहाद किया फिर शहीद हुआ तो गोया ग़ालिब आया तो (बहरहाल) हम तो अनक़रीब ही उसको बड़ा अज्र अता फ़रमायेंगे
75وَمَا لَكُمْ لَا تُقَاتِلُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَالْمُسْتَضْعَفِينَ مِنَ الرِّجَالِ وَالنِّسَاءِ وَالْوِلْدَانِ الَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَا أَخْرِجْنَا مِنْ هَٰذِهِ الْقَرْيَةِ الظَّالِمِ أَهْلُهَا وَاجْعَل لَّنَا مِن لَّدُنكَ وَلِيًّا وَاجْعَل لَّنَا مِن لَّدُنكَ نَصِيرًا
(और मुसलमानों) तुमको क्या हो गया है कि ख़ुदा की राह में उन कमज़ोर और बेबस मर्दो और औरतों और बच्चों (को कुफ्फ़ार के पंजे से छुड़ाने) के वास्ते जेहाद नहीं करते जो (हालते मजबूरी में) ख़ुदा से दुआएं मॉग रहे हैं कि ऐ हमारे पालने वाले किसी तरह इस बस्ती (मक्का) से जिसके बाशिन्दे बड़े ज़ालिम हैं हमें निकाल और अपनी तरफ़ से किसी को हमारा सरपरस्त बना और तू ख़ुद ही किसी को अपनी तरफ़ से हमारा मददगार बना
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अनुवाद — अन-निसा 73

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Tuesday, August 18, 2026

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