अन-निसा · 72/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
وَإِنَّ مِنكُمْ لَمَن لَّيُبَطِّئَنَّ فَإِنْ أَصَابَتْكُم مُّصِيبَةٌ قَالَ قَدْ أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيَّ إِذْ لَمْ أَكُن مَّعَهُمْ شَهِيدًا ۝٧٢
Wa inna minkum lamal la yubatti`anna fa in asaabatkum museebatun qaala qad an`amal laahu `alaiya iz lam akum ma`ahum shaheeda
📖 हिंदी अर्थ
और तुममें से बाज़ ऐसे भी हैं जो (जेहाद से) ज़रूर पीछे रहेंगे फिर अगर इत्तेफ़ाक़न तुमपर कोई मुसीबत आ पड़ी तो कहने लगे ख़ुदा ने हमपर बड़ा फ़ज़ल किया कि उनमें (मुसलमानों) के साथ मौजूद न हुआ
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَيُبَطِّئَنَّ: जान-बूझकर जिहाद से पीछे रहना और दूसरों को भी रोकना।
  • مُصِيبَةٌ: मुसीबत, यानी मारा जाना या हार का सामना करना।
  • شَهِيدًا: यहाँ इसका अर्थ है "उपस्थित" या "गवाह" (युद्ध के मैदान में मौजूद)।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में मुनाफ़िक़ून (दिखावटी मुसलमानों) और कमज़ोर ईमान वालों की हालत बयान कर रहा है। उनमें से कुछ लोग ऐसे हैं जो जिहाद के लिए निकलने में जान-बूझकर देरी करते हैं, और दूसरों को भी धीमा करने की कोशिश करते हैं। जब मुसलमानों पर कोई मुसीबत आती है — चाहे वह मारे जाना हो या हार — तो ये लोग खुश होकर कहते हैं: "अल्लाह ने मुझ पर बड़ा कृपा किया कि मैं उनके साथ युद्ध में शामिल नहीं हुआ, वरना मुझे भी वही अंजाम भुगतना पड़ता।" वे इस बात से खुश होते हैं कि वे उस मुसीबत से बच गए, और उन्हें अपने इस पीछे रहने पर कोई पछतावा नहीं होता, बल्कि वे इसे अल्लाह की नेमत समझते हैं। यह उनके मुनाफ़िक़ होने की साफ़ निशानी है, क्योंकि सच्चे मोमिन का हाल यह होता है कि वह जिहाद में शामिल होने की कोशिश करता है और मुसलमानों के दुख में दुखी होता है।

फ़ायदे (सीख):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि मुसलमानों को एक-दूसरे के दुख-सुख में शरीक होना चाहिए। किसी मुसलमान पर मुसीबत आए तो हमें खुश नहीं होना चाहिए, बल्कि दुखी होना चाहिए।
  2. जिहाद और अच्छे कामों में पीछे रहना और दूसरों को रोकना मुनाफ़िक़ों की आदत है। हमें इससे बचना चाहिए और हमेशा नेक कामों में आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए।
  3. यह आयत हमें यह भी बताती है कि इंसान को अपनी जान बचाने के लिए दीन के कामों से पीछे नहीं हटना चाहिए। अल्लाह के रास्ते में कुर्बानी देना ही असली कामयाबी है।
  4. मुसलमान को चाहिए कि वह हर हाल में अपने भाइयों के साथ खड़ा रहे, और उनकी मुसीबत में उन्हें अकेला न छोड़े। यही ईमान की निशानी है।
🎧 सुनें

📜 आयत 70-74 — अन-निसा

70ذَٰلِكَ الْفَضْلُ مِنَ اللَّهِ ۚ وَكَفَىٰ بِاللَّهِ عَلِيمًا
ये ख़ुदा का फ़ज़ल (व करम) है और ख़ुदा तो वाक़िफ़कारी में बस है
71يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا خُذُوا حِذْرَكُمْ فَانفِرُوا ثُبَاتٍ أَوِ انفِرُوا جَمِيعًا
ऐ ईमानवालों (जिहाद के वक्त) अपनी हिफ़ाज़त के (ज़राए) अच्छी तरह देखभाल लो फिर तुम्हें इख्तेयार है ख्वाह दस्ता दस्ता निकलो या सबके सब इकट्ठे होकर निकल खड़े हो
72وَإِنَّ مِنكُمْ لَمَن لَّيُبَطِّئَنَّ فَإِنْ أَصَابَتْكُم مُّصِيبَةٌ قَالَ قَدْ أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيَّ إِذْ لَمْ أَكُن مَّعَهُمْ شَهِيدًا
और तुममें से बाज़ ऐसे भी हैं जो (जेहाद से) ज़रूर पीछे रहेंगे फिर अगर इत्तेफ़ाक़न तुमपर कोई मुसीबत आ पड़ी तो कहने लगे ख़ुदा ने हमपर बड़ा फ़ज़ल किया कि उनमें (मुसलमानों) के साथ मौजूद न हुआ
73وَلَئِنْ أَصَابَكُمْ فَضْلٌ مِّنَ اللَّهِ لَيَقُولَنَّ كَأَن لَّمْ تَكُن بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُ مَوَدَّةٌ يَا لَيْتَنِي كُنتُ مَعَهُمْ فَأَفُوزَ فَوْزًا عَظِيمًا
और अगर तुमपर ख़ुदा ने फ़ज़ल किया (और दुश्मन पर ग़ालिब आए) तो इस तरह अजनबी बनके कि गोया तुममें उसमें कभी मोहब्बत ही न थी यूं कहने लगा कि ऐ काश उनके साथ होता तो मैं भी बड़ी कामयाबी हासिल करता
74۞ فَلْيُقَاتِلْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ الَّذِينَ يَشْرُونَ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا بِالْآخِرَةِ ۚ وَمَن يُقَاتِلْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ فَيُقْتَلْ أَوْ يَغْلِبْ فَسَوْفَ نُؤْتِيهِ أَجْرًا عَظِيمًا
पस जो लोग दुनिया की ज़िन्दगी (जान तक) आख़ेरत के वास्ते दे डालने को मौजूद हैं उनको ख़ुदा की राह में जेहाद करना चाहिए और जिसने ख़ुदा की राह में जेहाद किया फिर शहीद हुआ तो गोया ग़ालिब आया तो (बहरहाल) हम तो अनक़रीब ही उसको बड़ा अज्र अता फ़रमायेंगे
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अनुवाद — अन-निसा 72

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Tuesday, August 18, 2026

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