अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- तुराब: मिट्टी, धूल।
- नुत्फ़ा: वीर्य, मर्द का पानी।
- अलक़ा: जमा हुआ खून, भ्रूण की एक अवस्था।
- अशुद्द: युवावस्था की पूर्ण शक्ति और समझदारी का समय।
- अजलुन मुसम्मा: एक निश्चित समय, जो अल्लाह के यहाँ मृत्यु के लिए निर्धारित है।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत हमें अल्लाह की उस अद्भुत शक्ति और कृपा की याद दिलाती है जिसने हमें पैदा किया और हमारे जीवन के हर पड़ाव को अपनी हिकमत (बुद्धिमत्ता) से सजाया। वही अल्लाह है जिसने हमारे पहले पिता आदम (अलैहिस्सलाम) को मिट्टी से बनाया, और फिर उनकी नस्ल से हर इंसान को एक बूंद (वीर्य) से रचा। उसके बाद वह बूंद जमे हुए खून (अलक़ा) में बदली, फिर उससे माँ के पेट में अलग-अलग अवस्थाओं से गुज़रते हुए हमें एक छोटे बच्चे के रूप में इस दुनिया में लाया गया।
फिर अल्लाह ने हमें बड़ा किया, हमारी शारीरिक और मानसिक शक्ति को पूर्ण किया, ताकि हम युवावस्था (अशुद्द) तक पहुँचें। इसके बाद हमें बुढ़ापे तक पहुँचाता है, जब बाल सफेद हो जाते हैं और शरीर कमज़ोर हो जाता है। और यह भी उसकी मर्ज़ी है कि कुछ लोग इससे पहले ही, यानी युवावस्था या बुढ़ापे से पहले, मौत का सामना कर लेते हैं। यह सब कुछ एक निश्चित समय (अजल) तक पहुँचाने के लिए है, जो अल्लाह के इल्म में तय है — न उसमें कमी होती है और न ज़्यादती।
इस पूरी कायनात और इंसान की पैदाइश के इस सफर में अल्लाह की कुदरत (शक्ति) के अनगिनत निशानियाँ हैं। वही है जो हर चीज़ को पैदा करता है, पालता है, और एक दिन सबको अपनी तरफ लौटा ले जाता है। यह आयत हमें सोचने पर मजबूर करती है कि जिस अल्लाह ने हमें इस तरह बनाया और हर पड़ाव पर हमारी देखभाल की, क्या वह हमें दोबारा ज़िंदा करके हिसाब लेने पर नहीं ला सकता? बेशक वह इस पर पूरी तरह क़ादिर (सक्षम) है।
इसलिए, ऐ इंसान! अपनी पैदाइश के इन मरहलों पर ग़ौर कर — मिट्टी से, बूंद से, खून से, बच्चे से, जवानी से, बुढ़ापे तक। यह सब कुछ अल्लाह की वहदानियत (एकता) और उसकी कुदरत की सबसे बड़ी दलील है। क्या यह सोचने के बाद भी तुम उसे भूल सकते हो जिसने तुम्हें बनाया? क्या तुम उसके सिवा किसी और की इबादत कर सकते हो, जबकि वही तुम्हारा रज़्ज़ाक़ (रोज़ी देने वाला) और मालिक है?
यह आयत हमें सिखाती है कि हमारी ज़िंदगी का हर लम्हा अल्लाह की देन है, और हर उम्र का अपना एक मक़सद है। जवानी में हमें अल्लाह की इबादत और नेक कामों में शक्ति लगानी चाहिए, और बुढ़ापे में भी उसी की रहमत की उम्मीद रखनी चाहिए। अल्लाह ने हमें अक्ल (बुद्धि) दी है ताकि हम इन निशानियों को समझें, उसकी कुदरत को पहचानें, और अपनी ज़िंदगी को उसकी रज़ा (खुशी) के मुताबिक बनाएँ। यही सबसे बड़ी कामयाबी है — कि हम अपने रब को पहचानें, उसी की इबादत करें, और उसी की तरफ लौटने की तैयारी करें।
📜 आयत 65-69 — ग़ाफिर
अनुवाद — ग़ाफिर 67
सूरा ग़ाफिर आयत 67 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : वही वह ख़ुदा है जिसने तुमको पहले (पहल) मिटटी से…सूरा आयत 67/85 — ग़ाफिर غافر (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: ग़ाफिर सुनें, ग़ाफिर अनुवाद, ग़ाफिर mp3, ग़ाफिर pdf. आयत 65–69. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए








