अश-शूरा · 8/53
अनुवाद उच्चारण — अश-शूरा
وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَجَعَلَهُمْ أُمَّةً وَاحِدَةً وَلَٰكِن يُدْخِلُ مَن يَشَاءُ فِي رَحْمَتِهِ ۚ وَالظَّالِمُونَ مَا لَهُم مِّن وَلِيٍّ وَلَا نَصِيرٍ ۝٨
Wa law shaaa`al laahu laja`alahum ummatanw waahi datanw walaakiny yudkhilumany yashaaa`u fee rahmatih; waz zaalimoona maa lahum minw waliyyinw wa laa naseer
📖 हिंदी अर्थ
और अगर ख़ुदा चाहता तो इन सबको एक ही गिरोह बना देता मगर वह तो जिसको चाहता है (हिदायत करके) अपनी रहमत में दाख़िल कर लेता है और ज़ालिमों का तो (उस दिन) न कोई यार है और न मददगार
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أُمَّةً وَاحِدَةً: एक ही समुदाय या एक ही धर्म पर चलने वाला समूह।
  • رَحْمَتِهِ: उसकी दया, जिसका अर्थ यहाँ इस्लाम और जन्नत (स्वर्ग) है।
  • وَلِيّ: मददगार, संरक्षक, जो किसी के काम आए।
  • نَصِير: सहायक, जो किसी को सज़ा या मुसीबत से बचाए।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने इस आयत में अपनी इच्छा और हिकमत (बुद्धिमत्ता) का ज़िक्र करते हुए फ़रमाया कि अगर वह चाहता तो सभी इंसानों को एक ही उम्मत (समुदाय) बना देता, यानी सभी को ज़बरदस्ती एक ही धर्म—इस्लाम—पर चलने वाला बना देता, और सभी को हिदायत दे देता। लेकिन अल्लाह की हिकमत यह है कि उसने इंसान को इख्तियार (स्वतंत्र विकल्प) दिया है, ताकि वह अपनी मर्ज़ी से नेकी और बुराई में से किसी एक को चुने।

अल्लाह तआला अपनी रहमत से उन लोगों को इस्लाम की हिदायत देता है और जन्नत में दाखिल करता है जिनके लिए उसकी तरफ से भलाई लिखी जा चुकी है, और जो सच्चे दिल से उसकी ओर रुजू करते हैं। यह अल्लाह का फज़ल (कृपा) है जो वह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, अता करता है।

लेकिन जो लोग ज़ुल्म करते हैं—यानी शिर्क करते हैं और अल्लाह की आयतों को झुठलाते हैं—उनके लिए क़यामत के दिन न कोई वली (संरक्षक) होगा जो उनके काम आए, और न कोई नसीर (सहायक) होगा जो उन्हें अल्लाह के अज़ाब से बचा सके। वे पूरी तरह अकेले और बेसहारा होंगे, और उनका अंजाम अल्लाह की सज़ा के सिवा कुछ नहीं होगा।

दावती पहलू:

यह आयत हमें अल्लाह की असीम रहमत की याद दिलाती है कि उसने हमें हिदायत का रास्ता दिखाया और अपनी मर्ज़ी से हमें इस्लाम जैसी नेमत अता की। हमें चाहिए कि हम इस नेमत की क़द्र करें और अल्लाह के फरमानों पर अमल करें, क्योंकि यही हमारी कामयाबी का ज़रिया है। साथ ही, यह आयत हमें ज़ुल्म और शिर्क से बचने की ताकीद करती है, क्योंकि क़यामत के दिन कोई हमारा मददगार नहीं होगा। आओ हम अल्लाह की रहमत के तलबगार बनें और अपने आख़िरत (परलोक) को संवारने की कोशिश करें, क्योंकि अल्लाह की रहमत उन्हीं के लिए है जो उसकी ओर रुजू करते हैं और उसके दीन पर चलते हैं।

🎧 सुनें

📜 आयत 6-10 — अश-शूरा

6وَالَّذِينَ اتَّخَذُوا مِن دُونِهِ أَوْلِيَاءَ اللَّهُ حَفِيظٌ عَلَيْهِمْ وَمَا أَنتَ عَلَيْهِم بِوَكِيلٍ
और जिन लोगों ने ख़ुदा को छोड़ कर (और) अपने सरपरस्त बना रखे हैं ख़ुदा उनकी निगरानी कर रहा है (ऐ रसूल) तुम उनके निगेहबान नहीं हो
7وَكَذَٰلِكَ أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ قُرْآنًا عَرَبِيًّا لِّتُنذِرَ أُمَّ الْقُرَىٰ وَمَنْ حَوْلَهَا وَتُنذِرَ يَوْمَ الْجَمْعِ لَا رَيْبَ فِيهِ ۚ فَرِيقٌ فِي الْجَنَّةِ وَفَرِيقٌ فِي السَّعِيرِ
और हमने तुम्हारे पास अरबी क़ुरान यूँ भेजा ताकि तुम मक्का वालों को और जो लोग इसके इर्द गिर्द रहते हैं उनको डराओ और (उनको) क़यामत के दिन से भी डराओ जिस (के आने) में कुछ भी शक़ नहीं (उस दिन) एक फरीक़ (मानने वाला) जन्नत में होगा और फरीक़ (सानी) दोज़ख़ में
8وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَجَعَلَهُمْ أُمَّةً وَاحِدَةً وَلَٰكِن يُدْخِلُ مَن يَشَاءُ فِي رَحْمَتِهِ ۚ وَالظَّالِمُونَ مَا لَهُم مِّن وَلِيٍّ وَلَا نَصِيرٍ
और अगर ख़ुदा चाहता तो इन सबको एक ही गिरोह बना देता मगर वह तो जिसको चाहता है (हिदायत करके) अपनी रहमत में दाख़िल कर लेता है और ज़ालिमों का तो (उस दिन) न कोई यार है और न मददगार
9أَمِ اتَّخَذُوا مِن دُونِهِ أَوْلِيَاءَ ۖ فَاللَّهُ هُوَ الْوَلِيُّ وَهُوَ يُحْيِي الْمَوْتَىٰ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
क्या उन लोगों ने ख़ुदा के सिवा (दूसरे) कारसाज़ बनाए हैं तो कारसाज़ बस ख़ुदा ही है और वही मुर्दों को ज़िन्दा करेगा और वही हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है
10وَمَا اخْتَلَفْتُمْ فِيهِ مِن شَيْءٍ فَحُكْمُهُ إِلَى اللَّهِ ۚ ذَٰلِكُمُ اللَّهُ رَبِّي عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَإِلَيْهِ أُنِيبُ
और तुम लोग जिस चीज़ में बाहम एख्तेलाफ़ात रखते हो उसका फैसला ख़ुदा ही के हवाले है वही ख़ुदा तो मेरा परवरदिगार है मैं उसी पर भरोसा रखता हूँ और उसी की तरफ रूजू करता हूँ
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अनुवाद — अश-शूरा 8

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Tuesday, August 18, 2026

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