अल-माइदा · 63/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
لَوْلَا يَنْهَاهُمُ الرَّبَّانِيُّونَ وَالْأَحْبَارُ عَن قَوْلِهِمُ الْإِثْمَ وَأَكْلِهِمُ السُّحْتَ ۚ لَبِئْسَ مَا كَانُوا يَصْنَعُونَ ۝٦٣
Law laa yanhaahumur rabbaaniyyoona wal ahbaaru `an qawlihimul ismaa wa aklihimus suht; labi`sa maa kaanoo yasna`oon
📖 हिंदी अर्थ
उनको अल्लाह वाले और उलेमा झूठ बोलने और हरामख़ोरी से क्यों नहीं रोकते जो (दरगुज़र) ये लोग करते हैं यक़ीनन बहुत ही बुरी है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الرَّبَّانِيُّونَ (रब्बानिय्यून): वे धार्मिक नेता और विद्वान जो लोगों को धर्म की शिक्षा देते थे और उनका मार्गदर्शन करते थे।
  • الأَحْبَارُ (अहबार): यहूदी विद्वान और धर्मज्ञ।
  • الْإِثْم (इस्म): झूठ बोलना, झूठी गवाही देना और पाप के कार्य।
  • السُّحْتَ (सुह्त): हराम कमाई, रिश्वत, और लोगों का माल नाजायज़ तरीके से खाना।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयात में अल्लाह तआला उन लोगों की निंदा कर रहा है जो पाप और ज़ुल्म में जल्दी करते हैं, और साथ ही उनके विद्वानों और धार्मिक नेताओं को भी फटकार रहा है। अल्लाह पूछता है: "क्या इन रब्बानियों (धार्मिक नेताओं) और अहबार (विद्वानों) को इन लोगों को झूठ बोलने, झूठी गवाही देने और हराम कमाई (रिश्वत, सूद, और लोगों का माल नाजायज़ तरीके से खाने) से क्यों नहीं रोकना चाहिए?"

यानी, इन विद्वानों का कर्तव्य था कि वे इन पापियों को इन बुराइयों से रोकते और उन्हें सच्चाई और नेकी की ओर बुलाते, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। फिर अल्लाह कहता है: "निश्चय ही वे बहुत बुरा कर रहे थे" — यानी, इन विद्वानों का मौन रहना और निषेध (नाही अनिल मुन्कर) का कर्तव्य छोड़ देना स्वयं एक बड़ा पाप है। यह आयत स्पष्ट करती है कि जो व्यक्ति बुराई से रोकने का कर्तव्य छोड़ देता है, वह उस बुराई को करने वाले के समान ही गुनाहगार है।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. विद्वानों और धार्मिक नेताओं की ज़िम्मेदारी बहुत बड़ी है — वे केवल पढ़ाने ही नहीं, बल्कि समाज में बुराई को रोकने के लिए भी ज़िम्मेदार हैं। यदि वे चुप रहेंगे, तो अल्लाह के यहाँ पकड़े जाएँगे।
  2. यह आयत हमें सिखाती है कि बुराई को देखकर चुप रहना या उसका समर्थन करना गुनाह है। हर मुसलमान को अपनी हैसियत के अनुसार बुराई को रोकने का प्रयास करना चाहिए।
  3. झूठ, झूठी गवाही और हराम कमाई (जैसे रिश्वत, सूद, धोखाधड़ी) गंभीर पाप हैं, और इनसे बचना हर मुसलमान का कर्तव्य है।
  4. यह आयत हमें यह भी बताती है कि अल्लाह के दीन में अमर बिल मारूफ़ (नेकी का आदेश) और नाही अनिल मुन्कर (बुराई से रोकना) कितना महत्वपूर्ण है — यह समाज को सुधारने का सबसे बड़ा ज़रिया है।
  5. इस आयत से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हम अपने समाज में सच्चाई और ईमानदारी को बढ़ावा दें, और किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार या अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाएँ, चाहे हमारा पद या हैसियत कुछ भी हो।


📜 आयत 61-65 — अल-माइदा

61وَإِذَا جَاءُوكُمْ قَالُوا آمَنَّا وَقَد دَّخَلُوا بِالْكُفْرِ وَهُمْ قَدْ خَرَجُوا بِهِ ۚ وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا كَانُوا يَكْتُمُونَ
और (मुसलमानों) जब ये लोग तुम्हारे पास आ जाते हैं तो कहते हैं कि हम तो ईमान लाए हैं हालॉकि वह कुफ़्र ही को साथ लेकर आए और फिर निकले भी तो साथ लिए हुए और जो नेफ़ाक़ वह छुपाए हुए थे ख़ुदा उसे ख़ूब जानता है
62وَتَرَىٰ كَثِيرًا مِّنْهُمْ يُسَارِعُونَ فِي الْإِثْمِ وَالْعُدْوَانِ وَأَكْلِهِمُ السُّحْتَ ۚ لَبِئْسَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
(ऐ रसूल) तुम उनमें से बहुतेरों को देखोगे कि गुनाह और सरकशी और हरामख़ोरी की तरफ़ दौड़ पड़ते हैं जो काम ये लोग करते थे वह यक़ीनन बहुत बुरा है
63لَوْلَا يَنْهَاهُمُ الرَّبَّانِيُّونَ وَالْأَحْبَارُ عَن قَوْلِهِمُ الْإِثْمَ وَأَكْلِهِمُ السُّحْتَ ۚ لَبِئْسَ مَا كَانُوا يَصْنَعُونَ
उनको अल्लाह वाले और उलेमा झूठ बोलने और हरामख़ोरी से क्यों नहीं रोकते जो (दरगुज़र) ये लोग करते हैं यक़ीनन बहुत ही बुरी है
64وَقَالَتِ الْيَهُودُ يَدُ اللَّهِ مَغْلُولَةٌ ۚ غُلَّتْ أَيْدِيهِمْ وَلُعِنُوا بِمَا قَالُوا ۘ بَلْ يَدَاهُ مَبْسُوطَتَانِ يُنفِقُ كَيْفَ يَشَاءُ ۚ وَلَيَزِيدَنَّ كَثِيرًا مِّنْهُم مَّا أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ طُغْيَانًا وَكُفْرًا ۚ وَأَلْقَيْنَا بَيْنَهُمُ الْعَدَاوَةَ وَالْبَغْضَاءَ إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ ۚ كُلَّمَا أَوْقَدُوا نَارًا لِّلْحَرْبِ أَطْفَأَهَا اللَّهُ ۚ وَيَسْعَوْنَ فِي الْأَرْضِ فَسَادًا ۚ وَاللَّهُ لَا يُحِبُّ الْمُفْسِدِينَ
और यहूदी कहने लगे कि ख़ुदा का हाथ बॅधा हुआ है (बख़ील हो गया) उन्हीं के हाथ बॉध दिए जाएं और उनके (इस) कहने पर (ख़ुदा की) फिटकार बरसे (ख़ुदा का हाथ बॅधने क्यों लगा) बल्कि उसके दोनों हाथ कुशादा हैं जिस तरह चाहता है ख़र्च करता है और जो (किताब) तुम्हारे पास नाज़िल की गयी है (उनका शक व हसद) उनमें से बहुतेरों को कुफ़्र व सरकशी को और बढ़ा देगा और (गोया) हमने ख़ुद उनके आपस में रोज़े क़यामत तक अदावत और कीने की बुनियाद डाल दी जब ये लोग लड़ाई की आग भड़काते हैं तो ख़ुदा उसको बुझा देता है और रूए ज़मीन में फ़साद फेलाने के लिए दौड़ते फिरते हैं और ख़ुदा फ़सादियों को दोस्त नहीं रखता
65وَلَوْ أَنَّ أَهْلَ الْكِتَابِ آمَنُوا وَاتَّقَوْا لَكَفَّرْنَا عَنْهُمْ سَيِّئَاتِهِمْ وَلَأَدْخَلْنَاهُمْ جَنَّاتِ النَّعِيمِ
और अगर अहले किताब ईमान लाते और (हमसे) डरते तो हम ज़रूर उनके गुनाहों से दरगुज़र करते और उनको नेअमत व आराम (बेहिशत के बाग़ों में) पहुंचा देते
अल-माइदाकुरान सूची
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63आयत

अनुवाद — अल-माइदा 63

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Tuesday, August 18, 2026

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