अल-माइदा · 65/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
وَلَوْ أَنَّ أَهْلَ الْكِتَابِ آمَنُوا وَاتَّقَوْا لَكَفَّرْنَا عَنْهُمْ سَيِّئَاتِهِمْ وَلَأَدْخَلْنَاهُمْ جَنَّاتِ النَّعِيمِ ۝٦٥
Wa law anna Ahlal Kitaabi aamanoo wattaqaw lakaffarnaa `anhum saiyiaatihim wa la adkhalnaahu Jannaatin Na`eem
📖 हिंदी अर्थ
और अगर अहले किताब ईमान लाते और (हमसे) डरते तो हम ज़रूर उनके गुनाहों से दरगुज़र करते और उनको नेअमत व आराम (बेहिशत के बाग़ों में) पहुंचा देते
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • آمَنُوا: ईमान लाए, सच्चे दिल से स्वीकार किया।
  • وَاتَّقَوْا: डरें, अल्लाह के आदेशों का पालन करें और निषेधों से बचें।
  • لَكَفَّرْنَا: हम (अल्लाह) माफ कर देंगे, ढक देंगे (पापों को)।
  • سَيِّئَاتِهِمْ: उनके बुरे कर्म, गुनाह।
  • جَنَّاتِ النَّعِيم: ऐसे बाग जो हमेशा की नेमतों (आशीर्वादों) से भरे हों।

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में अह्ले-किताब (यहूदियों और ईसाइयों) को संबोधित करते हुए फरमाता है कि अगर वे सच्चे दिल से अल्लाह और उसके आखिरी रसूल मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर ईमान ले आते, और अल्लाह के आदेशों का पालन करते हुए उससे डरते — यानी गुनाहों से बचते और तक़वा (परहेज़गारी) अपनाते — तो अल्लाह उनके सारे पिछले गुनाह माफ कर देता, चाहे वे कितने ही ज़्यादा क्यों न हों। अल्लाह का वादा है कि वह उन्हें आख़िरत में ऐसे बागों में दाखिल करेगा जो हमेशा रहने वाली नेमतों से भरे हुए हैं — वहाँ की खुशियाँ, आराम और सुख कभी खत्म नहीं होंगे। यह अल्लाह की बड़ी रहमत और करम है कि ईमान और तक़वा पिछले सारे पापों को मिटा देते हैं। इस आयत में यह भी स्पष्ट संकेत है कि इस्लाम (अल्लाह के सामने आत्मसमर्पण) पिछले सारे गुनाहों को धो देता है, और कोई भी किताबी (यहूदी या ईसाई) जब तक इस्लाम नहीं अपनाता, जन्नत में दाखिल नहीं हो सकता।


फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. अल्लाह की रहमत असीम है: अल्लाह तआला अपने बंदों के गुनाहों को माफ करने के लिए तैयार है, बशर्ते वे ईमान लाएँ और तक़वा अपनाएँ। यह हमें उम्मीद देता है कि चाहे हमसे कितनी भी गलतियाँ हुई हों, अल्लाह की ओर लौटना और सच्चा ईमान लाना हमेशा संभव है।
  2. ईमान और तक़वा का महत्व: यह आयत हमें सिखाती है कि सिर्फ नाम का ईमान काफी नहीं, बल्कि अल्लाह से डरना और उसके हुक्मों पर अमल करना ज़रूरी है। यही दो चीज़ें इंसान को जन्नत तक पहुँचाती हैं।
  3. इस्लाम की सच्चाई: यह आयत बताती है कि इस्लाम ही वह रास्ता है जो अल्लाह को पसंद है, और इस्लाम अपनाने से पिछले सारे पाप धुल जाते हैं। यह हर इंसान के लिए एक प्यारा संदेश है कि वह अपने अतीत की परवाह किए बिना सच्चाई की ओर लौट सकता है।
  4. जन्नत की नेमतें: जन्नत का ज़िक्र हमें याद दिलाता है कि असली सुख और चैन इसी दुनिया में नहीं, बल्कि आख़िरत के उस बाग में है जो कभी खत्म नहीं होता। यह हमें दुनिया की चीज़ों से लगाव कम करने और आख़िरत की तैयारी करने की प्रेरणा देता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 63-67 — अल-माइदा

63لَوْلَا يَنْهَاهُمُ الرَّبَّانِيُّونَ وَالْأَحْبَارُ عَن قَوْلِهِمُ الْإِثْمَ وَأَكْلِهِمُ السُّحْتَ ۚ لَبِئْسَ مَا كَانُوا يَصْنَعُونَ
उनको अल्लाह वाले और उलेमा झूठ बोलने और हरामख़ोरी से क्यों नहीं रोकते जो (दरगुज़र) ये लोग करते हैं यक़ीनन बहुत ही बुरी है
64وَقَالَتِ الْيَهُودُ يَدُ اللَّهِ مَغْلُولَةٌ ۚ غُلَّتْ أَيْدِيهِمْ وَلُعِنُوا بِمَا قَالُوا ۘ بَلْ يَدَاهُ مَبْسُوطَتَانِ يُنفِقُ كَيْفَ يَشَاءُ ۚ وَلَيَزِيدَنَّ كَثِيرًا مِّنْهُم مَّا أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ طُغْيَانًا وَكُفْرًا ۚ وَأَلْقَيْنَا بَيْنَهُمُ الْعَدَاوَةَ وَالْبَغْضَاءَ إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ ۚ كُلَّمَا أَوْقَدُوا نَارًا لِّلْحَرْبِ أَطْفَأَهَا اللَّهُ ۚ وَيَسْعَوْنَ فِي الْأَرْضِ فَسَادًا ۚ وَاللَّهُ لَا يُحِبُّ الْمُفْسِدِينَ
और यहूदी कहने लगे कि ख़ुदा का हाथ बॅधा हुआ है (बख़ील हो गया) उन्हीं के हाथ बॉध दिए जाएं और उनके (इस) कहने पर (ख़ुदा की) फिटकार बरसे (ख़ुदा का हाथ बॅधने क्यों लगा) बल्कि उसके दोनों हाथ कुशादा हैं जिस तरह चाहता है ख़र्च करता है और जो (किताब) तुम्हारे पास नाज़िल की गयी है (उनका शक व हसद) उनमें से बहुतेरों को कुफ़्र व सरकशी को और बढ़ा देगा और (गोया) हमने ख़ुद उनके आपस में रोज़े क़यामत तक अदावत और कीने की बुनियाद डाल दी जब ये लोग लड़ाई की आग भड़काते हैं तो ख़ुदा उसको बुझा देता है और रूए ज़मीन में फ़साद फेलाने के लिए दौड़ते फिरते हैं और ख़ुदा फ़सादियों को दोस्त नहीं रखता
65وَلَوْ أَنَّ أَهْلَ الْكِتَابِ آمَنُوا وَاتَّقَوْا لَكَفَّرْنَا عَنْهُمْ سَيِّئَاتِهِمْ وَلَأَدْخَلْنَاهُمْ جَنَّاتِ النَّعِيمِ
और अगर अहले किताब ईमान लाते और (हमसे) डरते तो हम ज़रूर उनके गुनाहों से दरगुज़र करते और उनको नेअमत व आराम (बेहिशत के बाग़ों में) पहुंचा देते
66وَلَوْ أَنَّهُمْ أَقَامُوا التَّوْرَاةَ وَالْإِنجِيلَ وَمَا أُنزِلَ إِلَيْهِم مِّن رَّبِّهِمْ لَأَكَلُوا مِن فَوْقِهِمْ وَمِن تَحْتِ أَرْجُلِهِم ۚ مِّنْهُمْ أُمَّةٌ مُّقْتَصِدَةٌ ۖ وَكَثِيرٌ مِّنْهُمْ سَاءَ مَا يَعْمَلُونَ
और अगर यह लोग तौरैत और इन्जील और (सहीफ़े) उनके पास उनके परवरदिगार की तरफ़ से नाज़िल किये गए थे (उनके एहकाम को) क़ायम रखते तो ज़रूर (उनके) ऊपर से भी (रिज़क़ बरस पड़ता) और पॉवों के नीचे से भी उबल आता और (ये ख़ूब चैन से) खाते उनमें से कुछ लोग तो एतदाल पर हैं (मगर) उनमें से बहुतेरे जो कुछ करते हैं बुरा ही करते हैं
67۞ يَا أَيُّهَا الرَّسُولُ بَلِّغْ مَا أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ ۖ وَإِن لَّمْ تَفْعَلْ فَمَا بَلَّغْتَ رِسَالَتَهُ ۚ وَاللَّهُ يَعْصِمُكَ مِنَ النَّاسِ ۗ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ
ऐ रसूल जो हुक्म तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से तुम पर नाज़िल किया गया है पहुंचा दो और अगर तुमने ऐसा न किया तो (समझ लो कि) तुमने उसका कोई पैग़ाम ही नहीं पहुंचाया और (तुम डरो नहीं) ख़ुदा तुमको लोगों के श्शर से महफ़ूज़ रखेगा ख़ुदा हरगिज़ काफ़िरों की क़ौम को मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुंचाता
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अनुवाद — अल-माइदा 65

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सूरा आयत 65/120 — अल-माइदा المائدة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-माइदा सुनें, अल-माइदा अनुवाद, अल-माइदा mp3, अल-माइदा pdf. आयत 63–67. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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