Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- لَا تَغْلُوا: हद से आगे न बढ़ो, अतिशयता मत करो।
- غَيْرَ الْحَقِّ: सत्य के विपरीत, बिना किसी सत्य आधार के।
- أَهْوَاء: बहुवचन है 'हवा' का, जिसका अर्थ है मन की इच्छाएँ और व्यक्तिगत आकांक्षाएँ।
- سَوَاءِ السَّبِيلِ: सीधा और मध्यम मार्ग, सत्य का रास्ता।
तफ़सीर (व्याख्या):
ऐ नबी! आप अहले-किताब (यहूदियों और ईसाइयों) से कह दीजिए कि अपने धर्म में सत्य की सीमा से आगे न बढ़ो। अतिशयता और अति दोनों ही धर्म में बुरी चीज़ें हैं—चाहे कोई कमी करे या हद से ज़्यादा बढ़ जाए, दोनों ही गलत हैं। ख़ास तौर पर ईसाइयों को संबोधित करते हुए यह नसीहत है कि उन्होंने हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) की इज़्ज़त में अतिशयता की और उन्हें ईश्वर का पुत्र या स्वयं ईश्वर मान लिया, जबकि वे केवल एक नबी थे। यह उनका अपने धर्म में हद से बढ़ जाना था।
साथ ही, उन लोगों की इच्छाओं का पालन मत करो जो तुमसे पहले गुमराह हो चुके थे—अर्थात उनके पूर्वजों और बुज़ुर्गों की, जिन्होंने अपनी मनमानी और झूठी परंपराओं को धर्म का हिस्सा बना लिया था। उन्होंने न केवल खुद गुमराही का रास्ता अपनाया, बल्कि बहुत से लोगों को भी सत्य के मार्ग से भटकाया। जब मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को पैग़ंबर बनाकर भेजा गया, तो वे उनके सीधे और न्यायसंगत मार्ग को स्वीकार करने से भी इनकार करके गुमराही पर ही डटे रहे और सीधे रास्ते से दूर हो गए।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
- इस आयत से हमें सीख मिलती है कि धर्म में संतुलन और मध्यमता ही सच्चा रास्ता है। अतिशयता चाहे किसी की इज़्ज़त में हो या इबादत में, वह इंसान को गुमराही की ओर ले जाती है।
- अंधी परंपरा और पूर्वजों की नक़ल करना सत्य से भटकने का बड़ा कारण है। हमें हमेशा कुरआन और सुन्नत की रोशनी में अपने धर्म को समझना चाहिए, न कि केवल अपने बुज़ुर्गों की आदतों की पैरवी करनी चाहिए।
- यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि हमें अपने धर्म में उन लोगों की इच्छाओं और मनमानी से बचना चाहिए जो गुमराह हैं, चाहे वे कितने भी बड़े या प्रभावशाली क्यों न हों।
- इस्लाम का मार्ग 'सीधा मार्ग' (सिरात-ए-मुस्तक़ीम) है—जो न अति की तरफ झुकता है और न कमी की तरफ। यही वह रास्ता है जो इंसान को दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी तक पहुँचाता है।
📜 आयत 75-79 — सूरा अल-माइदा
अनुवाद — अल-माइदा 77
सूरा अल-माइदा आयत 77 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : ऐ रसूल तुम कह दो कि ऐ अहले किताब तुम…सूरा आयत 77/120 — सूरा अल-माइदा المائدة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-माइदा सुनें, सूरा अल-माइदा अनुवाद, सूरा अल-माइदा mp3, सूरा अल-माइदा pdf. आयत 75–79. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा अल-माइदा
पवित्र क़ुरआन
Wednesday, September 30, 2026
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