अल-माइदा · 78/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
لُعِنَ الَّذِينَ كَفَرُوا مِن بَنِي إِسْرَائِيلَ عَلَىٰ لِسَانِ دَاوُودَ وَعِيسَى ابْنِ مَرْيَمَ ۚ ذَٰلِكَ بِمَا عَصَوا وَّكَانُوا يَعْتَدُونَ ۝٧٨
Lu`inal lazeena kafaroo mim Baneee israaa`eela `alaa lisaani Daawooda wa `Eesab ni Maryam; zaalika bimaa `asaw wa kaanoo ya tadoon
📖 हिंदी अर्थ
बनी इसराईल में से जो लोग काफ़िर थे उन पर दाऊद और मरियम के बेटे ईसा की ज़बानी लानत की गयी ये (लानत उन पर पड़ी तो सिर्फ) इस वजह से कि (एक तो) उन लोगों ने नाफ़रमानी की और (फिर हर मामले में) हद से बढ़ जाते थे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لُعِنَ: रहमत से दूर किया गया, अभिशापित किया गया।
  • عَلَىٰ لِسَانِ دَاوُودَ: दाऊद (अलैहिस्सलाम) की ज़बान पर, यानी उनकी किताब (ज़बूर) में।
  • وَعِيسَى ابْنِ مَرْيَمَ: और ईसा बिन मरियम (अलैहिस्सलाम) की ज़बान पर, यानी उनकी किताब (इंजील) में।
  • عَصَوا: उन्होंने अवज्ञा की, हुक्म की खिलाफ़वर्ज़ी की।
  • يَعْتَدُونَ: हद से बढ़ने वाले, अल्लाह की हदों को पार करने वाले।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला बयान फ़रमाता है कि बनी इसराईल में से जिन लोगों ने कुफ़्र किया, उन्हें अल्लाह ने अपनी रहमत से महरूम कर दिया और उन पर लानत भेजी। यह लानत दाऊद (अलैहिस्सलाम) की ज़बान पर उनकी किताब ज़बूर में दर्ज की गई, और ईसा बिन मरियम (अलैहिस्सलाम) की ज़बान पर उनकी किताब इंजील में भी यही एलान किया गया। यानी अल्लाह ने अपने इन दो नबियों की किताबों में साफ़ तौर पर बता दिया था कि ये काफ़िर लोग रहमत से निकाले जा चुके हैं और उन पर लानत है।

इस लानत और रहमत से महरूमी की वजह यह थी कि उन्होंने अल्लाह के हुक्मों की अवज्ञा की, उसकी नाफ़रमानी की और उसकी हदों को पार करते हुए ज़ुल्म और सरकशी पर उतर आए। उन्होंने अल्लाह की हराम की हुई चीज़ों को हलाल ठहराया, नबियों को झुठलाया और उनमें से कुछ को क़त्ल भी किया। उनका यह हाल था कि वे हद से बढ़ने वाले, ज़ालिम और सरकश लोग थे। यह लानत उनके इन्हीं आमाल का नतीजा थी, क्योंकि अल्लाह किसी पर ज़ुल्म नहीं करता, बल्कि लोग ख़ुद अपने कर्मों से अपनी तबाही का सामान करते हैं।

फ़ायदे:

  1. अल्लाह की रहमत उस पर है जो उसके हुक्मों की पैरवी करे, और उसकी लानत उस पर है जो उसकी नाफ़रमानी करे। यह अल्लाह का अटल क़ानून है जो पहले उम्मतों पर लागू हुआ और आख़िरी उम्मत पर भी लागू होगा।
  2. नाफ़रमानी और हद से बढ़ना इंसान को अल्लाह की रहमत से महरूम कर देता है, चाहे वह कितना ही बड़ा इल्म वाला या किसी बड़े नस्ल से क्यों न हो।
  3. अल्लाह के नबी अपनी उम्मत के लिए रहमत हैं, लेकिन जो लोग हक़ को नकारें और ज़ुल्म पर अड़े रहें, उन पर नबियों की ज़बान से भी लानत आती है। यह दिखाता है कि नबियों की मुहब्बत सिर्फ़ ईमान और नेक अमल वालों के लिए है।
  4. यह आयत मुसलमानों को चेतावनी देती है कि वे बनी इसराईल के हालात से सबक़ लें और अल्लाह के हुक्मों की पूरी पैरवी करें, ताकि उन पर भी लानत न आए।
  5. अल्लाह की सुन्नत (क़ानून) में कोई बदलाव नहीं होता — जो लोग अल्लाह की नाफ़रमानी करते हैं और हद से बढ़ते हैं, वे चाहे किसी भी ज़माने में हों, अल्लाह की पकड़ और लानत के हक़दार बनते हैं। यह हमें डर और उम्मीद के बीच रहना सिखाता है।


📜 आयत 76-80 — अल-माइदा

76قُلْ أَتَعْبُدُونَ مِن دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَمْلِكُ لَكُمْ ضَرًّا وَلَا نَفْعًا ۚ وَاللَّهُ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ
फिर देखो तो कि (उसपर भी उलटे) ये लोग कहॉ भटके जा रहे हैं (ऐ रसूल) तुम कह दो कि क्या तुम ख़ुदा (जैसे क़ादिर व तवाना) को छोड़कर (ऐसी ज़लील) चीज़ की इबादत करते हो जिसको न तो नुक़सान ही इख्तेयार है और न नफ़े का और ख़ुदा तो (सबकी) सुनता (और सब कुछ) जानता है
77قُلْ يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لَا تَغْلُوا فِي دِينِكُمْ غَيْرَ الْحَقِّ وَلَا تَتَّبِعُوا أَهْوَاءَ قَوْمٍ قَدْ ضَلُّوا مِن قَبْلُ وَأَضَلُّوا كَثِيرًا وَضَلُّوا عَن سَوَاءِ السَّبِيلِ
ऐ रसूल तुम कह दो कि ऐ अहले किताब तुम अपने दीन में नाहक़ ज्यादती न करो और न उन लोगों (अपने बुज़ुगों) की नफ़सियानी ख्वाहिशों पर चलो जो पहले ख़ुद ही गुमराह हो चुके और (अपने साथ और भी) बहुतेरों को गुमराह कर छोड़ा और राहे रास्त से (दूर) भटक गए
78لُعِنَ الَّذِينَ كَفَرُوا مِن بَنِي إِسْرَائِيلَ عَلَىٰ لِسَانِ دَاوُودَ وَعِيسَى ابْنِ مَرْيَمَ ۚ ذَٰلِكَ بِمَا عَصَوا وَّكَانُوا يَعْتَدُونَ
बनी इसराईल में से जो लोग काफ़िर थे उन पर दाऊद और मरियम के बेटे ईसा की ज़बानी लानत की गयी ये (लानत उन पर पड़ी तो सिर्फ) इस वजह से कि (एक तो) उन लोगों ने नाफ़रमानी की और (फिर हर मामले में) हद से बढ़ जाते थे
79كَانُوا لَا يَتَنَاهَوْنَ عَن مُّنكَرٍ فَعَلُوهُ ۚ لَبِئْسَ مَا كَانُوا يَفْعَلُونَ
और किसी बुरे काम से जिसको उन लोगों ने किया बाज़ न आते थे (बल्कि उस पर बावजूद नसीहत अड़े रहते) जो काम ये लोग करते थे क्या ही बुरा था
80تَرَىٰ كَثِيرًا مِّنْهُمْ يَتَوَلَّوْنَ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ لَبِئْسَ مَا قَدَّمَتْ لَهُمْ أَنفُسُهُمْ أَن سَخِطَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ وَفِي الْعَذَابِ هُمْ خَالِدُونَ
(ऐ रसूल) तुम उन (यहूदियों) में से बहुतेरों को देखोगे कि कुफ्फ़ार से दोस्ती रखते हैं जो सामान पहले से उन लोगों ने ख़ुद अपने वास्ते दुरूस्त किया है किस क़दर बुरा है (जिसका नतीजा ये है) कि (दुनिया में भी) ख़ुदा उन पर गज़बनाक हुआ और (आख़ेरत में भी) हमेशा अज़ाब ही में रहेंगे
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अनुवाद — अल-माइदा 78

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Tuesday, August 18, 2026

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