अर-रहमान · 57/78
अनुवाद उच्चारण — सूरा अर-रहमान
فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ ۝٥٧
Fabi ayyi aalaaa`i Rabbikumaa tukazzibaan
📖 हिंदी अर्थ
तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किन किन नेअमतों को झुठलाओगे

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • آلاء: नेमतें, उपकार, अनगिनत अहसान।
  • تُكَذِّبَانِ: तुम दोनों झुठलाते हो, इनकार करते हो।
  • رَبِّكُمَا: तुम दोनों (इंसानों और जिन्नात) के रब की।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ इंसानों और जिन्नात की जमात! तुम्हारे रब ने तुम पर जो अनगिनत नेमतें बरसाई हैं—ज़िंदगी दी, शरीर दिया, आँखें दीं, कान दिए, ज़बान दी, सूरज-चाँद, ज़मीन-आसमान, पानी और रिज़्क़—इन सब में से कौन सी नेमत ऐसी है जिसे तुम झुठला सकते हो? क्या तुममें साहस है कि कहो कि ये नेमतें हमारे रब की तरफ से नहीं हैं? या कहो कि ये अहसान हम पर नहीं हैं?

यह आयत एक प्यार भरी डाँट है, एक मोह भरी पुकार है। अल्लाह तआला बार-बार अपनी नेमतें गिनाता है और हर नेमत के बाद पूछता है: "तो फिर तुम कौन सी नेमत को झुठलाओगे?" यह सवाल दिल को हिला देने वाला है। जब कोई बाप अपने बच्चे से प्यार से कहे, "मैंने तुम्हें इतना कुछ दिया, फिर भी तुम मुझसे मुँह मोड़ते हो?" तो बच्चे की आँखों में आँसू आ जाते हैं। यही अंदाज़ अल्लाह का है—वह हमें याद दिलाता है कि उसकी नेमतें अनगिनत हैं, और हमें चाहिए कि हम उसका शुक्र अदा करें, उसकी इबादत करें और उसके दिए हुए हर उपहार को पहचानें।

याद रखो! यह आयत सिर्फ इंसानों से नहीं, बल्कि जिन्नात से भी खिताब करती है। यानी अल्लाह की नेमतें और उसकी रहमत दोनों जमातों पर छाई हुई हैं। और जब रब इतना मेहरबान है, तो हमें उसका शुक्रगुज़ार होना चाहिए। क्या हम उस रब को भूल सकते हैं जो हर साँस में हमें ज़िंदगी देता है? क्या हम उसके दीन को छोड़ सकते हैं जिसने हमें कुरआन जैसी नेमत दी? हरगिज़ नहीं!

इस आयत से हमें सबक लेना चाहिए कि हम अपनी ज़िंदगी में अल्लाह की नेमतों को गिनें, उन पर गौर करें, और हर नेमत के बदले उसका शुक्र अदा करें। शुक्र का सबसे अच्छा तरीका यह है कि हम उसकी इबादत करें, उसके हुक्मों पर चलें और उसके रास्ते पर साबित रहें। क्योंकि जो रब इतनी नेमतें देता है, उसका हक़ है कि उसकी नाफ़रमानी न की जाए।



📜 आयत 55-59 — सूरा अर-रहमान

55فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
तो तुम दोनों अपने मालिक की किस किस नेअमत को न मानोगे
56فِيهِنَّ قَاصِرَاتُ الطَّرْفِ لَمْ يَطْمِثْهُنَّ إِنسٌ قَبْلَهُمْ وَلَا جَانٌّ
इसमें (पाक दामन ग़ैर की तरफ ऑंख उठा कर न देखने वाली औरतें होंगी जिनको उन से पहले न किसी इन्सान ने हाथ लगाया होगा) और जिन ने
57فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किन किन नेअमतों को झुठलाओगे
58كَأَنَّهُنَّ الْيَاقُوتُ وَالْمَرْجَانُ
(ऐसी हसीन) गोया वह (मुजस्सिम) याक़ूत व मूँगे हैं
59فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
तो तुम दोनों अपने परवरदिगार की किन किन नेअमतों से मुकरोगे
अर-रहमानकुरान सूची
78आयत
मदनीअवतरण स्थान
57आयत

अनुवाद — अर-रहमान 57

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Friday, October 2, 2026

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