अल-क़लम · 17/52
अनुवाद उच्चारण — अल-क़लम
إِنَّا بَلَوْنَاهُمْ كَمَا بَلَوْنَا أَصْحَابَ الْجَنَّةِ إِذْ أَقْسَمُوا لَيَصْرِمُنَّهَا مُصْبِحِينَ ۝١٧
Innaa balawnaahum kamaa balawnaaa As-haabal jannati iz `aqsamoo la-yasri munnahaa musbiheen
📖 हिंदी अर्थ
जिस तरह हमने एक बाग़ वालों का इम्तेहान लिया था उसी तरह उनका इम्तेहान लिया जब उन्होने क़समें खा खाकर कहा कि सुबह होते हम उसका मेवा ज़रूर तोड़ डालेंगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • बलौनाहुम – हमने उन्हें परीक्षण में डाला।
  • अस्हाबुल जन्नह – बाग़ वाले (बगीचे के मालिक)।
  • अक्समू – उन्होंने क़सम खाई।
  • लेयस्रिमुन्नहा – वे उसके फल अवश्य तोड़ेंगे (काटेंगे)।
  • मुस्बिहीन – सुबह होते ही (सवेरे-सवेरे)।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला फ़रमाता है कि हमने इन मक्का के मुशरिकीन को भूख और क़हत (अकाल) की मुसीबत में डालकर आज़माया, ठीक उसी तरह जैसे हमने उन लोगों को आज़माया जो एक ख़ूबसूरत बाग़ के मालिक थे। वह बाग़ एक नेक आदमी का था, जो अपनी पैदावार का कुछ हिस्सा ग़रीबों और मिस्कीनों को दिया करता था। उसकी मौत के बाद उसके बेटों ने सोचा कि अब हम यह सब क्यों दें? उन्होंने आपस में क़सम खाई कि वे सुबह-सुबह, जब लोग सो रहे हों, बाग़ के सारे फल तोड़ लेंगे ताकि कोई ग़रीब उसमें से कुछ न ले सके। उन्होंने "इंशा अल्लाह" नहीं कहा, यानी अल्लाह की मर्ज़ी पर भरोसा नहीं किया और अपनी तदबीर (योजना) पर इतरा गए।

अल्लाह तआला ने उनकी इस हरकत को उनके लिए आज़माइश बना दिया। उनकी यह चाल उन पर ही उलट गई और रात में ही अल्लाह का अज़ाब आया जिसने उस बाग़ को जला कर राख कर दिया। सुबह जब वे पहुँचे तो बाग़ को बर्बाद पाया और उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हुआ, लेकिन तब बहुत देर हो चुकी थी।

यहाँ अल्लाह तआला मक्का के काफ़िरों को चेतावनी दे रहे हैं कि जिस तरह बाग़ वालों को उनकी कंजूसी और अल्लाह के हुक्म से मुँह मोड़ने की सज़ा मिली, उसी तरह अगर ये लोग अपनी सरकशी और ज़ुल्म से बाज़ नहीं आए तो इन्हें भी सख़्त अज़ाब का सामना करना पड़ेगा। यह एक तरफ़ डराने वाली बात है, तो दूसरी तरफ़ हमारे लिए सबक़ कि अल्लाह की दी हुई नेअमतों में ग़रीबों और ज़रूरतमंदों का हक़ अदा करना कितना अहम है। जो लोग अपने माल में अल्लाह का हक़ नहीं देते, वे असल में अपनी ही बर्बादी का सामान करते हैं।

इस क़िस्से से हमें यह भी सीख मिलती है कि इंसान को अपने किसी काम के लिए "इंशा अल्लाह" कहना चाहिए और अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए। अपनी ताक़त और तदबीर पर घमंड करना इंसान को तबाही की तरफ़ ले जाता है। अल्लाह तआला बड़ा मेहरबान है कि वह हमें दुनिया में ही आगाह कर देता है, ताकि हम आख़िरत के अज़ाब से बच सकें। हमें चाहिए कि हम अल्लाह की नेअमतों का शुक्र अदा करें और उसके बंदों के हक़ पूरे करें, क्योंकि अल्लाह की रहमत उन्हीं पर होती है जो उसके हुक्मों पर चलते हैं और दूसरों के साथ भलाई करते हैं।



📜 आयत 15-19 — अल-क़लम

15إِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِ آيَاتُنَا قَالَ أَسَاطِيرُ الْأَوَّلِينَ
जब उसके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती हैं तो बोल उठता है कि ये तो अगलों के अफ़साने हैं
16سَنَسِمُهُ عَلَى الْخُرْطُومِ
हम अनक़रीब इसकी नाक पर दाग़ लगाएँगे
17إِنَّا بَلَوْنَاهُمْ كَمَا بَلَوْنَا أَصْحَابَ الْجَنَّةِ إِذْ أَقْسَمُوا لَيَصْرِمُنَّهَا مُصْبِحِينَ
जिस तरह हमने एक बाग़ वालों का इम्तेहान लिया था उसी तरह उनका इम्तेहान लिया जब उन्होने क़समें खा खाकर कहा कि सुबह होते हम उसका मेवा ज़रूर तोड़ डालेंगे
18وَلَا يَسْتَثْنُونَ
और इन्शाअल्लाह न कहा
19فَطَافَ عَلَيْهَا طَائِفٌ مِّن رَّبِّكَ وَهُمْ نَائِمُونَ
तो ये लोग पड़े सो ही रहे थे कि तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से (रातों रात) एक बला चक्कर लगा गयी
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अनुवाद — अल-क़लम 17

सूरा अल-क़लम आयत 17 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : जिस तरह हमने एक बाग़ वालों का इम्तेहान लिया था…

सूरा आयत 17/52 — अल-क़लम القلم (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-क़लम सुनें, अल-क़लम अनुवाद, अल-क़लम mp3, अल-क़लम pdf. आयत 15–19. हिंदी अर्थ: اردو.




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Wednesday, August 19, 2026

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