अल-क़लम · 18/52
अनुवाद उच्चारण — अल-क़लम
وَلَا يَسْتَثْنُونَ ۝١٨
Wa laa yastasnoon
📖 हिंदी अर्थ
और इन्शाअल्लाह न कहा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يَسْتَثْنُونَ: "इस्तिस्ना" करना, यानी अपनी बात या क़सम के साथ "इंशा अल्लाह" (अगर अल्लाह ने चाहा) कहना। इस आयत में इसका अर्थ है कि वे लोग अपनी क़सम में "इंशा अल्लाह" नहीं बोल रहे थे।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला ने इस आयत में मक्का के काफ़िरों की परीक्षा का ज़िक्र किया है, जैसे उसने बाग़ वालों (असहाबुल जन्ना) की परीक्षा ली थी। वे बाग़ वाले लोग रात में ही यह क़सम खा चुके थे कि सुबह होते ही वे अपने बाग़ के फल तोड़ लेंगे, ताकि कोई ग़रीब या मिस्कीन उनमें से कुछ न खा सके। उन्होंने अपनी इस क़सम में "इंशा अल्लाह" नहीं कहा, यानी उन्होंने अल्लाह की मर्ज़ी को अपने इरादे पर मुक़द्दम नहीं किया और पूरी तरह अपनी ताक़त और योजना पर भरोसा किया।

यह उनकी बड़ी भूल थी कि उन्होंने अल्लाह की इच्छा को भुला दिया और अपने इरादे को ही सब कुछ समझ लिया। उन्हें याद नहीं रहा कि इंसान चाहे कितनी भी तैयारी कर ले, लेकिन अल्लाह की मर्ज़ी के बिना कुछ भी नहीं हो सकता। इसी तरह मक्का के काफ़िरों ने भी अल्लाह की नेमतों को भुला दिया और अपनी ताक़त पर घमंड किया, यह नहीं सोचा कि सब कुछ अल्लाह के हाथ में है।

दीनी नसीहत:

इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि इंसान को हर काम में अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए और अपनी ज़ुबान से "इंशा अल्लाह" कहना नहीं भूलना चाहिए। यह सिर्फ़ एक लफ़्ज़ नहीं, बल्कि अल्लाह की रज़ा के आगे सर झुकाने का एलान है। जब इंसान "इंशा अल्लाह" कहता है, तो वह यह स्वीकार करता है कि असली मालिक अल्लाह है और उसकी मर्ज़ी के बिना कोई काम पूरा नहीं हो सकता। यही विनम्रता इंसान को अल्लाह की मेहरबानी का हक़दार बनाती है, और अल्लाह अपने बंदे की इसी अदब की वजह से उसके कामों में बरकत देता है। हमें चाहिए कि अपनी ज़िंदगी के हर मामले में — छोटे हो या बड़े — अल्लाह का ज़िक्र करें और उसी पर भरोसा रखें, क्योंकि कामयाबी सिर्फ़ अल्लाह के हाथ में है।



📜 आयत 16-20 — अल-क़लम

16سَنَسِمُهُ عَلَى الْخُرْطُومِ
हम अनक़रीब इसकी नाक पर दाग़ लगाएँगे
17إِنَّا بَلَوْنَاهُمْ كَمَا بَلَوْنَا أَصْحَابَ الْجَنَّةِ إِذْ أَقْسَمُوا لَيَصْرِمُنَّهَا مُصْبِحِينَ
जिस तरह हमने एक बाग़ वालों का इम्तेहान लिया था उसी तरह उनका इम्तेहान लिया जब उन्होने क़समें खा खाकर कहा कि सुबह होते हम उसका मेवा ज़रूर तोड़ डालेंगे
18وَلَا يَسْتَثْنُونَ
और इन्शाअल्लाह न कहा
19فَطَافَ عَلَيْهَا طَائِفٌ مِّن رَّبِّكَ وَهُمْ نَائِمُونَ
तो ये लोग पड़े सो ही रहे थे कि तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से (रातों रात) एक बला चक्कर लगा गयी
20فَأَصْبَحَتْ كَالصَّرِيمِ
तो वह (सारा बाग़ जलकर) ऐसा हो गया जैसे बहुत काली रात
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अनुवाद — अल-क़लम 18

सूरा अल-क़लम आयत 18 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और इन्शाअल्लाह न कहा

सूरा आयत 18/52 — अल-क़लम القلم (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-क़लम सुनें, अल-क़लम अनुवाद, अल-क़लम mp3, अल-क़लम pdf. आयत 16–20. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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