अल-क़लम · 37/52
अनुवाद उच्चारण — अल-क़लम
أَمْ لَكُمْ كِتَابٌ فِيهِ تَدْرُسُونَ ۝٣٧
Am lakum kitaabun feehi tadrusoon
📖 हिंदी अर्थ
या तुम्हारे पास कोई ईमानी किताब है जिसमें तुम पढ़ लेते हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَمْ: क्या (प्रश्नवाचक, इसमें इन्कार और तिरस्कार का भाव है)
  • كِتَابٌ: किताब, कोई आसमानी ग्रंथ
  • تَدْرُسُونَ: तुम पढ़ते हो, अध्ययन करते हो, सीखते हो

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में उन लोगों से पूछ रहे हैं जो मुत्तक़ी (परहेज़गार) और गुनहगार को एक समान मानते हैं, या यह सोचते हैं कि अल्लाह के यहाँ नेक और बदकार का एक ही हुक्म होगा। अल्लाह फ़रमाता है: "क्या तुम्हारे पास कोई ऐसी किताब है जिसमें तुम पढ़ते हो कि आज्ञाकारी और अवज्ञाकारी (गुनहगार) बराबर हैं? क्या तुम्हारे पास कोई आसमानी ग्रंथ है जो तुम्हें यह सिखाता है कि जो अल्लाह की इताअत करता है और जो उसकी नाफ़रमानी करता है, दोनों का अंजाम एक जैसा होगा?"

यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर देना असंभव है, क्योंकि किसी भी आसमानी किताब में यह नहीं लिखा है कि नेक और बदकार बराबर हैं। बल्कि सभी आसमानी किताबों में यही पढ़ाया गया है कि नेकी का बदला नेकी है और बुराई का बदला बुराई है। अल्लाह तआला ने हर युग में अपने नबियों के माध्यम से यही संदेश भेजा है कि अच्छे और बुरे का अंजाम अलग-अलग होगा।

यह आयत उन लोगों के लिए एक चुनौती है जो क़ियामत के दिन अल्लाह के फ़ैसले पर शक करते हैं या यह समझते हैं कि अल्लाह इन्साफ़ नहीं करेगा। अल्लाह तआला फ़रमा रहे हैं: "अगर तुम्हारा यह दावा सच है, तो लाओ अपनी किताब, जिसमें तुम पढ़ते हो!"

इस आयत में एक बहुत बड़ी सीख है कि हमें कभी भी अल्लाह के इन्साफ़ पर शक नहीं करना चाहिए। अल्लाह तआला बिल्कुल इन्साफ़ करने वाला है, और उसका फ़ैसला पूर्ण न्याय पर आधारित होगा। जो लोग यह सोचते हैं कि नेक और बदकार का अंजाम एक जैसा होगा, वह अल्लाह के इन्साफ़ को समझ नहीं पाए हैं।

यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि हमें अपने जीवन में नेकी और परहेज़गारी अपनानी चाहिए, क्योंकि अल्लाह के यहाँ हर अच्छे और बुरे काम का हिसाब होगा। अल्लाह तआला कभी किसी की मेहनत को बेकार नहीं जाने देगा, और न ही किसी गुनहगार को बिना सज़ा के छोड़ेगा। यही अल्लाह का वादा है, और अल्लाह का वादा सच्चा है।



📜 आयत 35-39 — अल-क़लम

35أَفَنَجْعَلُ الْمُسْلِمِينَ كَالْمُجْرِمِينَ
तो क्या हम फरमाबरदारों को नाफ़रमानो के बराबर कर देंगे
36مَا لَكُمْ كَيْفَ تَحْكُمُونَ
(हरगिज़ नहीं) तुम्हें क्या हो गया है तुम तुम कैसा हुक्म लगाते हो
37أَمْ لَكُمْ كِتَابٌ فِيهِ تَدْرُسُونَ
या तुम्हारे पास कोई ईमानी किताब है जिसमें तुम पढ़ लेते हो
38إِنَّ لَكُمْ فِيهِ لَمَا تَخَيَّرُونَ
कि जो चीज़ पसन्द करोगे तुम को वहाँ ज़रूर मिलेगी
39أَمْ لَكُمْ أَيْمَانٌ عَلَيْنَا بَالِغَةٌ إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ ۙ إِنَّ لَكُمْ لَمَا تَحْكُمُونَ
या तुमने हमसे क़समें ले रखी हैं जो रोज़े क़यामत तक चली जाएगी कि जो कुछ तुम हुक्म दोगे वही तुम्हारे लिए ज़रूर हाज़िर होगा
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अनुवाद — अल-क़लम 37

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Tuesday, August 18, 2026

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