अल-क़लम · 51/52
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-क़लम
وَإِن يَكَادُ الَّذِينَ كَفَرُوا لَيُزْلِقُونَكَ بِأَبْصَارِهِمْ لَمَّا سَمِعُوا الذِّكْرَ وَيَقُولُونَ إِنَّهُ لَمَجْنُونٌ ۝٥١
Wa iny-yakaadul lazeena kafaroo la-yuzliqoonaka biabsaarihim lammaa saml`uz-Zikra wa yaqooloona innahoo lamajnoon
📖 हिंदी अर्थ
और कुफ्फ़ार जब क़ुरान को सुनते हैं तो मालूम होता है कि ये लोग तुम्हें घूर घूर कर (राह रास्त से) ज़रूर फिसला देंगे

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَيُزْلِقُونَكَ (लयुज़लिक़ूनक): यानी तुम्हें गिरा दें या तुम्हें नुकसान पहुँचा दें। कहा गया है कि इसका अर्थ है "अपनी आँखों की तीखी नज़र से तुम्हें सताना या तुम्हें नुकसान पहुँचाना" — यानी नज़र लगाना (बुरी नज़र)।
  • بِأَبْصَارِهِمْ (बिअब्सारिहिम): अपनी आँखों से।
  • الذِّكْرَ (अज़-ज़िक्र): यहाँ इससे अभिप्राय क़ुरआन है।
  • لَمَجْنُونٌ (लमज्नून): पागल, दीवाना।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को दुश्मनों की साज़िशों से बचाने का ज़िक्र करते हुए फ़रमाते हैं कि जब काफ़िरों ने क़ुरआन सुना, तो उनकी नफ़रत और दुश्मनी इस हद तक बढ़ गई कि वे अपनी आँखों की तीखी और कठोर नज़रों से आपको नुक़सान पहुँचाने और आपको गिरा देने के क़रीब पहुँच गए। उनकी नज़रें इतनी भयानक और बुरी थीं कि गोया वे आपको देखकर ही ख़त्म कर देना चाहते थे। यह उनके दिलों में मौजूद अत्यधिक बैर और ईर्ष्या का नतीजा था — वे आपके चेहरे और आपके पैग़ाम को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे।

मगर अल्लाह तआला ने अपनी ख़ास सुरक्षा और हिफ़ाज़त से अपने नबी को उनकी बुरी नज़रों से महफ़ूज़ रखा। यह अल्लाह की क़ुदरत और रसूल ﷺ के प्रति उसकी मुहब्बत का इज़हार है कि दुश्मन चाहे जितनी कोशिश कर लें, वे अल्लाह के नबी को कोई नुक़सान नहीं पहुँचा सकते।

फिर अल्लाह तआला उनकी एक और बुरी आदत का ज़िक्र करते हैं कि जब वे क़ुरआन सुनते हैं, तो सच्चाई को मानने के बजाय अपनी हठधर्मी और अहम की पैरवी करते हुए कहते हैं: "यह शख्स तो पागल है!" — हालाँकि वे ख़ुद जानते थे कि आप ﷺ सबसे ज़्यादा समझदार, सच्चे और अमानतदार हैं। लेकिन उनकी ईर्ष्या और हक़ से इनकार ने उन्हें ऐसी बातें कहने पर मजबूर किया।

यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चाई के दुश्मन हमेशा से रहे हैं और रहेंगे। जब कोई इंसान हक़ की तरफ़ बुलाता है, तो उसे तरह-तरह के इल्ज़ामात का सामना करना पड़ता है। मगर अल्लाह पर भरोसा रखने वालों को कभी डरना नहीं चाहिए, क्योंकि अल्लाह की हिफ़ाज़त उनके साथ होती है। यह भी सबक है कि हमें अपनी नज़रों को कंट्रोल में रखना चाहिए और किसी पर बुरी नज़र नहीं डालनी चाहिए, क्योंकि नज़र लगाना भी एक हक़ीक़त है जिसका ज़िक्र क़ुरआन में किया गया है।

अल्लाह तआला हमें सच्चाई पर साबित क़दम रहने की तौफ़ीक़ दे और हमें उन लोगों की तरह न बनाए जो हक़ सुनकर भी उससे मुँह मोड़ लेते हैं। आमीन।



📜 आयत 49-52 — सूरा अल-क़लम

49لَّوْلَا أَن تَدَارَكَهُ نِعْمَةٌ مِّن رَّبِّهِ لَنُبِذَ بِالْعَرَاءِ وَهُوَ مَذْمُومٌ
अगर तुम्हारे परवरदिगार की मेहरबानी उनकी यावरी न करती तो चटियल मैदान में डाल दिए जाते और उनका बुरा हाल होता
50فَاجْتَبَاهُ رَبُّهُ فَجَعَلَهُ مِنَ الصَّالِحِينَ
तो उनके परवरदिगार ने उनको बरगुज़ीदा करके नेकोकारों से बना दिया
51وَإِن يَكَادُ الَّذِينَ كَفَرُوا لَيُزْلِقُونَكَ بِأَبْصَارِهِمْ لَمَّا سَمِعُوا الذِّكْرَ وَيَقُولُونَ إِنَّهُ لَمَجْنُونٌ
और कुफ्फ़ार जब क़ुरान को सुनते हैं तो मालूम होता है कि ये लोग तुम्हें घूर घूर कर (राह रास्त से) ज़रूर फिसला देंगे
52وَمَا هُوَ إِلَّا ذِكْرٌ لِّلْعَالَمِينَ
और कहते हैं कि ये तो सिड़ी हैं और ये (क़ुरान) तो सारे जहाँन की नसीहत है
अल-क़लमकुरान सूची
52आयत
मक्कीअवतरण स्थान
51आयत

अनुवाद — अल-क़लम 51

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Friday, October 2, 2026

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