अल-आराफ · 181/206
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-आराफ
وَمِمَّنْ خَلَقْنَا أُمَّةٌ يَهْدُونَ بِالْحَقِّ وَبِهِ يَعْدِلُونَ ۝١٨١
Wa mimman khalaqnaaa ummatuny yahdoona bilhaqqi wa bihee ya`diloon
📖 हिंदी अर्थ
और हमारी मख़लूक़ात से कुछ लोग ऐसे भी हैं जो दीने हक़ की हिदायत करते हैं और हक़ से इन्साफ़ भी करते हैं

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • أُمَّةٌ: एक समुदाय या समूह।
  • يَهْدُونَ: वे मार्गदर्शन करते हैं।
  • بِالْحَقِّ: सत्य के साथ, सत्य के आधार पर।
  • يَعْدِلُونَ: वे न्याय करते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में बताते हैं कि उसने जो लोग पैदा किए हैं, उनमें से एक ऐसा समुदाय भी है जो सत्य को अपनाता है, सत्य के अनुसार चलता है और दूसरों को भी सत्य की ओर बुलाता है। ये लोग अपने जीवन में हर मामले में सत्य का साथ देते हैं और उसी के अनुसार निर्णय लेते हैं। वे न केवल स्वयं सत्य पर स्थिर रहते हैं, बल्कि दूसरों को भी सत्य का रास्ता दिखाते हैं। जब वे किसी के बीच फैसला करते हैं, तो पूरी तरह न्याय करते हैं, किसी पर ज़ुल्म नहीं करते और न ही किसी का हक़ मारते हैं। यह समुदाय वह है जिसे अल्लाह ने ईमान और अच्छे कर्मों का तौफ़ीक़ दिया है, और ये लोग हिदायत के इमाम और न्याय के प्रतीक होते हैं। ये वे लोग हैं जो अल्लाह के दीन को समझते हैं, उस पर अमल करते हैं और उसे दूसरों तक पहुँचाते हैं। इनकी पहचान यह है कि ये हर मामले में सच्चाई और इंसाफ़ को ही अपना मार्ग बनाते हैं।

फ़ायदे (उपदेश):

  1. इस आयत से पता चलता है कि अल्लाह की पैदा की हुई मख़लूक़ात में हमेशा एक ऐसा समुदाय मौजूद रहता है जो सत्य पर क़ायम रहता है और न्याय करता है। यह उम्मत के लिए एक बड़ी ख़ुशख़बरी है कि हक़ और इंसाफ़ की यह परंपरा कभी ख़त्म नहीं होती।
  2. यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चा मुसलमान वही है जो सत्य को अपना इमाम बनाए, उसी के अनुसार चले और उसी के अनुसार दूसरों के बीच फैसला करे।
  3. इससे यह भी पता चलता है कि इस्लाम में न्याय और इंसाफ़ की कितनी अहमियत है। एक मुसलमान को चाहिए कि वह हर मामले में — चाहे वह घर का हो, समाज का हो या किसी मुक़दमे का — पूरी तरह न्याय करे और किसी के साथ नाइंसाफ़ी न करे।
  4. यह आयत उन लोगों के लिए एक प्रोत्साहन है जो सत्य और न्याय पर क़ायम रहते हैं, कि उनका यह काम अल्लाह को बहुत पसंद है और वे उसकी नज़र में बहुत ऊँचे दर्जे पर हैं।
  5. इससे यह भी समझ आता है कि सिर्फ़ अपनी निजी हिदायत काफ़ी नहीं है, बल्कि दूसरों को भी सत्य की ओर बुलाना और उनके बीच न्याय करना भी इसी समुदाय की पहचान है। यानी एक अच्छा मुसलमान वही है जो दूसरों के लिए भी रहनुमा बने।


📜 आयत 179-183 — सूरा अल-आराफ

179وَلَقَدْ ذَرَأْنَا لِجَهَنَّمَ كَثِيرًا مِّنَ الْجِنِّ وَالْإِنسِ ۖ لَهُمْ قُلُوبٌ لَّا يَفْقَهُونَ بِهَا وَلَهُمْ أَعْيُنٌ لَّا يُبْصِرُونَ بِهَا وَلَهُمْ آذَانٌ لَّا يَسْمَعُونَ بِهَا ۚ أُولَٰئِكَ كَالْأَنْعَامِ بَلْ هُمْ أَضَلُّ ۚ أُولَٰئِكَ هُمُ الْغَافِلُونَ
और गोया हमने (ख़ुदा) बहुतेरे जिन्नात और आदमियों को जहन्नुम के वास्ते पैदा किया और उनके दिल तो हैं (मगर कसदन) उन से देखते ही नहीं और उनके कान भी है (मगर) उनसे सुनने का काम ही नहीं लेते (खुलासा) ये लोग गोया जानवर हैं बल्कि उनसे भी कहीं गए गुज़रे हुए यही लोग (अमूर हक़) से बिल्कुल बेख़बर हैं
180وَلِلَّهِ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَىٰ فَادْعُوهُ بِهَا ۖ وَذَرُوا الَّذِينَ يُلْحِدُونَ فِي أَسْمَائِهِ ۚ سَيُجْزَوْنَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
और अच्छे (अच्छे) नाम ख़ुदा ही के ख़ास हैं तो उसे उन्हीं नामों में पुकारो और जो लोग उसके नामों में कुफ्र करते हैं उन्हें (उनके हाल पर) छोड़ दो और वह बहुत जल्द अपने करतूत की सज़ाएं पाएंगें
181وَمِمَّنْ خَلَقْنَا أُمَّةٌ يَهْدُونَ بِالْحَقِّ وَبِهِ يَعْدِلُونَ
और हमारी मख़लूक़ात से कुछ लोग ऐसे भी हैं जो दीने हक़ की हिदायत करते हैं और हक़ से इन्साफ़ भी करते हैं
182وَالَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا سَنَسْتَدْرِجُهُم مِّنْ حَيْثُ لَا يَعْلَمُونَ
और जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया हम उन्हें बहुत जल्द इस तरह आहिस्ता आहिस्ता (जहन्नुम में) ले जाएंगें कि उन्हें ख़बर भी न होगी
183وَأُمْلِي لَهُمْ ۚ إِنَّ كَيْدِي مَتِينٌ
और मैं उन्हें (दुनिया में) ढील दूंगा बेशक मेरी तद्बीर (पुख्ता और) मज़बूत है
अल-आराफकुरान सूची
206आयत
मक्कीअवतरण स्थान
181आयत

अनुवाद — अल-आराफ 181

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Wednesday, September 30, 2026

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