अल-आराफ · 186/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
مَن يُضْلِلِ اللَّهُ فَلَا هَادِيَ لَهُ ۚ وَيَذَرُهُمْ فِي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ ۝١٨٦
Mai yadlilil laahu falaa haadiyaa lah; wa yazaruhum fee tughyaanihim ya`mahoon
📖 हिंदी अर्थ
जिसे ख़ुदा गुमराही में छोड़ दे फिर उसका कोई राहबर नहीं और उन्हीं की सरकशी (व शरारत) में छोड़ देगा कि सरगरदॉ रहें

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يُضْلِلِ: गुमराह कर दे, हिदायत से वंचित कर दे।
  • هَادِي: मार्गदर्शक, हिदायत देने वाला।
  • يَذَرُهُمْ: उन्हें छोड़ देता है।
  • طُغْيَانِهِمْ: उनकी सरकशी, हद से गुज़र जाना, कुफ़्र और ज़ुल्म में चरम सीमा।
  • يَعْمَهُونَ: भटकते हुए, हैरान और परेशान होकर इधर-उधर भटकते रहना, अंधों की तरह टटोलते फिरना।

तफ़सीर (व्याख्या):

जिस व्यक्ति को अल्लाह तआला ने हिदायत से महरूम कर दिया और उसे गुमराही में छोड़ दिया, तो उसे कोई मार्गदर्शक नहीं मिल सकता। कोई भी उसे सीधे रास्ते पर नहीं ला सकता, चाहे वह कितना ही बड़ा दानिश्वर, नसीहत करने वाला या पैग़म्बर ही क्यों न हो। यह अल्लाह का क़ानून है कि जब कोई बंदा हक़ को जानबूझकर ठुकरा देता है और सत्य के सामने अहंकार करता है, तो अल्लाह उसके दिल पर मुहर लगा देता है और उसे उसकी सरकशी में छोड़ देता है।

फिर अल्लाह तआला फ़रमाता है कि वह ऐसे लोगों को उनकी सरकशी और कुफ़्र की हालत में छोड़ देता है, जिसमें वे हैरान और परेशान होकर भटकते रहते हैं। वे न तो किसी सही रास्ते को पा सकते हैं और न ही अपनी गुमराही से निकलने का रास्ता देख पाते हैं। वे अंधों की तरह अंधेरे में टटोलते फिरते हैं, हर तरफ़ भटकते हैं, मगर सच्चाई उन्हें कहीं नहीं मिलती। यह उनके अपने कर्मों और हठधर्मिता का स्वाभाविक परिणाम है कि अल्लाह उन्हें उनकी ज़िद और सरकशी पर छोड़ देता है।


फ़ायदे (सीख):

  1. हिदायत और गुमराही अल्लाह के हाथ में है — यह आयत हमें सिखाती है कि सच्ची हिदायत सिर्फ़ अल्लाह ही दे सकता है। इसलिए हमें हर वक़्त उससे हिदायत की दुआ माँगनी चाहिए और उसके सामने अपनी आजिज़ी और इन्कसारी का इज़हार करना चाहिए।
  2. हक़ को ठुकराने का अंजाम बहुत भयानक है — जो लोग सत्य को जानबूझकर नकारते हैं और उसके सामने अहंकार करते हैं, उनके लिए सबसे बड़ी सज़ा यही है कि अल्लाह उन्हें उनकी गुमराही पर छोड़ देता है। यह किसी आग या अज़ाब से बढ़कर है, क्योंकि गुमराही में भटकना ही सबसे बड़ी मुसीबत है।
  3. इंसान को अपनी ज़िद और हठधर्मिता से बचना चाहिए — यह आयत हमें आगाह करती है कि हम अपनी राय और अहंकार को हक़ पर तरजीह न दें। जब सच्चाई सामने आ जाए, तो उसे खुशी-खुशी क़बूल कर लेना चाहिए, वरना अंजाम बहुत बुरा होता है।
  4. अल्लाह की रहमत और हिदायत की क़द्र करनी चाहिए — जब हम देखते हैं कि अल्लाह ने हमें इस्लाम और ईमान की नेअमत दी है, तो हमें इसका शुक्र अदा करना चाहिए और इस हिदायत पर क़ायम रहने की कोशिश करनी चाहिए। यह सबसे बड़ी नेअमत है, जिसकी कोई क़ीमत नहीं।
  5. दूसरों की हिदायत के लिए दुआ करना — यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि जो लोग गुमराही में हैं, उनके लिए हमें दुआ करनी चाहिए कि अल्लाह उन्हें हिदायत दे, क्योंकि हिदायत सिर्फ़ अल्लाह के हाथ में है। हमारा काम नसीहत करना है, और हिदायत देना अल्लाह का काम है।


📜 आयत 184-188 — अल-आराफ

184أَوَلَمْ يَتَفَكَّرُوا ۗ مَا بِصَاحِبِهِم مِّن جِنَّةٍ ۚ إِنْ هُوَ إِلَّا نَذِيرٌ مُّبِينٌ
क्या उन लोगों ने इतना भी ख्याल न किया कि आख़िर उनके रफीक़ (मोहम्मद ) को कुछ जुनून तो नहीं वह तो बस खुल्लम खुल्ला (अज़ाबे ख़ुदा से) डराने वाले हैं
185أَوَلَمْ يَنظُرُوا فِي مَلَكُوتِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا خَلَقَ اللَّهُ مِن شَيْءٍ وَأَنْ عَسَىٰ أَن يَكُونَ قَدِ اقْتَرَبَ أَجَلُهُمْ ۖ فَبِأَيِّ حَدِيثٍ بَعْدَهُ يُؤْمِنُونَ
क्या उन लोगों ने आसमान व ज़मीन की हुकूमत और ख़ुदा की पैदा की हुई चीज़ों में ग़ौर नहीं किया और न इस बात में कि यायद उनकी मौत क़रीब आ गई हो फिर इतना समझाने के बाद (भला) किस बात पर ईमान लाएंगें
186مَن يُضْلِلِ اللَّهُ فَلَا هَادِيَ لَهُ ۚ وَيَذَرُهُمْ فِي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ
जिसे ख़ुदा गुमराही में छोड़ दे फिर उसका कोई राहबर नहीं और उन्हीं की सरकशी (व शरारत) में छोड़ देगा कि सरगरदॉ रहें
187يَسْأَلُونَكَ عَنِ السَّاعَةِ أَيَّانَ مُرْسَاهَا ۖ قُلْ إِنَّمَا عِلْمُهَا عِندَ رَبِّي ۖ لَا يُجَلِّيهَا لِوَقْتِهَا إِلَّا هُوَ ۚ ثَقُلَتْ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ لَا تَأْتِيكُمْ إِلَّا بَغْتَةً ۗ يَسْأَلُونَكَ كَأَنَّكَ حَفِيٌّ عَنْهَا ۖ قُلْ إِنَّمَا عِلْمُهَا عِندَ اللَّهِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
(ऐ रसूल) तुमसे लोग क़यामत के बारे में पूछा करते हैं कि कहीं उसका कोई वक्त भी तय है तुम कह दो कि उसका इल्म बस फक़त पररवदिगार ही को है वही उसके वक्त मुअय्यन पर उसको ज़ाहिर कर देगा। वह सारे आसमान व ज़मीन में एक कठिन वक्त होगा वह तुम्हारे पास पस अचानक आ जाएगी तुमसे लोग इस तरह पूछते हैं गोया तुम उनसे बखूबी वाक़िफ हो तुम (साफ) कह दो कि उसका इल्म बस ख़ुदा ही को है मगर बहुतेरे लोग नहीं जानते
188قُل لَّا أَمْلِكُ لِنَفْسِي نَفْعًا وَلَا ضَرًّا إِلَّا مَا شَاءَ اللَّهُ ۚ وَلَوْ كُنتُ أَعْلَمُ الْغَيْبَ لَاسْتَكْثَرْتُ مِنَ الْخَيْرِ وَمَا مَسَّنِيَ السُّوءُ ۚ إِنْ أَنَا إِلَّا نَذِيرٌ وَبَشِيرٌ لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मै ख़ुद अपना आप तो एख़तियार रखता ही नहीं न नफे क़ा न ज़रर का मगर बस वही ख़ुदा जो चाहे और अगर (बग़ैर ख़ुदा के बताए) गैब को जानता होता तो यक़ीनन मै अपना बहुत सा फ़ायदा कर लेता और मुझे कभी कोई तकलीफ़ भी न पहुँचती मै तो सिर्फ ईमानदारों को (अज़ाब से डराने वाला) और वेहशत की खुशख़बरी देने वाला हँ
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अनुवाद — अल-आराफ 186

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Tuesday, August 18, 2026

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